अर्थव्यवस्था की बर्बादी

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किसानों की कर्जमोफी जैसी समस्या का राजनीतिक समाधान खोजना ही होगा। इससे मुठ्ठीभर बड़े किसानों को ही तात्कालिक लाभ होता है। छोटे किसान वंचित ही रह जाते हैं। बड़ी आबादी को कर के रूप में भरपाई करनी होती है।

पांच राज्यों के चुनाव में जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया था, वह था किसानों के कर्ज माफी का मामला। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में नई सरकार बनते ही किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा हुई। इतना ही नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो यहां तक कहा है कि देश भर के किसानों का कर्ज जब तक माफ नहीं होगा, वह नरेन्द्र मोदी को चैन से सोने नहीं देंगे। अब राहुल गांधी के इस बयान के बाद नरेन्द्र मोदी चैन से सो रहे हैं या नहीं, लेकिन सरकारी बैंकों के प्रमुखों की नींद उड़ गई है। उनका मानना है कि यह ऐसा जहर है जो भारत की फलती-फूलती अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकता है। यह सच भी है क्योंकि पूरे देश में किसानों को कर्ज मिला है और उसकी कुल राशि करोड़ों में है।
हाल के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ पांच राज्यों में ही किसानों के कर्ज के रूप में 3 लाख 28 हजार करोड़ रुपये बकाया है। अब सवाल है कि कर्ज माफी के लिए यह विशाल राशि आएगी कहां से और अगर आ भी गई तो उसके बाद संबन्धित राज्य अपने अन्य कार्यों के लिए धन कहां से लाएंगे? आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में कर्ज माफी के बाद बमुश्किल इतना धन भी नहीं बचा है कि अगले तीन महीने सरकार कोई बड़ा काम कर सके।

अर्थशास्त्रियों ने भी दी चेतावनी
पिछले दिनों रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के साथ ही कई अन्य अर्थशास्त्रियों ने भी चेताया कि कृषि कर्ज माफी की परंपरा को खत्म कर दिया जाए। उनका कहना था कि इस माफी का फायदा मुट्ठी भर किसानों को ही मिलता है और बड़ी तादाद में अन्य किसान इनसे वंचित रह जाते हैं। उहोंने यह भी कहा है कि कृषि में अभी और भी निवेश की जरूरत है। इसके तहत नए किस्म के बीजों के विकास और शोध हो तथा हर एकड़ जमीन पर निश्चित प्रोत्साहन राशि दी जाए। सिंचाई के तरीके बदले जाने पर भी उन्होंने जोर दिया। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को मजबूत करने पर भी उन्होंने जोर दिया है। ऐसे ही सुझाव कई अन्य विशेषज्ञों ने दिए हैं।

किसानों के कर्ज का मामला कोई नया नहीं है लेकिन समय के साथ-साथ यहां फंसी राशि अरबों रुपये से भी ज्यादा होती चली गई है। इसके साथ ही किसानों के सब्र का बांध भी टूटने लगा है। उधर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में हालात बहुत बिगड़ गए और किसान कर्ज चुकाने में असमर्थ हो गए। इसने आंदोलनों को जन्म दिया। यह मामला धीरे-धीरे राजनीतिक बनता चला गया और अब पूरे देश में किसानों का कर्ज माफ करने की मांग होने लगी है। लोकसभा के चुनाव में अब ज्यादा देर नहीं है। ऐसे में यह मुद्दा और गरमाता जा रहा है।
भारत में कृषि रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है और आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा आज भी इस पर आश्रित है। जीडीपी में इसका योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। अनाज उत्पादन के मामले में हम दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं। हमारी इसी उपलब्धि ने कर्ज संकट को जन्म भी दिया। दरअसल अनाजों के जबर्दस्त उत्पादन से बाजार में अधिकतर (सरप्लस) की स्थिति पैदा हुई और किसानों को उनकी उपज का मूल्य मिलना तो दूर, बिक्री होना भी भारी पड़ने लगा। मध्य प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां बेहतर सुविधाओं, सिंचाई में बढ़ोतरी और बिजली की उपलब्धता से कृषि उपज में भारी बढ़ोतरी हुई। इसने वहां के आर्थिक समीकरण को बदल दिया। आंकड़ों के मुताबिक वहां कृषि उपज में बढ़ोतरी की सालाना दर 14.2 प्रतिशत रही। 2005 में वहां कुल 60 लाख टन अनाज का उत्पादन हुआ जो 2014-15 तक बढ़कर एक करोड़ 71 लाख टन हो गया। इस बढ़ोतरी ने राज्य सरकार को प्रतिष्ठा तो दी लेकिन अतिउपज के कारण किसानों को उचित मूल्य तो मिलना दूर, अनाजों की बिक्री होना भी भारी पड़ गया। उत्त्पादन तो अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा लेकिन अनाजों की बिक्री का कोई रास्ता नहीं निकला। 50 रुपये प्रति किलो बिकने वाली अरहर दाल 30-35 रुपये के भाव पर भी बमुश्किल बिकी, यही हाल अन्य अनाजों का रहा। आज कृषि संकट का एक बड़ा कारण यह भी है। कई राज्यों में अतिवृष्टि या अनावृष्टि से भी फसलें मारी गईं जिससे किसानों को भारी आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा। यही है किसान आंदोलनों की जड़। उत्तर प्रदेश, असम, पंजाब आदि कई राज्यों ने किसानों के कर्ज को माफ भी किया और हजारों करोड़ रुपये खर्च किए।
किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने 2004 में स्वामीनाथन आयोग बनाया था। उसकी सिफारिशें आज तक पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई हैं। यह रिपोर्ट बहुत ही विस्तृत और सघन है। आयोग ने मुख्य रूप से अनाजों के समर्थन मूल्य को उनके वास्तविक मूल्य से डेढ़ गुना करने की सिफारिश की थी। आयोग ने यह भी कहा था कि किसानों को खेती के लिए मूल स्रोतों यानी बीज, सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशकों वगैरह की उपलब्धता बढ़ाई जाए। इसके अलावा खेती की नई टेक्नोलॉजी भी उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई। इसमें उपज को बिकवाने के लिए बाजार मुहैया करना की भी सिफारिश की गई। लेकिन इसमें कहीं भी कर्ज माफी की सिफारिश नहीं की गई। सीधा तर्क है कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कर्ज माफी कोई रास्ता नहीं है।
बैकों के प्रमुखों का कहना है कि इससे राजस्व घाटा बढ़ेगा जिसके दूरगामी परिणाम होंगे और अर्थव्यवस्था की गति थम जाएगी। सरकार के पास अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए धन का अकाल पड़ जाएगा और कल्याणकारी योजनाओं के लिए भी पैसा नहीं रहेगा। कई राज्यों में तो सरकार के पास इतना भी धन नहीं बचेगा कि सड़कें भी दुरस्त कराई जाएं। इस तरह की कर्ज माफी से बैंकों के एनपीए बढ़ने का खतरा भी बढ़ेगा क्योंकि किसान कर्ज चुकाना बंद कर देंगे। उन्हें हमेशा यह लगेगा कि सरकार उनके कर्ज माफ कर देगी। इसका परिणाम यह होगा कि बैंक किसानों को आगे कर्ज देने से कतराएंगे। इसके बाद वे साहूकारों से कर्ज लेने को बाध्य हो जाएंगे। यह बहुत ही भयावह स्थिति होगी और इसका समाधान आसान नहीं होगा।
किसानों के सामने खड़े संकट का समाधान सिर्फ खुदरा खरीद मूल्य को बढ़ाने से नहीं होगा। इसके लिए जरूरी है इसे पूरी तरह से लागू करना। निचले स्तर पर सरकारी मुलाजिम इसे लागू करें। इस बात की व्यवस्था करनी होगी। कृषि उपज की सही कीमत सही समय पर उपलब्ध करवाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। उन्हें इसका पालन करना ही होगा। कर्ज माफी करवाने की बजाय कर्ज पर लगे ब्याज को माफ करने के बारे में सोचा जा सकता है। किसान कृषि बीमा को और भी व्यावहारिक बनाना होगा।
इस समस्या का राजनीतिक समाधान सोचना ही पड़ेगा क्योंकि कर्ज माफी से मुट्ठी भर किसानों को तात्कालिक फायदा तो हो जाता है लेकिन बड़ी आबादी को इसकी भरपाई करनी होती है क्योंकि यह पैसा टैक्स देने वालों की जेब से ही जाता है। छोटे किसान जिनका तादाद लाखों ही नहीं, कई राज्यों में करोड़ों में हैं, इसकी जÞद में नहीं आते और तकलीफ झेलते रहते हैं। राजनीतिक दल वोट की राजनीति के तहत ऐसा कर तो रहे हैं लेकिन यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है। इसके बुरे परिणाम जल्द ही दिखने लगेंगे। लेकिन फिलहाल इस पर ही ज्यादा जोर है जो लोकतंत्र के लिए भी ठीक नहीं है।

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