कब तक इंतजार

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केंद्र में भाजपा की पूरे बहुमत की सरकार है। उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई बहुमत की सरकार है। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। राम मंदिर पर वह सदैव मुखर रहे हैं। उनके गुरु गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ 1990 में अयोध्या आंदोलन की अगुवाई कर चुके हैं। योगी ने अयोध्या में दीपोत्सव जैसा ‘मेगा आयोजन’ कर इसकी भावभूमि भी तैयार कर दी है। उन्होंने वहां कहा भी कि जो जनता के मन में है, वही उनके मन में भी है। मतलब साफ है। राम मंदिर पर दबाव बढ़ेगा।

बात तीन दिसंबर 1992 की है। राम मंदिर आंदोलन चरम पर था। अयोध्या में लाखों कारसेवक जमा हो चुके थे। उच्चतम न्यायालय को इस बात पर निर्णय देना था कि वहां कारसेवा होगी या यथास्थिति बनी रहेगी? शीर्ष न्यायालय ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया। इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। कारसेवकों ने 6 दिसंबर को बाबरी ढांचा जमींदोज कर दिया। 7 दिसंबर को न्यायालय का यथास्थिति का आदेश आया। तब तक देर हो चुकी थी।

अब बात 29 अक्टूबर 2018 की। 26 साल होने जा रहे हैं। शीर्ष न्यायालय ने इतिहास दोहरा दिया। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने 29 को अयोध्या मामले पर सुनवाई की तारीख दी थी। नये मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की तीन सदस्यीय पीठ ने उस दिन तीन मिनट में मामला निपटा दिया। किसी पक्ष को सुने बिना सीधे कहा कि अगले साल जनवरी में नयी पीठ बनेगी। वह तय करेगी कि मामले की सुनवाई जनवरी में करनी है, फरवरी, मार्च या अप्रैल में करनी है। न्यायालय की अपनी प्राथमिकताएं हैं…। इसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। हुई भी, हो भी रही है, होगी भी। यह स्वाभाविक है। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं राजनाथ सिंह। राम जन्मभूमि आंदोलन को नजदीक देखा है, कवर किया है। वह 1992 के फैसले को याद करते हुए कहते हैं कि ‘3 दिसंबर 1992 के बाद पहली बार इस मामले पर न्यायालय इतना उदासीन है।

देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे पर ऐसा ‘चलताऊ रवैया’ घातक हो सकता है। माना कि न्यायालय कोई फैसला नहीं देता, कम से कम सुनवाई तो कर ही सकता था। जैसी प्रतिक्रिया 1992 में हुई थी, उसके दोहराव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।’ माना जा सकता है कि अब राम मंदिर पर आंदोलन को धार मिलेगी। उसके संकेत भी मिलने लगे हैं। निर्णय के बाद संत समाज, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीखी प्रतिक्रिया भावी आंदोलन की गंभीरता की ओर इशारा करती है। संत समिति ने दिल्ली में बड़ा जमावड़ा किया और मंदिर के लिए कानून की मांग की। उसने दिल्ली, अयोध्या, नागपुर और बेंगलूरु में बड़ी रैलियों के आयोजन का फैसला किया है।

अयोध्या, नागपुर और बेंगलुरु में 25 नवंबर और दिल्ली में 9 दिसंबर को धर्म सभा होगी। अभी विश्व हिंदू परिषद ने कानून बनाने के लिए राज्यपालों से मिलकर एक ज्ञापन देने का क्रम चलाया हुआ है। विहिप के संयुक्त महामंत्री सुरेंद्र जैन कहते हैं कि न्यायालय की टिप्पणी से हम हैरान हैं। इस बड़े मामले पर शीर्ष न्यायालय की ‘प्राथमिकता’ वाली टिप्पणी 100 करोड़ से अधिक हिंदुओं को आहत करने वाली है। साफ है कि इस प्रकरण पर जल्द फैसला नहीं आने वाला है। कानून ही एकमात्र रास्ता है। केंद्र में राज कर रही भाजपा ने 1989 के अपने पालमपुर (हिमाचल) के अधिवेशन में राम मंदिर की बाधा दूर करने का वादा किया था। राम मंदिर उसके हर घोषणा पत्र का हिस्सा है। उसे अपना वादा पूरा करना चाहिए। हमें विश्वास है कि वह अपना वादा पूरा केरगी। वह मंथन कर भी रही होगी।

इस मामले पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता सबसे अधिक गौर करने लायक है। पिछले छह माह से संघ मंदिर पर सीधे मुखर है। सितंबर में दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय समागम के अंतिम दिन प्रश्नोत्तर के दौरान सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंदिर बनाने की खुली वकालत की। अक्टूबर में नागपुर के विजयादशमी के सालाना संबोधन में उन्होंने काननू की मांग की। शीर्ष न्यायालय की टिप्पणी के बाद तो संघ ने ‘1992’ जैसे आंदोलन की चेतावनी तक दे दी। मुंबई में बैठक के दौरान सरकार्यवाह भैया जी जोशी ने तो साफ कहा कि राममंदिर पर संत समाज के नेतृत्व में 1992 जैसा आंदोलन होगा। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उसी दौरान भागवत से मिले और लंबी चर्चा की।

अब सारा दारोमदार भाजपा पर है। केंद्र में पूरे बहुमत की सरकार है। उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई बहुमत की सरकार है। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। राममंदिर पर वह सदैव मुखर रहे हैं। उनके गुरु गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ1990 में अयोध्या आंदोलन की अगुवाई कर चुके हैं। संत समाज और विश्व हिंदू परिषद को यह समय सर्वाधिक अनुकूल लगता है। योगी ने अयोध्या में दीपोत्सव जैसा ‘मेगा आयोजन’ कर इसकी भावभूमि भी तैयार कर दी है। उन्होंने वहां संकेत भी दिया कि जो जनता के मन में है, वही उनके मन में भी है। मतलब साफ है कि राम मंदिर पर दबाव बढ़ेगा। भाजपा भी गंभीर दिख रही है। राम मंदिर पर उसकी प्रतिबद्धता जाहिर है। अब देखना है कि वह इस पर कानून का रास्ता तैयार करती है या न्यायालय के निर्णय का इंतजार करती है।

घूम रहा है इतिहास का पहिया
उत्तर प्रदेश में 1990-92 जैसे हालत बनते दिख रहे हैं। 1990 में मुलायम सिंह के शासन में मंदिर आंदोलन के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह की पहली राजनीतिक गिरμतारी हुई थी। केंद्र में वीपी सिंह की सरकार थी। ‘परिंदा पर नहीं मार सकता है’ मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह के बयान के बाद भी 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवा हुई। अशोक सिंहल उस समय अगुवाई कर रहे थे। अयोध्या में पुलिस की घेराबंदी के दौरान उनको चोट भी लगी थी। थोड़े समय के लिए श्रीराम अस्पताल में भर्ती भी कराये गये थे। उसी साल दो नवंबर को रामलला का दर्शन करने जा रहे कारसेवकों पर पुलिस ने अकारण ही गोली चला दी। कई कारसवेक मारे गये थे। जब 6 दिसंबर 1992 में बाबरी ढांचा गिरा तब तक सरकार बदल चुकी थी। समय का पहिया घूम चुका था। तब भाजपा सरकार का नेतृत्व कल्याण सिंह कर रहे थे। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे। ढांचा गिरने के बाद उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल की सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया था। अब उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार है। मंदिर समर्थकों को लगता है कि यह अनुकूल समय है। आंदोलन की भावभूमि तैयार की जा रही है। दिल्ली में संतों की बड़ी बैठक के साथ ही पूरे देश में माहौल तैयार किया जा रहा है। संतों ने दिल्ली, अयोध्या, नागपुर और बेंगलूरू में बड़ी रैलियों के आयोजन का फैसला किया है। जाहिर है कि बड़ा जन आंदोलन होगा।

2019 में होनोे वाला लोकसभा चुनाव नजदीक है। विपक्ष भी विरोध के लिए तनकर खड़ा हो गया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने व्यंगात्मक लहजे में भाजपा को अध्यादेश लाने की चुनौती दे डाली है। यानी चुनाव में ध्रुवीकरण की भावभूमि तैयार हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषक कहते भी हैंं कि विपक्ष भाजपा के अखाड़े में खुद आ चुका है। भाजपा ध्रुवीकरण में पारंगत मानी जाती है। वह कोई बड़ा कदम उठाये तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। भाजपा ने संकेत दे भी दिया है। पार्टी के राज्यसभा सदस्य और संघ विचारक राकेश सिन्हा ने प्राइवेट मेंबर बिल लाने की बात यूं ही नहीं की है। भाजपा के निशाने पर विशेष रूप से कांग्रेस है। जनेऊ धारण कर मंदिर-मंदिर जाने वाले राहुल गांधी को वह बेनकाब करना चाहती है। संभव है कि लोकसभा के शीतकालीन सत्र में इस विषय पर व्यापक बहस हो। यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस के लिए संकट हो सकता है। उसने मुस्लिम वोट के चक्कर में मंदिर मामले पर समर्थन नहीं किया, (इसकी ज्यादा संभावना है) तो भाजपा उसे मंदिर विरोधी कहकर व्यापक समर्थन हासिल करने की जुगत करेगी।

यह भी गौरतलब है कि संतों के साथ ही मुस्लिमों का एक हिस्सा भी राम मंदिर के समर्थन में उतर आया है। शिया समाज तो खुलकर सामने आ गया है। उसे लगता है कि राम जन्म स्थान, जहां रामलला विराजमान हैं, मंदिर के सिवा और कुछ नहीं बन सकता है। वरिष्ठ पत्रकार शाहिद सिद्दीकी ने शायद यही सोचकर कहा है, ‘प्रश्न केवल इतना है कि रामलला को टाट की छाया में रहने दिया जाय या भव्य मंदिर बनने दिया जाय? मूर्तियों को वहां से हटाना संभव नहीं है। अच्छा हो कि विषाक्त वातावरण को हटाने के लिए मस्जिद के पक्षधर अपना दावा वापस कर वहां भव्य मंदिर बनने दें। इससे अनिश्चितकाल तक हिन्दू और मुसलमानों में तनाव बने रहने के संकट से मुक्ति पायी जा सकेगी। हालांकि आपसी समझौते से मंदिर का रास्ता निकलना अब मुश्किल लगता है लेकिन दोनों पक्ष संवाद तो कर ही सकते हैं।

 

 

 

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