अर्थव्यवस्था के आईने में 2018

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2018 सभी के लिए अच्छा रहा और हमारे विकास की दर के बारे में विदेशी रेटिंग एजेंसियों और आईएमएफ की राय है कि यह कम से कम 7 से 7.5 के बीच रहेगी। यह उत्साहवर्धक है। पिछले दिनों यह खबर भी आई थी कि इज आॅफ डूइंग बिजनेस में भारत ने लंबी छलांग लगाई थी और वह 77 वें स्थान पर जा पहुंचा। यह रैंकिंग आने वाले समय में और भी सुधरेगी।

अर्थव्यवस्था के लिए यह साल खुशगवार रहा और विकास दर फिर कुलांचे भरने लगी। नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी ने अर्थव्यवस्था की राह में जो व्यवधान पैदा किया था, वह खत्म हो गया। इससे सरकार को भी राहत मिली और आने वाले समय के लिए बढि़या संकेत मिले हैं। उम्मीद की जा रही है कि हमारी विकास दर की तेजी बरकरार रहेगी और यह 8 प्रतिशत से कुछ ज्यादा रहेगी। इस साल जून में ही यह वार्षिक आधार पर जून महीने में 8.2 % रही। इसमें किसी तरह की कमी की कोई गुंजाइश अब नहीं है। कृषि क्षेत्र में विकास दर में जो बढ़ोतरी देखी जा रही है वह अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रही है।

छठे नंबर की अर्थव्यवस्था

इस साल जो सबसे बड़ी बात हुई है, वह यह कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में छठे स्थान पर पहुंच गई। फ्रांस को पीछे छोड़ते हुए हम तेजी से आगे निकल गए हैं। अगले साल आम चुनाव के पहले ग्रेट ब्रिटेन को भी छोड़ देंगे। लेकिन इसका फायदा हमें नहीं दिखता और उसकी वजह है कि हमारी आबादी दुनिया में दूसरे नंबर पर है। इसलिए जो भी आर्थिक बढ़त होती है वह इस विशाल जनसंख्या में बंट जाती है। प्रति व्यक्ति आय यानी पर कैपिटा इनकम में जो वृद्धि होती है वह बहुत होती है। यह तब तक होती रहेगी, जब तक हमारी अर्थव्यवस्था का आकार बहुत बड़ा नहीं हो जाता। वित्त मंत्री ने कहा कि इस पर खुशी तो जाहिर की है, साथ ही कहा है कि गरीबों तक इसका लाभ पहुंचे, यह सरकार का मकसद है।

निर्यात में बढ़ोतरी

भारत का निर्यात इस साल बढ़ा है। खुशी की बात है कि आयात उसकी तुलना में उतना नहीं बढ़ा है। इस साल मई में हमारा निर्यात 28.86 अरब डॉलर रहा जबकि पिछले साल इस अवधि में यह 24.01 अरब डॉलर का था। यानी कुल 20.18 प्रतिशत की बढ़ोतरी। अच्छी बात यह रही कि हमारा आयात उतना नहीं बढ़ा जबकि कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे थे और अब इनमें गिरावट आ रही है। उम्मीद की जा सकती है कि ताजा आंकड़ों में इसमें और कमी आएगी। भारत जिस तरह से चीन पर दबाव डाल रहा है उससे लगता है कि हमारे आयात में कमी आएगी और इसका असर व्यापार संतुलन पर पड़ेगा जो इस समय पूरी तरह से चीन के पक्ष में है। अगले साल इसका असर दिख सकता है।

बेहतरी के तीन कारण

बीते साल यानी 2018 में जिन तत्वों ने हमारी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया, आइए, उन पर एक नजर डालते हैं। सबसे बड़ी बात थी सरकार की ओर से खर्च यानी वो पैसा जो सरकार अपनी योजनाओं तथा गैरयोजनाओं पर खर्च करती है, में काफी वृद्धि हुई जिससे बाजरों में तरलता की कमी नहीं रही और सभी सेक्टर में पैसा आया। सरकारी खर्च का भारतीय अर्थव्यवस्था में काफी महत्व रहता है और इससे विकास दर पर फर्क पड़ता है। यह पैसा सालाना बजट में निर्धारित होता है और इसके खर्च का बाजार को इंतजार भी रहता है। इस साल वित्त वर्ष की पहली तिमाही (मार्च से जून) में सरकार ने निर्धारित खर्च से ज्यादा खर्च किया और यह कुल बजट का 29 प्रतिशत रहा। औसतन सरकार हर तिमाही में 25 प्रतिशत खर्च करती है लेकिन यहां पर खर्च अधिक रहा। बाजार में तरलता हमेशा कारोबार के हित में रहती है।

लेकिन सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना पड़ेगा कि ज्यादा खर्च न हो जाए जिससे राजस्व घाटा बढ़ जाए और मुद्रास्फीति के हालात पैदा न हो जाएं। कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसने कुल रोजगार का कम से कम 70 प्रतिशत रोजगार दे रखा है। इसके अलावा यह सवा अरब आबादी का पेट भरती है। इस साल कृषि विकास की दर पहली तिमाही में 5.3 रही जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह महज 3 प्रतिशत थी। इसने अर्व्यवस्था में जान डाल दी है। इस साल बेहतर मानसून के कारण भी फसल अच्छी होने का अनुमान है जिससे कुल विकास दर में तेजी आएगी। जब फसलें अच्छी होती हैं तो किसानों की क्रय शक्ति बढ़ती है और वे खरीदारी करते हैं जिसका सकारात्मक असर संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

अलविदा उर्जित

रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने अंतत: इस्तीफा दे ही दिया। करीब एक माह से ऐसी खबरें आ भी रही थीं। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के 24वें गवर्नर के रूप में उन्होंने महज 53 साल की उम्र में पद संभाला। अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही विवादों में आ गए। रघुराम राजन की विदाई के बाद उनका आना कांग्रेस को नहीं सुहाया और उन पर अंबानी का रिश्तेदार होने जैसी बेहद हल्की बातें कही गईं। उनके दादा काफी पिछली सदी में ही गुजरात से केन्या चले गए थे। वहां के नैरोबी शहर में उर्जित के पिता ने अपना व्यवसाय जमाया। वहां स्कूली शिक्षा पाने के बाद वह लंदन स्कूल आॅफ इकॉनिमिक्स में स्रातक करने के लिए इंग्लैंड चले गए। उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में से एक येल यूनिर्विसटी से डॉक्टरेट किया और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत डेस्क पर तीन वर्षों तक रहे। इस बीच वह भारत भी आए और यहां रिजर्व बैंक में प्रतिनियुक्ति पर रहे। यूपीए काल में यानी 2000 से 2004 तक वह सरकार की ओर से काम करते रहे। 2013 में उन्हें डिप्टी गवर्नर बनाया गया। सरकार ने बाद में उन्हें रिजर्व बैंक का गवर्नर 2016 में नियुक्त कर दिया। शुरू में उन्हें नोटबंदी के दौरान काफी कुछ सुनना पड़ा लेकिन शांत स्वभाव के उर्जित अपना काम होशियारी से करते रहे और उन्होंने रिजर्व बैंक को संभाले रखा।

कृषि ने हमें हमेशा सहारा दिया है और इस पर निवेश करने की जरूरत है। इस साल एक और बात हुई और वह कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी आई। इस सेक्टर का भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान 12-13 प्रतिशत का है और यह कुल रोजगार का 12 प्रतिशत देता है। 2025 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 खरब डॉलर में तब्दील करने का प्रधानमंत्री का सपना यही सेक्टर पूरा करता है। इसमें बढ़ोतरी लाजिमी है और इसने 2018 से कुलांचे भरनी शुरू कर दी है। इस साल अप्रैल-जून में इसमें 13.46 प्रतिशत की तेजी आई और अगर यह गति बरकरार रही तो आने वाले समय में जीडीपी विकास दर बढ़ेगी। पिछले कुछ वर्षों में इसमें तेजी आ रही है और उम्मीद की जा सकती है कि यह तेजी बनी रहेगी। लेकिन जरूरी है कि यह सेक्टर रोजगार भी पैदा करे। इसके लिए आवश्यक है कि खपत बढ़े जिससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की तेजी भी बनी रहे। 2018 में इसके संकेत मिल रहे हैं। एक बात और इस साल देखने में आई, वह यह कि अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ा। नोटबंदी के बाद इसमें व्यवधान आ गया था।

लेकिन इस साल जून तक अर्थव्यवस्था में 11.3 प्रतिशत नकदी थी जिससे खेतिहरों तथा छोटे उद्यमियों को आसानी हुई और बाजार में तरलता आई। आने वाले समय में यह 12 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच जाएगी जो नोटबंदी के पहले थी। आरबीआई से विवाद इस साल ही नहीं बल्कि पिछले साल भी सरकार का आरबीआई से विवाद चलता रहा। लेकिन इस साल अगस्त में हालात बिगड़ गये थे। उस समय सरकार ने केन्द्रीय बैंक से उसके पास रखे अतिरिक्त धन को बाहर निकालने की मांग की ताकि छोटे और मध्यम उद्योगों को सहारा मिल सके। कहा गया कि सरकार की ओर से रिजर्व बैंक को धमकी भी मिली कि वह इस अतिरिक्त राशि को देने से इनकार करेगा तो धारा 7 लगा दी जाएगी जिसके तहत इसके सारे प्रमुख अधिकार सरकार के हाथों में आ जाएंगे। सरकार ने इसका खंडन किया और कहा कि ऐसी धमकी नहीं दी गई।

आरबीआई की आजादी बरकरार रहेगी। हालांकि ऐसी स्थिति से नाराज होकर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया। उर्जित पटेल की निंदा करने वाली कांग्रेस पार्टी उनके साथ खड़ी हो गयी। माना जा रहा है कि उर्जित के इस्तीफे से अर्थ जगत की गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। 2018 सभी के लिए अच्छा रहा और हमारे विकास की दर के बारे में विदेशी रेटिंग एजेंसियों और आईएमएफ की राय है कि यह कम से कम 7 से 7.5 के बीच रहेगी। यह उत्साहवर्धक है। पिछले दिनों यह खबर भी आई थी कि इज आॅफ डूइंग बिजनेस में भारत ने लंबी छलांग लगाई थी और वह 77 वें स्थान पर जा पहुंचा। यह रैंकिंग आने वाले समय में और भी सुधरेगी।

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