औंधे मुंह गिरे राहुल

0
19

कांग्रेस राख से उठने की कोशिश में लगी है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जब राफेल को फुस कर दिया, उसके बाद भी राहुल गांधी पूरा जोर लगा रहे हैं। यही दोहरा रहे हैं कि उसमें गड़बड़ी हुई है। अपनी बात को सही साबित करने के लिए दूसरे का हवाला भी दे रहे हैं

जनहित याचिका बेबुनियाद है। उसका कोई सिर-पैर नहीं है। उसमें जो तथ्य दिए गए हैं, वे अपर्याप्त हैं। राफेल मसले पर 10 अक्टूबर को जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा, उसका सार यही है। इस पर तीन जनहित याचिकाएं पड़ी थीं। तहसीन पूनावाला ने अपनी याचिका वापस ले ली है। सुनवाई एमएल.शर्मा और विनोद धांडा की याचिका पर हुई। कोर्ट ने कहा ‘दोनों वकीलों ने जो याचिकाएं दाखिल की हैं, उनमें तथ्य आधे-अधूरे हंै।’ इसलिए उस पर बात ही नहीं हो रही है। उनमें जो आरोप लगाए गए हैं, उन्हें नहीं माना जा रहा है। इसी वजह से सरकार को कोई नोटिस जारी किया नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि वह इस सौदे के बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं चाहती। उसका सरोकार महज निर्णय प्रक्रिया से है। कोर्ट अपनी संतुष्टि के लिए जानना चाहता है कि राफेल की खरीद कैसे हुई? इसकी जानकारी सरकार को 29 अक्टूबर तक कोर्ट को सील बंद लिफाफे में सौंपनी है। उस पर सुनवाई 31 अक्टूबर को होगी। लेकिन कोर्ट ने जो कहा है, उससे राहुल गांधी
राफेल सौदा औंधेमुंह गिर गए हैं। वे राफेल को लेकर हवाई किले बना रहे थे। उसकी बुनियाद में ‘रागनीति’ का र्इंट-गारा है। अरुण शौरी और यशवंत सिंहा सरीखे लोग भी उसी ‘रागनीति’ के फेरे में पड़े हैं। उन्हें भी राफेल सौदे में गड़बड़ी दिख रही है।

वे लोग तो प्रशांत भूषण को लेकर सीबीआई में शिकायत करने पहुंच गए थे। खबर यह भी है कि सीबीआई के निदेशक से भी मिले हैं। राफेल सौदे की जांच उनसे करवाना चाहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि प्रशांत भूषण ने इसे लेकर कोई जनहित याचिका कोर्ट में दायर नहीं की। शायद उन्हें डर था कि जो हाल कोर्ट ने राफेल से जुड़ी अन्य जनहित याचिकाओं का किया है, वही उनकी भी याचिका का होता। संभव है इसीलिए उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बजाय सीबीआई की ओर रुख किया। वहां जो दस्तावेज उन्होंने पेश किया है, उससे नहीं लगता है कि कोई केस बनने वाला है। फिर भी शेखचिल्ली के सपने पालने में क्या बुराई है। कोई भी पाल सकता है। पूर्व वित्तमंत्री ने भी पाला है जबकि वह खुद जमानत पर है।

दॉसाल्ट ने तकरीबन 70 कंपनियों को अपना साझीदार बनाया है। उनमें हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड भी शामिल है। लेकिन सबसे बड़ा साझीदार रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन बनकर उभरा है। उसके साथ 9000 करोड़ रुपये की साझेदारी दासॉल्ट ने की है।

उन्होंने राफेल सौदे को लेकर सरकार से कुछ सवाल पूछे हैं। ये वही सवाल हंै जो उनके अध्यक्ष राहुल गांधी उठा रहे हैं। उसको एक परिपेक्ष्य में पी.चिदंबरम ने पेश किया। पिछले दिनों एक अंग्रेजी दैनिक ने उसे छापा भी। इसे जिस अखबार ने छापा है, उसके प्रधान संपादक रहे शेखर गुप्ता का साक्षात्कार भी एक दैनिक अखबार में आया है। उनका कहना है ‘राफेल सौदे में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है।’ वे कहते हैं ‘राफेल में कोई ऐसा सबूत नहीं मिला है जिससे भ्रष्टाचार लगे।’ मेघानंद देसाई लिखते है कि रक्षा सौदे को लेकर राजनीति होती रही है। इसका लंबा इतिहास रहा है। इसी डर की वजह से एके. एंटनी ने राफेल सौदे को हाथ नहीं लगाया। वह दस साल तक अधर में लटका रहा। वे आगे कहते है ‘जिस हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड को लेकर शोर हो रहा है, वह आज तक एक लड़ाकू विमान नहीं बना पाया।’
इस विवाद पर अंग्रेजी पत्रिका ‘जीफाइलस’ ने लंबी रपट की है। उसके मुताबिक संप्रग सरकार के दौरान राफेल खरीद को लेकर जो बात चल रही थी, वह दूसरे किस्म की थी। उसमें संप्रग सरकार ने तय किया था कि 18 विमान सीधे फ्रांस खरीदे जाएंगे। बाकी 108 विमान भारत में बनेंगे। उस हालात में भारत के पास बतौर विशेषज्ञ कंपनी हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड ही था। आज भी विमान बनाने के लिए विकल्प वही है। इसलिए हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड का चुनाव हुआ था। मगर मौजूदा सरकार ने जिस सौदे को अंजाम दिया है, उसमें विमान भारत को बनना ही नहीं है। सारे विमान सीधे फ्रांस से आएंगे। इसलिए हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड जैसी कंपनी की आवश्यकता नहीं पड़ी। दूसरी बात, यह कहना गलत है कि हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड राफेल सौदे में साझीदार नहीं है।

‘जीफाइलस’ की मानें तो इस सौदे में दासाल्ट ने तकरीबन 70 कंपनियों को अपना साझीदार बनाया है। उनमें हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड भी शामिल है। लेकिन सबसे बड़ा साझीदार रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन बनकर उभरा है। उसके साथ 9000 करोड़ रुपये की साझेदारी दासॉल्ट ने की है। इसीलिए सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस राफेल को लेकर दुष्प्रचार क्यों कर रही है? इस संबंध में एक थ्योरी चल रही है। उसकी मानें तो यह अतंरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियों का षड़यंत्र है। वे दासॉल्ट के साथ हुए सौदे से नाराज हैं। दासॉल्ट के साथ निविदा में अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन और यूरोफाइटर टाइफून ने हिस्सा लिया था। सरकार ने दासॉल्ट को चुना था। बाकी दोनों कंपनियों को बाहर कर दिया था। कहा जा रहा है कि इसी वजह से सरकार को बदनाम करने में लगे हैं। इसका ठेका कांग्रेस को दिया है। दावा किया जा रहा है कि राहुल गांधी जब विदेश गए थे, तो कई रक्षा कंपनियों के अधिकारियों से मिले थे। वहीं से सारा ताना-बाना बुना गया। इस बाबत बेवपोर्टल ‘माइ नेशनल’ ने खबर की थी। उसने दावा किया है कि जब राहुल गांधी अमेरिका गए थे, तब वह कई रक्षा कंपनियों के प्रतिनिधियों से मिले थे।

पोर्टल की मानें तो इन लोगों से राहुल गांधी को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने मिलवाया था। उस कांग्रेसी नेता का अमेरिकी एविएशन कंपनियों से गहरा ताल्लुक रहा है। पोर्टल के मुताबिक उसी मुलाकात के बाद राफेल सौदे को कांग्रेस ने मुद्दा बनाना शुरू किया। यह बात गुजरात चुनाव के समय की है। उसके बाद से राफेल तूल पकड़ता गया। बताया जाता है कि जर्मनी दौरे में भी वह कई कंपनियों के लोगों से मिले थे। अंग्रेजी न्यूज पोर्टल ओपइंडिया का दावा है कि वहां पर भी राफेल को लेकर रणनीति बनी। उसे आकार देने में संजय भंडारी की भूमिका रही। वह एयरबस का एजेंट था।
यूरोफाइटर टाइफून बनाने वाली कंपनियों में एयरबस भी शामिल है। तो क्या माना जाए कि राफेल मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने के लिए कांग्रेस अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बना रही है? पोर्टल तो यही दावा कर रहा है। बतौर सबूत वह राहुल गांधी का ट्वीट दिखा रही है जो उन्होंने जर्मनी जाने से पहले किया था। उसमें राहुल गांधी वैश्विक भ्रष्टाचार, राफेल सौदे और भारत सरकार का घालमेल करते हैं। वही घालमेल जो सुप्रीम कोर्ट को भी समझ में नहीं आया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here