ग्राम कचहरी एवं न्याय पंचायत

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देश की अदालतें मुकदमों के भार से दबी हैं। जिला अदालत से लेकर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय का यही हाल है। सबसे बड़ी बात यह है कि बड़ी अदालतें बहुत खर्चीली हैं। अदालतें गांव से दूर शहरों में स्थित होने के कारण आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। देश में शीघ्र, सस्ते और सर्वसुलभ न्याय की मांग पुरानी है।

अदालतें महंगी होने के साथ-साथ कई वर्षों बाद फैसला सुनाती हैं। बिहार सरकार ने आम जनता को शीघ्र, सस्ता और सर्वसुलभ न्याय उपलब्ध कराने का अनूठा तरीका खोजा है। यह है तरीका ग्राम कचहरी का। ग्राम कचहरी बिहार राज्य के हर ग्राम पंचायत क्षेत्र में गांव स्तर पर छोटे मुकदमों का निर्णय कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि ग्राम कचहरी है क्या?

 

“बिहार में ग्राम कचहरी न्याय पंचायत का ही रूप है। आज संपूर्ण न्याय व्यवस्था अदालतों के अधीन है। गांव के छोटे-छोटे मामले जो स्थानीय स्तर पर ही मिल बैठकर हल किए जा सकते थे, वे भी अब अदालतों में जाने लगे हैं।”

 

दरअसल ग्राम कचहरी न्याय पंचायत का ही रूप है। न्याय व्यवस्था पूरी तरह अदालतों के अधीन होने से गांव-परिवार के छोटे-छोटे मामले जो स्थानीय स्तर पर ही मिल बैठकर हल किए जा सकते थे, वे भी अब अदालतों में जाने लगे। बिहार सरकार ने ग्राम कचहरी के रूप में एक बार फिर से न्याय पंचायतों को पुनर्जीवित कर दिया है।

बिहार राज्य निर्वाचन आयोग में ग्राम पंचायत के साथ-साथ ग्राम कचहरी का भी चुनाव कराये जाने का प्रावधान है जिसके चलते इसका नियमित रूप से गठन हो रहा है। राज्य में ग्राम कचहरी प्रभावी तरीके से कार्य भी कर रही है। ग्राम कचहरी को भारतीय दंड संहिता की 40 धाराओं से संबंधित विवादों को सुनने और न्याय करने का अधिकार दिया गया है।

इसमें वही धाराएं हैं जिनसे जुड़ा विवाद गांवों में सामान्यत: हुआ करता है। ग्राम कचहरी के अन्तर्गत आने वाली धाराओं की सुनवाई ऊपर की अदालत में या पुलिस में प्रथम स्तर पर नहीं होगी। यदि कोई पीडि़त मामले को ग्राम कचहरी न ले जाकर पहले अदालत में ले भी जाता है तो वह वापस ग्राम कचहरी में ही आएगा।

बिहार की ग्राम कचहरी को लेकर कई सामाजिक संस्थाओं ने अध्ययन किया है। ग्राम कचहरी में अब तक जो विवाद दाखिल हुए हैं और जिन पर कार्यवाही हुई है उनके सम्बन्ध में अब तक हुए अध्ययनों से जो तथ्य निकलते हैं उनमें जमीन संबंधी विवाद 58 प्रतिशत और घरेलू विवाद 20 प्रतिशत है।

 

“ग्राम कचहरी को भारतीय दंड संहिता की 40 धाराओं से संबंधित विवादों को सुनने और न्याय करने का अधिकार दिया गया है।”

 

इसमें से 85 प्रतिशत विवाद दलित एवं पिछड़े वर्ग से संबंधित हैं। बिहार में ग्राम कचहरी में आए हुए इन विवादों का 90 प्रतिशत हिस्सा समझौते से हल होते देखा गया है। अन्य 10 प्रतिशत में 100 से 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया गया। ज्यादातर मामलों में दोषी ने अपने अपराध को स्वीकार करते हुए सहज रूप से जुर्माना भर कर मामले को रफा-दफा किया है। लगभग 3 प्रतिशत विवाद ही ऊपर की अदालतों में गए हैं।

इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश की न्याय पंचायत व्यवस्था का जो अध्ययन 2011 में सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट द्वारा किया गया है उसमें यह तथ्य निकल कर आया है कि शत प्रतिशत मामलों का निपटारा न्याय पंचायत द्वारा हो रहा है और उससे सभी संतुष्ट हो रहे हैं। 16 प्रतिशत मामलों में तत्काल निर्णय हो जाता है, 32 प्रतिशत का निपटारा 2 से 3 दिन में और 29 प्रतिशत मामलों का निपटारा एक सप्ताह में कर दिया जाता है। शेष मामले 15 दिन के भीतर निपटा दिए जाते हैं।

नेशनल जुडिशियल डाटा ग्रिड के अनुसार वर्तमान समय में देश की विभिन्न अदालतों में लगभग 2 करोड़ पचास लाख मुकदमें जो लंबित हैं, उनमें 9.22 प्रतिशत मुकदमें 10 साल से अधिक समय से लंबित हैं। लगभग 40 मुकदमें 2 से 9 साल तक के लंबित हैं।

इनमें सबसे अधिक लंबित मुकदमे उत्तर प्रदेश के है जो लगभग 24 प्रतिशत हैं। यदि बिहार की तरह उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में भी ग्राम कचहरी जैसी न्याय संस्था को पुनर्जीवित किया जाए तो देश की अदालतों से मुकदमों को बोझ कम हो सकता है।

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