आंदोलन की राह पर किसान

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किसान अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं। फसल ऋण मांफी और फसल का लाभकारी दाम तय करने की मांग को लेकर अलग-अलग धरना-प्रदर्शन नहीं करेंगे। अब वे राष्ट्रीय स्तर पर किसानों का एक मंच बनाकर आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं।

देश भर के किसान संगठनों के बीच एकता बनाने की कोशिश हो रही है। अब यह कोशिश रंग भी ला रही है। पिछले दिनों चंडीगढ़ में 50 किसान संगठनों ने दो दिवसीय बैठक कर राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की रूपरेखा बनाई। बैठक के दौरान अधिकांश किसान संगठनों का मत था ‘देश में किसानों की संख्या सबसे अधिक होने के बावजूद शासन उनकी बात नहीं सुनता है। इसका सीधा कारण किसानों के बीच एकता का अभाव है। किसान हितों की बात करने वाले सारे संगठन यदि संगठित होकर आंदोलन करें तब सरकार उनकी मांगे मानने पर विवश होगी।’

राष्ट्रीय किसान महांसघ की बैठक में उपस्थित संगठनों ने राष्ट्रीय स्तर पर किसान समस्याओं को उठाने की बात कही। भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) हरियाणा इकाई के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चंदूनी ने कहा कि, ‘केंद्र सरकार किसान विरोधी नीतियां लागू कर रही है। इसके खिलाफ देश भर में आंदोलन किया जाएगा।’

चंडीगढ़ में बैठक के बाद राष्ट्रीय किसान महासंघ ने दो चरणों में आंदोलन करने का ऐलान किया है। पहले चरण में देश भर में ‘किसान जागृति यात्रा’ निकाली जायेगी। इसकी शुरुआत 24 नवंबर को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में प्रसिद्ध किसान नेता सर छोटूराम के जन्मदिन पर होगी।

समय रहते यदि किसानों की समस्याओं पर ध्यान और मांगों पर विचार नहीं किया गया तो आने
वाले दिनों में किसान केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। देश भर के किसान
संगठन राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ने की तैयारी में जुटे हैं।

किसान जागृति यात्रा में किसानों को केंद्र और राज्य सरकारों के किसान विरोधी नीतियों को बताया जायेगा। दूसरे चरण में किसान संगठनों ने तय किया है कि 23 फरवरी को दिल्ली में घेराव किया जायेगा। घेराव का मुख्य उद्देश्य किसान ऋण माफी और फसलों का लाभदायक कीमत तय करने की मांग है।

किसान महासंघ ने आंदोलन को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक कोर कमेटी का गठन किया है। कोर कमेटी में शिवकुमार (मध्य प्रदेश), गुरनाम सिंह (हरियाणा), हरपाल सिंह (उत्तर प्रदेश) जगजीत सिंह (पंजाब), राजकुमार गुप्ता (छत्तीसगढ़), अक्षय कुमार (ओडिशा) और  संतबीर सिंह (राजस्थान) को संयोजक नियुक्त किया गया है। ये सारे किसान नेता अपने प्रदेशों में आंदोलन का संयोजन करेंगे।

ओडिशा का नव निर्माण किसान संगठन 11 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर महासम्मेलन करने जा रहा है, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, गांधीवादी अन्ना हजारे के शामिल होने की सूचना है। राष्ट्रीय किसान समन्वय समिति ने एक नवंबर से अनिश्चितकालीन सत्याग्रह करने की घोषणा की है। किसान नेता हरपाल सिंह कहते हैं, ‘देश में आज भी 60 प्रतिशत से अधिक लोग खेती से जुड़े है। आज भी अधिकांश खेती मानसून पर आधारित है।

किसानों को सूखा एवं बाढ़ के बाद सरकारी नीतियों का खामियाजा भुगतना पड़ता है। किसानों को उनके उत्पाद का वाजिब दाम नहीं मिलता है। जितना पैसा वो फसल उगाने में लगा रहे हैं उतना भी उन्हें बेचने पर नहीं मिल रहा है। खेती घाटे का सौदा बन गया है। किसान पुत्र गांव छोड़ कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। शहरों में आकर वे मजदूर बन रहे हैं।’

नवनिर्माण किसान संगठन के राष्ट्रीय संयोजक अक्षय कुमार कहते हैं कि, ‘किसान सबसे ज्यादा अप्रत्यक्ष कर देता है। इस पैसे से मंत्री और नौकरशाह लाखों रुपये की तनख्वाह ले रहे हैं और किसान दर-दर की ठोकरें खा रहा है।’

भारत गांवों का देश है। भारत की संस्कृति को कृषि संस्कृति कहा जाता है। कृषि सबसे अधिक लोगों को रोजगार देने वाला क्षेत्र है। लेकिन इस क्षेत्र की लगातार उपेक्षा हो रही है। छत्तीसगढ़ के राजकुमार गुप्ता कहते हैं, ‘आजादी के बाद से हर सरकार यह घोषणा करती रही है कि कृषि उनकी पहली प्राथमिकता है। इसके बावजूद हर सरकार कृषि विरोधी नीति बनाती है। कृषि भूमि के अधिग्रहण से लगातार खेती की जमीन कम हो रही है। फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलने से किसान कर्ज में डूब कर आत्महत्या कर रहा है।’

किसान सरकारी आश्वासनों से अब तंग आ चुके हैं। सरकार आश्वासन तो किसान हित में नीति बनाने की देती है। लेकिन हर नीति कारपोरेट समर्थक और किसान विरोधी होता है। कृषि बजट का ज्यादातर हिस्सा कृषि उपकरण बनाने वाले कंपनियों को मिलता है। आज खेती का हाल ये है कि किसान खेती से अपने परिवार की बुनियादी आवश्यकता पूरा नहीं कर सकता है। महंगे खाद, बीज और पानी किसानों को तबाह करने के लिए काफी हैं।

अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों का हाल बेहाल है। जगह-जगह किसान धरना-प्रदर्शन करके अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन सरकारों के कान पर जूं नहीं रेंग रही है। किसान संगठन किसानों के आक्रोश को सामूहिक स्वर देने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में किसान दिल्ली में एकजुट होकर आंदोलन करेंगे।

सरकार की कृषि नीति ही किसानों की बदहाली का प्रमुख कारण है। विश्व व्यापार संगठन का
कृषि समझौता भारत की खेती किसानी के लिए घातक सिद्ध हुआ है। भारत
को डब्ल्यूटीओ की व्यवस्था से तुरंत बाहर निकल आना चाहिए।
डब्ल्यूटीओ की व्यवस्था जनविरोधी है।

किसानों का कहना है कि अब हमें अपने समस्याओं का समाधान चाहिए। हर सरकार अपने को किसानों का सच्चा हमदर्द बताती है। लेकिन इस सबके बीच किसानों का दर्द कम नहीं हो रहा है। फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने से किसानों की समस्याएं लगातार बढ़ रही है।

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं,’किसान कर्जमाफी की बात जब होती है तो सरकार तरह-तरह के नियमों का हवाला देती है। लेकिन  जब कॉरपोरेट का ऋण माफ करना होता है तो सरकार राजकोषीय घाटे को भूल जाती है।’ आजादी बचाओ आंदोलन के मनोज त्यागी कहते हैं, ‘सरकार की कृषि नीति ही किसानों की बदहाली का प्रमुख कारण है। विश्व व्यापार संगठन का कृषि समझौता भारत की खेती किसानी के लिए घातक सिद्ध हुआ है। भारत को डब्ल्यूटीओ की व्यवस्था से तुरंत बाहर निकल आना चाहिए। डब्ल्यूटीओ की व्यवस्था जनविरोधी है।’

जगजीत सिंह कहते हैं प्रथम हरित क्रांति के द्वारा कृषि रसायनों और तथाकथित उन्नत संकर बीजों के व्यापार को प्रोत्साहित कर देश में खाद, बीज, कीटनाशक और कृषि औजारों के बाजार का विस्तार किया गया जिससे खेती में लागत बढ़ गई। बीज, खाद, कीटनाशक, कृषि यंत्र, डीजल की कीमतें कंपनियां तय करती हैं और अपनी कीमतों पर बाजार में बेचती हैं। लेकिन खेती में पैदा होने वाले फसल की कीमत किसान नहीं तय करता है। सरकार इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है।

इसके साथ ही सरकार कृषि फसलों की आयात-निर्यात नीतियों का उपयोग महंगाई को नियंत्रित करने के नाम पर हमेशा व्यापारी और कारपोरेट घरानों को लाभ पहंुचाने के लिए करती है। ऐसे में किसानों की समस्या के लिए सरकार ही जिम्मेवार है।

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