आरोपियों के संरक्षक

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सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के मामले की सुनवाई टल गई है। केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त ने सील बंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंप दी है। उन पर दो करोड़ रुपये रिश्वत लेने का आरोप है। आलोक वर्मा पर एक आरोप यह भी है कि उन्होंने एयरसेल-मैक्सिस मामले को कमजोर किया है। इस मामले में आरोपी पी.चिदंबरम हैं। दावा किया जा रहा है कि वे चिदंबरम को बचाने में लगे हैं। यह आरोप पूर्व आयकर अधिकारी डीपी कर ने लगाया है। उन्होंने इस बाबत एक शिकायत केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, सीबीआई के अंतरिम निदेशक और न्यायमूर्ति एके पटनायक को भेजी है।

उसमें जो लिखा है, वह कई सवाल खड़े करता है। मसलन क्या सचमुच आलोक वर्मा, पी.चिदंबरम को बचा रहे थे। पत्र में दावा किया गया है कि 2 अप्रैल 2018 को आयकर विभाग के एक अधिकारी आलोक वर्मा से मिले थे। उस अधिकारी का नाम एसके.श्रीवास्तव है। उन्होंने आलोक वर्मा और संयुक्त निदेशक एके.शर्मा को एयरसेल-मैक्सिस घोटाले के बारे में जानकारी दी थी। यह मुलाकात कई घंटे चली थी। सीबीआई को बताया गया था कि किस तरह मैक्सिस कंपनी ने पी.चिदंबरम को बतौर रिश्वत 200 करोड़ रुपये दिये थे। पत्र की मानें तो विदेश निवेश संवर्धन बोर्ड से अनुमति लेने के लिए पी.चिदंबरम और उनके पुत्र कार्ति चिदंबरम को मैक्सिस कंपनी के मालिक टी.आनंद कृष्णनन ने 200 करोड़ रु एनडीटीवी के जरिए दिए थे। हुआ यह था कि मैक्सिस कंपनी ने एनडीटीवी सब्सिडरी एनडीटीवी लाइफस्टाइल होल्डिंग प्राइवेट लि. का 40 फीसदी शेयर खरीद लिया था। इसके लिए मैक्सिस ने 200 करोड़ रुपये चुकाए थे। जबकि वास्तव में उस कंपनी का बाजार मूल्य कुछ लाख रुपये से ज्यादा नहीं था। बावजूद इसके मैक्सिस ने 40 फीसद हिस्सेदारी के लिए 200 करोड़ रुपये चुकाए।

यह किस्सा एसके.श्रीवास्तव ने आलोक वर्मा को बताया। उन्होंने निदेशक को साक्ष्य भी दिए। उन्होंने संयुक्त निदेशक एके.शर्मा को इसकी जांच करने के लिए कहा। पर आलोक वर्मा ने कुछ किया नहीं। वे आरोपियों को ही बचाने लगे रहे। पत्र में लिखा है कि आलोक वर्मा ने पी.चिदंबरम और एनडीटीवी पर कोई कार्रवाई नहीं की। अलबत्ता वे साक्ष्यों को आरोपियों तक पहुंचाने में लगे रहे। उन्हें आगाह करने में लगे रहे। पत्र के मुताबिक सीबीआई ने पी.चिदंबरम वाली शिकायत पर वह सक्रियता नहीं दिखाई जैसा कि सतीश बाबू सना की शिकायत पर दिखाई। इस मामले में तो सीबीआई ने अपना ही रिकार्ड तोड़ दिया। जहां वह हर मामले को प्रक्रिया का हवाला देकर लटकाती रहती थी, वहीं इस मसले में सीबीआई के सामने कोई बाधा नहीं आई। उसने सतीश बाबू सना की शिकायत पर त्वरित गति से कार्रवाई की। उसको आधार बनाकर तुरंत एफआईआर दर्ज कर लिया।

यह सब उस मामले में हो रहा था जिसमें साक्ष्य के तौर पर कोई दस्तावेज नहीं थे। बस एक शिकायत थी। उसे बतौर दस्तावेज पेश करने के लिए मजिस्ट्रेट के सामने सतीश सना का बयान रिकार्ड कराया गया। लेकिन पी.चिदंबरम के मामले में वे निष्क्रिय हो गए। इसमें तो उनके पास शिकायत भी थी और साक्ष्य भी। पर उन्होंने इसका संज्ञान नहीं लिया।
पत्र में लिखा है कि जिस तरह की कार्रवाई एयरसेल-मैक्सिस मामले में सीबीआई और आलोक वर्मा ने की है, फर्जी है। डीपी.कर का दावा है कि इस मामले में कई तथ्यों को छुपाया गया है। पी.चिदंबरम को 200 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी। लेकिन उसे लेकर चार्जशीट खामोश है। जाहिर है कि सीबीआई ने इसे मामले में जांच पड़ताल करना मुनासिब नहीं समझा। उनका दावा है कि सीबीआई इस लेनदेन को छुपा रही है।

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