कपट की राजनीति

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कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में बेंगलुरू के मंच पर 19 (नामधारी) राजनीतिक दलों ने एक साथ मिलकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भारतीय जनता पार्टी को सत्ताच्युत करने के लिए साथ रहने की हुंकार भरी थी। कोई मंच पर नाच रहा था। कोई अरसे से ‘बिछड़े सगे-संबंधियों’ से मिलने पर आह्लादित हो रहा था। देश के प्रचार माध्यमों ने भी इस मिलन को भाजपा के लिए बड़ी चुनौती करार दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ऐसे आह्लादित थे, मानो वे ही प्रधानमंत्री होने जा रहे हैं। मायावती व सोनिया गांधी गले मिलकर खिलखिला रहीं थीं और ममता बनर्जी किसी शिक्षक के समान सबको निर्देशित कर पंक्तिबद्ध कर रहीं थीं। ऐसा लग रहा था, जैसे नरेन्द्र मोदी को अपदस्थ करने के लिए एक फौज खड़ी हो गई है। इस घटना की खबरें जारी थीं। इसी बीच ममता बनर्जी ने कहा, ‘अभी आप अपरिपक्व हैं।’ चाहे शरद पवार हों, मायावती या चन्द्रबाबू नायडू, जो बेंगलुरू मंच पर हाथ उठाए कसम खाये थे, सबने राहुल गांधी की क्षमता पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिए। ऐसा इसलिए शुरू हो गया क्योंकि राहुल गांधी ने अप्रत्यक्ष रूप से और उनकी पार्टी ने प्रत्यक्ष रूप से उनको प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के चुनाव की तिथियों के घोषणा होने के साथ ही मायावती ने कांग्रेस को झटका दिया। समाजवादी पार्टी ने जिसका अनुसरण किया, उससे यह साफ हो गया कि एकता के मंच की नौटंकी पहले कई बार इसी प्रकार के मंचन के समान अर्थहीन थी।

महागठबंधन के नाम पर कांग्रेस सहित भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों में जो मिलन की उत्कंठा प्रगट की जा रही है, वो इस कहावत पर आधारित है कि ‘मेरे यहां आओगे तो क्या लाओगे और तुम्हारे यहां आऊंगा तो क्या दोगे?’ इस प्रकार महागठबंधन केवल दो अक्षरों की बिछी शतरंज की बाजी भर रह गयी है। ये दो अक्षर हैं- ‘ला और दा’। यही कारण है कि मायावती ने छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश में कांग्रेस का साथ छोड़ दिया क्योंकि वह कांग्रेस को न तो कुछ देने गई थीं और न ही कांग्रेस कुछ देने के लिए तैयार थी। जैसे ये कहा जा रहा है कि इन राज्यों के परिणाम 2019 के चुनाव के पहले सेमीफाइनल की झांकी होंगे, वैसे ही ये भी कहा जाने लगा है कि सेमीफाइनल के समय ‘ला और दा’ का जो महत्व दिखाई पड़ा है, उसकी परिणति 2019 के चुनाव में भी होगी।

भाजपा का विरोध करने के लिए कांग्रेस गाली-गलौच पर उतारू हो गई है। अध्यक्ष राहुल गांधी हिन्दू होने का स्वांग भर रहे हैं। इससे कांग्रेस की स्थिति तो कमजोर हो ही रही है, किसी अन्य दल को उसके साथ जुड़ने से रोकने का भी काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में भाजपा विरोधी राजनीतिक धुरी बनी मायावती ने कांग्रेस के लिए रायबरेली और अमेठी के अलावा अन्य कोई सीट न देने की अभिव्यक्ति कर डाली है और चाचा-भतीजा के बीच बंट गई समाजवादी पार्टी अभी उनकी पिछलग्गू भले ही बनी हो, मनवांछित समझौता कर पाने में असमर्थता महसूस करने लगी है।

महागठबंधन के नाम पर विपक्षी दलों के जिन प्रतिनिधियों ने अब तक सार्वजनिक अभिव्यक्ति की है, उससे एक ही रणनीति सामने उभर कर आती है कि विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनो और अन्य दलों को नेतृत्व स्वीकार करने के लिए विवश करो। कांग्रेस की ये सारी रणनीति इसी फार्मूले पर आधारित है। उसका विश्वास है, यदि पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में 100 सीटें भी मिल जाती हैं तो वह सबसे बड़ा दल होने के कारण अन्य विपक्षी दलों के सहयोग से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना लेगी। तात्पर्य ये कि अब कांग्रेस किसी और ‘मनमोहन सिंह’ को आगे कर दांव लगाने के लिए तैयार नहीं है।

कांग्रेस का विश्वास है कि यदि पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में 100 सीटें भी मिल जाती हैं तो वह सबसे बड़ा दल होने के कारण अन्य विपक्षी दलों के सहयोग से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना लेगी। तात्पर्य ये कि अब कांग्रेस किसी और ‘मनमोहन सिंह’ को आगे कर दांव लगाने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन भाजपा विरोधी विपक्ष को राहुल गांधी स्वीकार नहीं हैं।

ऐसे में इन राज्यों के चुनाव में यदि कांग्रेस को वांछित सफलता नहीं मिली तो उससे भागने वालों की संख्या बढ़ सकती है। उदारता का चेहरा और कपट की राजनीति से लोगों को हमवार करने की जिस राजनीतिक चलन को वामपंथियों ने अपनाया था, उसके कारण आज उनकी जो स्थिति है, उसका संज्ञान लिए बिना तमाम विपक्षी दल उसी प्रकार के आचरण पर उतारू हैं। मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए उस रूढि़वादी चलन को अपना मुखौटा बना रहे हैं, जिसकी वे निंदा करते रहे हैं। उसके नाम पर वे भाजपा को बदनाम भी करते रहे हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों के चुनाव हुए, उससे एक बात उभर कर सामने आई है कि बहुमत समाज की उपेक्षा नहीं की जा सकती और हिन्दुओं को जाति व वर्ग में बांटकर भ्रमित भी नहीं रखा जा सकता। कुनबापरस्ती और भ्रष्टाचार का जो स्वरूप पिछले कई दशकों में देश में बेचैनी बढ़ा रहा था, उसके हामीकार महागठबंधन के नाम पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस कुनबापरस्ती और भ्रष्टाचार में जो रिकार्ड बना चुकी है, उसको तोड़ने के लिए अनेक क्षेत्रीय क्षत्रप जो अपने-अपने राज्यों में प्रभावशाली थे, उसी रास्ते पर चल पड़े। उत्तर प्रदेश की चाहे सपा हो या बसपा, बिहार का राष्ट्रीय जनता दल, जिसके मुखिया जेल में हैं या बंगाल की तृणमुल कांग्रेस, जिसकी मालिक ममता बनर्जी हैं या चन्द्रबाबू नायडू हों, ये सभी जो भाजपा हराओ मुहिम में एकजुट होने के लिए प्रयत्नशील हैं, एक ही प्रकार के आचरणधारी हैं। इसलिए व्यक्तिगत आक्षेपोंं और कपोलकल्पित आरोपों के सहारे खड़े होने का प्रयत्न कर रहे हैं। राहुल गांधी या कांग्रेस के अन्य नेताओं ने प्रधानमंत्री अथवा सरकार के उपलब्धियों, सेना के पौरुष पर जिस  तरह से उंगली उठाई है, उस पर जिन दलों ने मौन धारण कर अपनी सहमति व्यक्त की है, वे भी आज प्रश्नों के घेरे में हैं। फौज को हत्यारा बताने और उसके प्रमुख को सड़क छाप गुंडा तक कहने वाले भारतीय जनमत की अनुकूलता प्राप्त कर सकेंगे, यह दिवास्वप्न जैसा है।

देश इस समय दो विचारधाराओं और आचरण में विभाजित है। एक विचारधारा स्वांग, अनर्गल प्रचार और देश की एकता को खंड-खंड कर सत्ता में बने रहने के अब तक के उपायों पर रूप बदल-बदलकर प्रलोभन दे रही है। दूसरा पक्ष राष्ट्रीय सामूहिकता, स्वाभिमान और स्वावलंबन के पथ पर दुरूहता को दरकिनार कर बढ़ता जा रहा है।

देश इस समय दो विचारधाराओं और आचरण में विभाजित है। एक विचारधारा स्वांग, अनर्गल प्रचार और देश की एकता को खंड-खंड कर सत्ता में बने रहने के अब तक के उपायों पर रूप बदल-बदलकर प्रलोभन दे रही है। दूसरा पक्ष राष्ट्रीय सामूहिकता, स्वाभिमान और स्वावलंबन के पथ पर दुरूहता को दरकिनार कर बढ़ता जा रहा है। पहला पक्ष ठोस आधार न होने के कारण धरती पर नहीं टिक पा रहा है, भले ही आंधी के समान कुछ समय के लिए लोगों को आंख बंद करने पर विवश कर दे, लेकिन उस क्षणिक आंधी के बाद आंख खुलने पर जैसे आंधी से नष्ट हुए स्वरूप का उसे संज्ञान होता है, वही स्थिति इन दलों में ‘ला औ दा’ के लिए आग्रह से उभर कर सामने आ रही है। इन दलों का कोई भी नेता ऐसा नहीं है, जो भ्रष्टाचार के आरोप में कठघरे में न खड़ा हो। लालू यादव जेल में हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी जमानत पर हैं। ममता और मायावती जांच के घेरे में हैं।

इन सबके पद का दुरुपयोग कर सत्ता को संपत्ति का साधन बनाने के कई उदाहरण मौजूद हैं। अपनी उच्छृंखल अभिव्यक्ति और देशहित विरोधी तत्वों को संरक्षण देकर इन्होंने देश के बहुमत में एकजुटता की मानसिकता पैदा की है, उसका प्रतिनिधित्व करते हुए नरेन्द्र मोदी ने भारत की विश्वव्यापी स्वीकृति बढ़ाने का जो अभूतपूर्व काम किया है, उससे भारतीय जनमत इस बात के लिए संकल्पित दिखाई पड़ता है कि भले ही किन्हीं नीतियों से उसे कष्ट हुआ हो, वह भ्रष्टाचारियों और देश को टुकड़ों में बांटने वालों को तरजीह देने के पक्ष में नहीं खड़ा होगा।

कांग्रेस, जो आजकल नरेन्द्र मोदी पर कल्पित भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सत्ता में लौटने का ख्वाब देख रही है, उसमें अपने कुनबे के केवल एक ही व्यक्ति को विलुप्त कर दिया है, जिसने देश में सबसे पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध सफलतापूर्वक अभियान चलाया था। वे हैं वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दादा फिरोज गांधी। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में तत्कालीन वित्त मंत्री के विरुद्ध एक उद्योग घराने को अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप संसद में लगाकर त्यागपत्र देने के लिए बाध्य किया था।

ऐसे कुनबे को केवल मुखौटे के आधार पर कब तक तरजीह मिलेगी, यह प्रश्न महागठबंधन के नाम पर मंचीय एकजुटता प्रदर्शित करने वालों के दिलोदिमाग पर भी छा गई है। इसलिए भी कि इस मंचीय एकजुटता पर दिखाई पड़ने वाले शरद पवार ने कहा है कि नरेन्द्र मोदी की नीयत पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाया जा सकता। विपक्षी एकता के लिए धागे के समान अपने को साबित करने के लिए प्रयत्नशील वामपंथी अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए जूझ रहे हैं और उनके समर्थन में विभाजक और देश विरोधी तत्वों को बौद्धिक समर्थन देने वालों की पोल खुल रही है। बहुमत के हितों को बलि देकर अल्पमत के तुष्टिकरण की राजनीतिक चलन का पर्दाफाश हो चुका है। अब स्वांग रचने या मुखौटा धारण कर विपक्षी एकजुटता भी महाठगबंधन साबित हो रही है। ठगने के लिए एक दूसरे का हाथ पकड़कर खड़े होने मात्र से आवाम को भ्रमित नहीं किया जा सकता है।

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