भारत विभाजन का मंत्रदाता कौन?

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे कुंवर नटवर सिंह दूसरों से भिन्न हैं। राजनीति की मुख्यधारा में सक्रिय नहीं रहते हुए भी वे अपनी उपस्थिति समय-समय पर अनुभव कराते रहते हैं। ताजा प्रसंग उनकी नई किताब से संबंधित है। वह नई किताब है-‘ट्रेजर्ड एपिसल्स‘। वैसे तो यह पत्रों के संकलन की किताब है। इसमें वे पत्र हैं जो नटवर सिंह को समय-समय पर इंदिरा गांधी, इ.एम. फोस्टर, सी. राजगोपालाचारी, नीरद सी चौधरी, विजया लक्ष्मी पंडित, लार्ड माउंटबेटन, मुल्क राज आनंद, आर. के. नारायन, कृष्णा हथीसिंह, हान सूयिन ने लिखे।

नटवर सिंह की पिछली किताब जिस तरह चर्चित हुई थी वैसी ही यह भी हुई है। इसका एक बड़ा कारण वे व्यक्तित्व हैं जिनके पत्र इसमें छपे हैं। ऐतिहासिक महत्व के इसमें कई पत्र हैं। नटवर सिंह ने पत्रों से पहले अपने हर पात्र पर अनुभव आधारित अपनी जो टिप्पणी की है, उससे किताब अधिक महत्वपूर्ण बन गई है। इसमें कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्य हैं जो अब तक अज्ञात थे। जैसे सी राजगोपालाचारी ने भारत विभाजन की अपरिहार्यता को लार्ड माउंटबेटन के गले उतारा, यह अज्ञात सा तथ्य है।

 

“नटवर सिंह की पिछली किताब जिस तरह चर्चित हुई थी वैसी ही यह भी हुई है। इसका एक बड़ा कारण वे व्यक्तित्व हैं जिनके पत्र इसमें छपे हैं।”

 

भारत विभाजन की पृष्ठभूमि से जो परिचित हैं वे सी राजगोपालाचारी की उस योजना से भी परिचित हैं जिसे उन्होंने दूसरे महायुद्ध के बाद सामने रखा था। ऐसी अनेक योजनाएं उस समय सामने आई थीं। लेकिन लार्ड वेवल जब गए और उनकी जगह लार्ड माउंटबेटन आए तो ब्रिटिश सरकार ‘सत्ता के हस्तांतरण‘ की योजना पर काम कर रही थी।

जून, 1948 तक ‘सत्ता का हस्तांतरण‘ होना था। कांग्रेस के नेताओं ने भी कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया था। वे इस धारणा के हो गए थे कि भारत का विभाजन टल गया है। इस किताब में सी राजगोपालाचारी ने बताया है कि लार्ड माउंटबेटन जब मार्च, 1947 में आए तो उन्होंने ही उन्हें यह बताया कि भारत-विभाजन अपरिहार्य है। जिसे वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने भी माना। अब तक यही ज्ञात था कि लार्ड माउंटबेटन ने सबसे पहले सरदार पटेल को भारत विभाजन से सहमत कराया। उसके बाद उन्होंने दूसरे नेताओं से बात की। ब्रिटिश सरकार से इस बारे में बात की। लंदन से सहमति प्राप्त कर उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं से बात की।

 

“इस किताब में इंदिरा गांधी के कुछ पत्र हैं। एक पत्र इमरजेंसी के दिनों का है। जिस पर ‘निजी और गोपनीय’ लिखा हुआ है। यह पत्र उन दिनों का है जब नटवर सिंह लंदन में भारत के उप उच्चायुक्त थे।”

 

इस किताब में इंदिरा गांधी के कुछ पत्र हैं। एक पत्र इमरजेंसी के दिनों का है। जिस पर ‘निजी और गोपनीय‘ लिखा हुआ है। यह पत्र उन दिनों का है जब नटवर सिंह लंदन में भारत के उप उच्चायुक्त थे। उन्होंने इंदिरा गांधी को जो पत्र भेजा, वह इसमें नहीं है। इंदिरा गांधी का पत्र 9 फरवरी, 1976 का है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि मुझे इस पर कोई आश्चर्य नहीं है कि डा. स्वामी का इंग्लैंड में स्वागत हो रहा है, हालांकि भारत में उनका प्रभाव नहीं है। इंदिरा गांधी ने अपने इस पत्र में माना है कि ब्रिटिश जनमत इमरजेंसी के विरोध में है। वे इस कारण चिंतित थीं।

नटवर सिंह ने इंदिरा गांधी के पत्र से पहले अपनी टिप्पणी में माना है कि उन्हांेने इमरजेंसी लगाकर भारी गलती की। उनकी दूसरी गंभीर गलती थी जब ‘आपरेशन ब्लू स्टार‘ का फैसला किया। नटवर सिंह ने लंबे समय तक उन पत्रों को सहेज कर रखा। इन पत्रों से उनके संपर्क और अभिरुचि की सूचना मिलती है। उन्होंने माना है कि इन व्यक्तित्वों ने उन पर अपना प्रभाव छोड़ा।

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