नदी को यूं भी मारा जाता है

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ह 1996 की घटना है। प्रतिष्ठित अखबार ‘द गार्जियन’ में एक लेख छपा, जिसका शीर्षक था- ‘द वाटर आफ डेथ’। इसमें दावा किया गया कि बंगाल (पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश) ‘आर्सेनिक बम’ के मुहाने पर बैठा हुआ है और गंगा डेल्टा अपने तट पर बसी सभ्यता को धीमी मौत परोस रहा है।

इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार सहित धार्मिक सत्ता ने लेख की खूब लानत मलामत की। इसे राष्ट्र और गंगा को बदनाम करने की कोशिश करार दिया गया।

पिछले दिनों उस आलेख के लेखक डाक्टर दीपांकर चक्रवर्ती की मौत हो गई। आज दुनिया उन्हें ‘आर्सेनिक मैन आफ इंडिया’ के नाम से जानती है। भारत बांग्लादेश सहित अनेक देशों की आर्सेनिक नीति के मूल में डाक्टर दीपांकर का ही विचार होता है।

हालांकि भारत सरकार ने कभी भी आधिकारिक तौर पर इस बात के लिए उन्हे सम्मान नहीं दिया। वे लगातार आर्सेनिक की भयावहता सामने लाते रहे और सरकारें उन्हें एक परेशान करने वाला शख्स ही समझती रहीं।

तभी तो दुनिया भर में सैकड़ों शोधपत्र और बीस से ज्यादा किताबें लिखने वाले शख्स को किसी भी पद्म सम्मान के लायक नहीं समझा गया।

 

“डॉक्टर चक्रवर्ती ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक केसी साहा के काम को आगे बढ़ाया था। सबसे पहले 1983 में साहा ने ही गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में आर्सेनिक की मौजूदगी पर शोध किया था।”

 

डॉक्टर चक्रवर्ती ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक केसी साहा के काम को आगे बढ़ाया था। सबसे पहले 1983 में साहा ने ही गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में आर्सेनिक की मौजूदगी पर शोध किया था।

वे चक्रवर्ती के गुरु थे। उस समय दीपांकर चक्रवर्ती जादवपुर यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाने विदेश जा चुके थे।

यह सन 1988 की बात है। वह विदेश से कोलकाता लौटे तो उन्हें बंगाल में आर्सेनिकोसिस से कुछ लोगों के बीमार पड़ने की सूचना मिली। उस वक्त आर्सेनिक के बारे में न तो सरकार को ज्यादा पता था और न ही आम लोगों को।

लोग वर्षों से ट्यूबवेल का वही पानी पी रहे थे, जिसमें आर्सेनिक था। उन्होंने मालदा और हल्दिया के कई गांवों के पानी की जांच की और पाया कि आर्सेनिक किस तरह लोगों को मौत के करीब ले जा रहा है। लोग आर्सेनिक से होने वाले कैंसर से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं है कि यह बीमारी उन्हें हुई कैसे!

इसके बाद दीपांकर विदेश नहीं लौटे और अपना पूरा जीवन बंगाल के ‘श्राप’ को सामने लाने और उसका इलाज ढूढ़ने में लगा दिया। लंबे समय बाद जब सरकार ने मान लिया कि समस्या बेहद गंभीर है, तब प्रशासन और दीपांकर आमने-सामने आ गए।

कारण समझना बेहद आसान है। दीपांकर का मानना था कि नलकूप के बजाए लोग कुंए और तालाब का पानी पिएं और उन्हें व्यवस्थित रखें जैसे कि प्राचीनकाल में भारतीय समाज का पानी के साथ व्यवहार होता था।

 

“भारत बांग्लादेश सहित अनेक देशों की आर्सेनिक नीति के मूल में डाक्टर दीपांकर का ही विचार होता है।हालांकि भारत सरकार ने कभी भी आधिकारिक तौर पर इस बात के लिए उन्हे सम्मान नहीं दिया।”

 

लेकिन नौकरशाही का जोर विश्व बैंक के बड़े प्रोजेक्ट, करोड़ों रुपये के आर्सेनिक रिमुवल प्लांट और ऐसी ही बड़ी योजनाओं पर होता। दीपांकर का कहना था कि सूर्य की सीधी किरणों से आर्सेनिक का प्रभाव बहुत हद तक कम हो सकता है।

इसलिए बंगाल के सामाजिक परिवेश और भौगोलिक स्थिति के हिसाब से तालाब और कुंए मुफीद हैं। इस इलाके में हमेशा से अच्छी बारिश होती रही है।

बहरहाल गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा का वैभव वापस लाने का अथक प्रयास करने वाला भागीरथ चला गया। उसकी मौत तकनीकी तौर पर एक स्वाभाविक मौत थी।

लेकिन एक सच यह भी है कि इसी साल रसायन के नोबेल पुरस्कार के लिए उनके नाम पर विचार किया गया था लेकिन सत्ता ने उनके नाम पर अरुचि जाहिर की। यदि उन्हें नोबेल मिल जाता तो शीर्ष के ‘अहम’ को गहरी चोट लगती।

अब वे नहीं हैं लेकिन उनकी विकसित की गई कई छोटी धाराएं हैं जो आर्सेनिक पर काम कर  रहीं हैं, लगातार कर रहीं हैं, बिल्कुल एक नदी की तरह।

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