भारत परिवार

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संघ परिवार के बारे में आपने अवश्य सुना होगा। अच्छा या बुरा, जो भी हो। 20 अगस्त की शाम को इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में जो दृष्य था वह अनुभव कराता था कि पूरा भारत परिवार यहां साक्षात उपस्थित है। जो उपस्थित नहीं हो सके, उन्होंने अपना प्रतिनिधि भेजा।

भारत एक परिवार है। यही उस समय भावना के हर तल पर मन में अनुभव हो रहा था जब एक के बाद दूसरा वक्ता अटलजी की विषेशताओं को चिन्हित कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा था। वक्ता चाहे जो भी हो, उसमें बनावटीपन जरा भी नहीं था। अवसर भी विशेष था। सर्वदलीय श्रद्धांजलि का था।

सुरक्षा के जबर्दस्त इंतजाम के कारण लोगों के लिए स्टेडियम में पहुंचना आसान नहीं था। कदम-कदम पर जांच। ऐसी हर बाधा को पार कर लोग चार बजे से पहले ही अपनी जगह खोज कर बैठ गए थे। हर गैलरी पूरी भरी हुई थी।

 

“भारत एक परिवार है। यही उस समय भावना के हर तल पर मन में अनुभव हो रहा था जब एक के बाद दूसरा वक्ता अटलजी की विषेशताओं को चिन्हित कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा था।”

 

नीचे हाल में कुर्सियां जो लगाई गयी थीं वे कम पड़ गईं। स्टेडियम का परिसर वैदिक मंत्रों से गूंज रहा था। हाल में अटल बिहारी वाजपेयी की 94 साला जीवन यात्रा का चित्र-पट दिखाया जा रहा था।

मानो अटल बिहारी वाजपेयी एक-एक पग रखते हुए अपनी जीवन यात्रा पूरी कर रहे थे। बचपन से अंतिम क्षण तक का चित्रपट मोहक, प्रबोधक और प्रेरक बना है।

उसमें उनके व्यक्तित्व के विकास की पूरी कहानी है। उसे लोग श्रद्धांजलि सभा के अंत तक देखते रहे। उससे वे समझ सके कि कैसे थे अटलजी! प्रतीक्षा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हो रही थी। उसकी सूचना भाजपा के उपाध्यक्ष विनय सह्स्त्रबुद्धे दे रहे थे।

जैसे ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आए, श्रद्धांजलि सभा प्रारंभ की गई। पहले वक्ता वे स्वयं थे। उन्होंने शुरू इस तरह किया। ‘जीवन कितना लंबा हो, यह तो अपने हाथ में नहीं होता है। लेकिन जीवन कैसा हो, यह अपने ही हाथ में होता है।

अटल जी ने अपने जीवन जीने के ढंग से यह कर दिखाया।’ प्रधानमंत्री का पूरा भाषण अटल जी की उन विशेषताओं पर था जिसे देश-दुनिया याद करेगी।

 

“प्रधानमंत्री सहित अनेक वक्ताओं ने पोखरण परमाणु परीक्षण का यह बताने-समझाने के लिए उल्लेख किया कि वे किसी भी दबाव से परे और वास्तव में अटल थे।”

 

प्रधानमंत्री सहित अनेक वक्ताओं ने पोखरण परमाणु परीक्षण का यह बताने-समझाने के लिए उल्लेख किया कि वे किसी भी दबाव से परे और वास्तव में अटल थे।

लालकृष्ण आडवाणी दूसरे वक्ता थे। वे शोकाकुल थे। ऐसा लग रहा था कि बोलते हुए बिलख पड़ेंगे। खुद को संभाला। उनके बाद सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने बहुत सहज शैली में शुरुआत की।

एक पुस्तक के हवाले से कहा कि अटलजी छायादार और फलदार विशाल वृक्ष की भांति थे। याद करना चाहिए कि पौधे से वृक्ष बनते समय आंधी, तूफान और गर्मी से जूझने के दौरान उन्हें किसने सींचा होगा।

दलीय राजनीति में होने के बावजूद सबसे मित्रता और भाईचारा के स्वभाव वाले अटल बिहारी वाजपेयी को हर वक्ता ने अपने ढंग से याद किया।

चाहे राजनाथ सिंह हों, गुलाम नबी आजाद हों, रामविलास पासवान हों, स्वामी अवधेशानंद गिरी हों, थंबी दुराई हों, हरिवंश हों, स्वामी रामदेव हों, डी. राजा हों या शरद यादव हों, सबने मन से उन्हें याद किया।

लेकिन मौलाना मदनी ने उस समय सबको यह कहकर चकित कर दिया कि मेरे लिए तो यही सौभाग्य की बात है कि मैं यहां उपस्थित हूं। डा. फारूख अबदुल्ला ने अपने अंदाज में न केवल बोला बल्कि भारत माता की जय के नारे लगवाए। महबूबा मुफ्ती ने वाजपेयी के कश्मीरियत और इंसानियत के नारे को याद किया।

तीन घंटे से ज्यादा चली सभा में 22 वक्ता बोले। आखिरी थे, अमित शाह जिन्होंने सबका आभार जताया। यह भी रेखांकित किया कि जो अभाव घटित हो गया है उसे लंबे समय तक पूरा करना कठिन होगा। देश के हर दल का प्रतिनिधि उपस्थित था।

जिनके बारे में बीच-बीच में सूचना दी जा रही थी। हर धर्म, पंथ, क्षेत्र, जाति, जनजाति और विचार का वहां प्रतिनिधत्वि देखकर अटल बिहारी वाजपेयी की व्यापकता और ऊंचाई की झलक मिल रही थी।

अपने उस नेता को कैसे याद करना चाहिए जिसने करीब 70 साल नेतृत्व किया हो, श्रद्धांजलि सभा के जरिए भाजपा ने इसे समाज को समझाया। दिल्ली से शुरुआत हुई है। यह क्रम पूरे देश में चलेगा।

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