अयोध्या केस इतिहास बनाम संविधान

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क्या मस्जिद किसी मीर बाकी ने बनाया या अंग्रेजों की साजिश थी?

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर पहली बार सन 1886 में फैसला देते हुए जिला न्यायाधीश एफईए शैमिअर ने लिखा था, ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मस्जिद उस जमीन पर बनी है जिसे हिन्दू विशेष तौर पर पवित्र स्थल मानता है लेकिन चूंकि यह घटना 356 साल पुरानी है इसलिए अब इस गलती को सुधारने में बहुत देर हो चुकी है’। इस बात पर विवाद हो सकता है कि मस्जिद कब बनी, मंदिर तोड़कर बनी या नहीं, क्या बाबर के आदेश पर किसी मीर बाकी ने बनाई या किसी और ने, या (नयी खोज के हिसाब से) औरंगजेब ने, और या शिलालेख जिस पर बाबर और मीर बाकी का जिक्र है वह दो सौ साल बाद कैसे अचानक लगा दिया गया। लेकिन आज सैकड़ों साल बाद भी आजाद प्रजातांत्रिक भारत में न्यायालय की समस्या वही है। भले ही मामला जमीन पर निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड (यूपी) के मालिकाना हक को लेकर हो, देश की न्याय प्रक्रिया के सामने भी वही प्रश्न है… इतिहास में हुई गलतियों को कैसे नज़रंदाज़ किया जाये और महज कुछ दस्तावेजों के आधार पर फैसला कैसे किया जाये? दूसरी समस्या यह है कि शैमिअर के समय में समाज ब्रितानी हुकूमत का गुलाम था लिहाजा जन-अपेक्षाएं नहीं थीं।

आज भारत एक गणतंत्र है, संविधान है जिसमें मौलिक अधिकार हैं जो हर नागरिक को उपलब्ध हैं और न्यायपालिका का कर्तव्य होता है कि वह उन अधिकारों की सुरक्षा करे। मूल समस्या यह है कि बादशाह या ब्रितानी हुकूमत नागरिक अधिकार से नहीं ताकत से चलती थी लिहाजा किसी ने कभी भी किसी बाबर, किसी औरंगजेब या किसी अंग्रेज शासक से यह नहीं पूछा कि कैसे हिंदुस्तान के मूल निवासियों की जमीन परदेश से तलवार के बूते किसी स्थानीय शासक को हरा कर और शासन करने से तुम्हारी हो जाती है, कैसे अपनी ताकत और पैसे की हवस मिटाने के लिए लाखों का खून बहाते हो, यह कह कर कि यह एक धर्म विशेष में आस्था न रखने वालों के खिलाफ युद्ध है? चूंकि सब कुछ ‘राजा/बादशाह की मर्जी ही अंतिम सत्य’ के आधार पर चलता था लिहाजा सत्ता के नजदीक का कोई मीर बाकी किसी बादशाह बाबर के नाम पर किसी भी संपत्ति को अपना बनाकर ढहवा सकता था, नयी इमारत तामीर कर सकता था और कागजात भी उसी हिसाब से बनाये जा सकते थे। बाबर का कोई सैनिक जब किसी ‘दुश्मन’ का सर थाली में लाकर देता था तो बाबर उसे कोई परगना या बड़ी जमीन ईनाम के रूप में ‘बख्श’ देता था। किसी ने नहीं पूछा कि अफगान के किसी आदमी को हिंदुस्तान की जमीन किसी उज्बेक लड़ाके को किसी खसरा -खतौनी के हिसाब से दी गयी है। इलाहाबाद (अब प्रयागराज) उच्च न्यायालय का फैसला भी उसी मजबूरी का मुजाहरा है जिसके तहत विवादित 2.77 एकड़ को तीन पक्षकारों में बराबर-बराबर बांटा गया यानी एक हिस्सा राम लाला विराजमान को, दूसरा निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड को।

दरअसल यह फैसला नहीं बल्कि समझौते का ‘आदेश’ था। वैसे न तो पूरे बाबरनामा में किसी बाबरी मस्जिद का जिक्र है न ही किसी मीर बाकी का। पृष्ट संख्या 463 और 546 में जिस बाकी का जिक्र है, उसका पूरा नाम बाकी शघावल है और जो उज्बेकिस्तान का रहने वाला एक सैन्य अधिकारी था। लेकिन उसका दजऱ्ा कभी भी मीर का नहीं रहा और उसे बाबर ने दिबालपुर (पाकिस्तान) का इलाका बख्शीश में दे दिया। दूसरा जिक्र तब आता है जब बाबर को राणा सांगा से जबरदस्त चुनौती मिली। उस समय वह मध्य भारत में आगरा के पास था। शघावल एक विदेशी सैनिक था और उसे व्यक्तिगत रूप से कभी भी किसी अवध के इलाके या उत्तर भारत में कोई दिलचस्पी नहीं रही और वह बाबर के साथ वापस भी मध्य भारत की ओर चला गया। वैसे भी बाबर ने अपने किसी आदेश से किसी मीर बाकी नाम के शख्श को अवध का गवर्नर नहीं बनाया था। दरअसल ईस्ट इंडिया कंपनी के कहने पर फ्रांसिस बुकनन ने 1813-14 के बीच गोरखपुर इलाके का सर्वेक्षण किया और सारे साक्ष्यों के खिलाफ होने के बावजूद घोषित कर दिया कि इमारत बाबरी मस्जिद थी, इसे बाबर के आदेश पर बनाया गया था और इसे उसके सैन्य अधिकारी मीर बाकी ने बनाया था। जबकि इसके पहले के सभी अंग्रेज इतिहासकारों ने कोई भी शिलालेख नहीं पाया जिसमें यह बात लिखी हो। न तो बाबरनामा में किसी बाबरी मस्जिद का जिक्र है न ही तुलसी- रचित रामचरितमानस में।

यहां तक कि अबुल फजल फैजी की आईन-ए-अकबरी में भी इसका कोई जिक्र नहीं है। बाबर के हिन्दोस्तान आने के बाद के लगभग 200 साल तक जितने भी अंग्रेज इतिहास लेखकों ने इस इमारत का जिक्र किया, कहीं भी इसे बाबरी मस्जिद नहीं बताया। सबसे पहले सन 1611 में (बाबर के काल के 85 साल बाद) अंग्रेज यात्री विलियम फिंच ने अयोध्या के इस भग्नावशेष के रूप में खड़े ‘रानीचंद किले’ (रामचंद) का जिक्र किया और बताया कि हिन्दू मानते हैं कि यहां भगवान मानव शरीर धर कर दुनिया का तमाशा देखने आये थे। यह भी बताया कि कैसे पंडे और मंदिर के पुजारी आने वाले हिन्दू तीर्थयात्रियों का पुश्तदर पुश्त का पूरा विवरण रखते थे। इस पर अकाट्य दस्तावेजों के हवाले से पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल की किताब भी आ चुकी है। दरअसल 1815 से 1858 का काल ब्रितानी संसद का ईस्ट इंडिया कंपनी से नाराजगी का था। कंपनी पर आरोप था कि शोषण और दमनकारी नीति के तहत भयंकर मुनाफे के लिए कंपनी हिन्दोस्तान में अमानवीय कृत्य का सहारा ले रही है। संसद इस देश का शासन सीधे सरकार के हाथ में सौंपना चाहती थी। ऐसे में कंपनी को अपना अस्तित्व बचाना था। लिहाजा कम्पनी ने 1807 में रोजी-रोटी की तलाश में भटक रहे पादरी जेम्स मिल से छ: खण्डों में कई हजार पृष्ठों का ‘द हिस्ट्री आॅफ ब्रिटिश इंडिया’ लिखवाई।

इस पुस्तक-श्रंखला में हिन्दोस्तानियों को ‘जंगली’, ‘असभ्य’, ‘अन्धविश्वासी’, ‘क्रूर’, ‘मूर्ख’ और आपस में लड़ने वाला बताया गया। यानी एक ऐसा समाज जो स्व-शासन करने में सक्षम नहीं था। जेम्स मिल कभी भी भारत नहीं आया और न ही एक भी भारतीय भाषा जानता था। कंपनी का प्रयास था कि ब्रिटिश संसद को बताया जा सके कि कंपनी हिन्दोस्तान से कमाई नहीं कर रही है बल्कि इसे ‘सभ्यता और शासन सिखाने’ के लिए अपना पैसा ‘पानी’ की तरह बहा रही है। जेम्स मिल को इस सेवा के एवज में अच्छी नौकरी दे दी गयी पांच साल के भीतर तनख्वाह कई गुना बढ़ा दी गयी।

जो अगले कई दशकों तक बनी रही और बाद में उनका बेटा और प्रसिद्ध राजनीति-शास्त्री जॉन स्टुवर्ट मिल भी कंपनी का मुलाजिम रहा। आज इस मामले को लेकर कोर्ट के सामने समस्या यह होगी कि भले ही कागजात किसी पक्ष के नाम हों, भले ही कब्जा किसी पक्ष का हो, भले ही एडवर्स पजेशन (कब्जा) के सिद्धांत के तहत किसी एक या दूसरे पक्ष के पास लम्बे समय तक कब्जा रहा हो, इस बात को नज़रंदाज कैसे किया जायेगा कि धर्मांध बादशाह की दहशत और अंग्रेजों का समुदायों को लड़ाते रहने तथा शासन करने का कुचक्र सदियों तक रहा और जो ‘सत्य और असत्य’, तथा ‘नैतिकता और अनैतिकता’ की स्पष्ट लकीर को मिटाता रहा। उसकी जगह ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ का मत्स्य न्याय पिछले 600 साल से इस देश को खोखला करता रहा। अचानक कहीं आजादी मिलती है, देश संविधान बनाता है और ‘हम भारत के लोग’ लिख कर समूचे पुराने अवशेषों से ‘अलविदा’ कहने का ‘शुतुरमुर्गी’ ड्रामा करने लगता है। इसीलिए आज भी अयोध्या विवाद का फैसला न्याय-व्यवस्था के लिए एक चुनौती है।

 

 

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