धर्म और व्यापार का सकारात्मक इतिहास

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धर्म और व्यापार की परस्परता इतिहास में रही है। इसे लगभग भुला दिया गया था। ‘लक्ष्मीनामा’ पुस्तक इतिहास के उन उदाहरणों को सामने लाती है जिससे यह समझ में आता है कि किस तरह धर्म ने व्यापार को संरक्षण दिया और परस्परता का धर्म निभाते हुए व्यापार ने उसे आधार दिया जिससे उसका लौकिक जगत में विस्तार होता रहा।

जाने माने पत्रकार अंशुमान तिवारी और भ्रमणशील खोजी अफसर अनिन्द्य सेनगुप्त अपनी पुस्तक ‘लक्ष्मीनामा’ के माध्यम से इतिहास के उत्सव का आनंद उठाने के लिए आपको निमंत्रण दे रहे हैं। इसे स्वीकार करना चाहिए। क्यों? इसलिए क्योंकि ‘धर्म और व्यापार का साझा इतिहास कम रोचक नहीं है। इन दोनों ने एक साथ मिलकर राजनैतिक सीमाओं को पार किया है।’ इसके ही इतिहास को यह पुस्तक वर्तमान से जोड़ती है। अतीत में भारत की चेतना का लेखकद्वय ने इस तरह वर्णन किया है- ‘भारत में धर्म का संस्थागत और संहितागत स्वरूप राजाओं के अधिकार सीमित करने और समाज की शक्तियों के संरक्षण को लेकर अभूतपूर्व रूप से आग्रही है। इन दो विशेषताओं के कारण भारत में व्यापार, नगरीकरण, भाषा, चिकित्सा, कला, साहित्य, संगीत, नृत्य, स्थापत्य और वास्तु का विकास धर्म की छाया में हुआ है। इस प्रक्रिया में बहुआयामी निजी स्वतंत्रताएं पूरी तरह सुरक्षित रखी गई थीं।’

इस आधारभूमि पर विचार-व्यवहार का समन्वय भारत की समाज-राज्य व्यवस्था में हमारे अतीत में जैसा था, वैसा ही प्रस्तुत करने का प्रयास ‘लक्ष्मीनामा’ में है। लेकिन यह मात्र अतीत में ही सीमित नहीं है। इसने वर्तमान का भी एक चित्र खींचा है। ‘आधुनिक दुनिया को बनाने वाली ताकतों में धर्म की भूमिका विवादित भी है और उपेक्षित भी।’ इस अभाव को यह पुस्तक दूर करने का प्रयास कर रही है। लेकिन वर्तमान से वह इस तरह जुड़ी हुई है- ‘आर्थिक असमानता की रोशनी में जनकल्याण, नैतिक कारोबार और पर्यावरण संरक्षण के सवालों से जूझती हुई दुनिया आज पलट कर धर्म की तरफ देखती है क्योंकि धार्मिक विश्वासों ने कुछ ऐसे नियम दिए जिनका प्रत्येक समाज ने पालन किया है।’

ऐसी रोचक पुस्तक 2018 में ही आ सकती है। उससे पहले इसकी संभवत: कल्पना करना भी किसी लेखक के लिए कठिन होता। लेखकद्वय ने ‘लक्ष्मीनामा’ को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की महागाथा बताया है। इसे पढ़ते हुए ऐसा ही अनुभव भी होता है। यह पुस्तक धर्म और व्यापार के संबंध में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। जो काल्पनिक नहीं है, ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। इसे जो-जो समझेंगे, वे मानेंगे कि भारत में व्यापार ने धर्म की शीतल छाया में अपनी अविराम यात्रा चलायी है। आज आम धारणा बन गई है कि जहां व्यापार है, वहां घोटाला है। पुस्तक इस धारणा पर पुनर्विचार का एक आख्यान प्रस्तुत करती है। जो व्यापार धर्म की छाया में चला होगा, उसे धर्म की सही समझ रही होगी। क्या आज धर्म की समझ बची है? यह प्रश्न अपने आप ही किसी के भी मन में कौंधेंगा जब वह इस पुस्तक को पढ़ने के लिए पलटना प्रारंभ करेगा।

पुस्तक लेखन की अपनी एक दुनिया बन गई है। यह पुस्तक नई दुनिया बनाने का आह्वान बिना कहे करती है। विषय वस्तु, लेखन शैली, भाषा, उसकी प्रस्तुति, तथ्य, संदर्भ और उसका सही उपयोग देखना हो तो ‘लक्ष्मीनामा’ एक बढि़या उदाहरण है। इस एक पुस्तक में अनेक पुस्तकें समायी हुई हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि पुस्तक अनेक पुस्तकों को जन्म देगी। नये लेखक निकलेंगे। वे भारत के गौरवशाली अतीत से प्रेरित होकर बेहिचक वे तत्व अपने इतिहास से खोज लेंगे जो शाश्वत है और आज की परिस्थितियों में उपयोगी होगा। शाश्वत होता है धर्म। उसे हमने नासमझी में विस्मृत कर दिया है। जिसे याद करने की जरूरत इस पुस्तक के प्रारंभ में ही बड़े ही नाटकीय ढंग से बताई गई है। धर्मों के इतिहास में एक धर्म ऐसा है जो हमेशा सबसे ऊपर बना रहने वाला है। उसे वेदव्यास ने बताया और वही इस पुस्तक के प्रारंभ में इस तरह आया है। ‘उस महान धर्म को प्रणाम है जो सभी मनुष्यों को धारण करता है। सबको धारण करने वाले जो नियम हैं, वे धर्म हंै।’ ऐसे ही धर्म का भारत में बहुत पहले उदय हुआ। वह आज भी अपनी जगह पर है। इस आधार पर दुनिया में बने और विकसित हुए धर्मों को समझा जा सकता है। यह एक ऐसी कसौटी है जो जीवन के हर आयाम को छूती है। उसे परखने का पैमाना देती है। चाहे वह व्यापार हो, चाहे राजनीति, चाहे समाज, चाहे संस्कृति और चाहे शासन।

“आर्थिक असमानता की रोशनी में जनकल्याण, नैतिक कारोबार और पर्यावरण संरक्षण सवालों से जूझती हुई दुनिया आज  पलट कर धर्म की तरफ देखती है क्योंकि धार्मिक विश्वासों ने कुछ ऐसे नियम दिए जिनका प्रत्येक समाज ने पालन किया है।”

धर्म और व्यापार की परस्परता इतिहास में रही है। इसे लगभग भुला दिया गया था। यह पुस्तक इतिहास के उन उदाहरणों को सामने लाती है जिससे यह समझ में आता है कि किस तरह धर्म ने व्यापार को संरक्षण दिया और परस्परता का धर्म निभाते हुए व्यापार ने उसे आधार दिया जिससे उसका लौकिक जगत में विस्तार होता रहा। भारत की चेतना के इस पहलू को कितने लोग आज जानते हैं? इस पर कोई भी सर्वेक्षण आंख खोलने वाला होगा। नतीजा नकारात्मक होगा। उसे यह पुस्तक दूर करती है और यह बताती है कि भारत की चेतना में वह असीम ऊर्जा है जो उद्यमशीलता को बढ़ाती है। इस बात को जो भी समझ लेगा, वह नये ज्ञान का मालिक हो जाएगा।

आज तो स्थिति विपरीत है। जैसे ही ग्लोबलाइजेशन की चर्चा होती है तो एक नकारत्मक भाव से ज्यादातर भारतीय भर जाते हैं। वे सोचने लगते हैं कि कहीं फिर से गुलामी तो नहीं आ रही है। इस अर्थ में ग्लोबलाइजेशन हमारे लिए एक आशंका की अवधारणा है। जब किसी को यह मालूम होगा कि भारत कभी अपनी ऊर्जा के बल पर ग्लोबलाइजेशन का अगुआ रहा है तो वह नए ग्लोबलाइजेशन से डरेगा नहीं। उसका स्वागत करेगा। इस बात का ध्यान रखेगा कि वह मानवता के हित में हो। जिस ग्लोबलाइजेशन से भारत डरता है और सहमता है, वह साम्राज्यवाद है। इस पुस्तक में साम्राज्यवाद और मानवता का अंतर नहीं किया गया है। इसके विपरीत बताया गया है कि साम्राज्यवाद ने भी कारोबार को बढ़ाने में सहायता की। लेखकद्वय ने माना है कि ‘लक्ष्मीनामा’ तिथिबद्ध इतिहास नहीं है।’ क्या है? इसे उनके ही शब्दों में पढि़ए- ‘यह भारतीय समाज की जीवनी शक्ति का आख्यान है, यह भारत में धर्म और उद्यमिता के संबंधों की गाथा है। यह भारत के धार्मिक और आर्थिक भूगोल का इतिहास है, यह भारत के धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का आख्यान है, जो मिथकों व कथाओं की छाया में लिखा गया है।’ इस पुस्तक को मिथकों और कथाओं ने रोचक बना दिया है।

पाठक ऊबेगा नहीं, रुचिपूर्वक पढ़ेगा। वह पढ़ते हुए चकित भी होगा। इस बात पर वह चकित होगा कि क्या हमारे और दुनिया के इतिहास में ऐसा रहा है? वह सोचेगा। सोचने की खुराक उसे इस पुस्तक से मिलेगी। एक नयी दृष्टि से वह अपने आस-पास देखेगा। इतिहास की आधारभूमि पर ‘लक्ष्मीनामा’ ने एक इतना ऊंचा टावर बनाया है जिस पर खड़े होकर धर्म और व्यापार के मेले को पाठक देख सकता है। उसका आनंद ले सकता है। उस मेले में धर्म है तो शिल्प भी है। नगर हैं तो उसमें मंदिर भी हैं। उसके आस पास बाजार भी हैं। ये परस्पर संबद्ध हैं।

इस इतिहास को समझाती हुई यह पुस्तक वर्तमान के यथार्थ से परिचय कराती है। वह सुखद नहीं है। लेकिन क्यों सुखद नहीं है? इसका उत्तर पुस्तक नहीं देती। इशारे करती है कि जो राज्य-व्यवस्था आज है, वह भारत की चेतना से निकली ऊर्जा के विपरीत है। इसके दो अर्थ लगाए जा सकते हैं। पहला कि पुस्तक संकेत में बता देती है कि राज्य-व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। तभी ‘लक्ष्मीनामा’ की महागाथा बढ़ेगी। दूसरा कि जिन लोगों ने जाने-अनजाने भारत की मूल चेतना से अपना नाता जोड़ा, वे राज्य-व्यवस्था और व्यापार में समन्वय बैठाकर खुशहाली का आगाज कर सके हैं। यह पुस्तक 15 अध्यायों की है। जो समय, कारवां, विचार, भूगोल और स्पर्धा के खंड में बटे हैं। अंतिम खंड स्पर्धा का है। इसका ही एक अध्याय है – ‘आस्थाओं का महासंगम।’ यह अध्याय किसी महामॉल जैसा है।

जिसमें सब कुछ है। जो आप सोच सकते हैं और जो नहीं सोच सकते हैं। इसमें अंबानी परिवार का उल्लेख इस रूप में आया है कि उनका विवाद नाथद्वारा और तिरुपति के दरबार में सुलझाया गया है। ‘रिलायंस परिवार के विवाद में धर्म और उद्योग के आधुनिक संबंधों के सभी कारक मिलते हैं।’ इस अध्याय में अरबपति मंदिर, स्वर्ण के देवता, साठ दिन का मेगा सिटी (कुंभ) विघ्नहर्ता का कारोबार, देवी की इकोनॉमी, वक्फ इकोनॉमी: अल्लाह के नाम पर, गुरु का नूर, भारतीय र्दशन का वैश्वीकरण, गुरु, योगी, रहस्यवादी जिद्दू,गुरु की समृद्धि आदि शीर्षकों से जो वर्णन है वह जहां उत्सुकता जगाता है वहीं नई सूचना भी देता है। इसमें ही एक शीर्षक है- कारोबारी बाबा।

यह स्वामी रामदेव के बारे में है। इसमें यह सूचना दी गई है कि ‘योग और आयुर्वेद से अपना मिशन प्रारंभ करने वाला यह भगवाधारी संन्यासी पांच हजार – छह हजार करोड़ रुपये के कारोबार का मालिक है। इसमें ही श्री श्री रविशंकर, माता अमृतानंदमयी, जग्गी वासुदेव के बारे में संक्षिप्त सूचनाएं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जहां अक्टूबर 2017 में पहुंचे थे, वह मंजूनाथेश्वर मंदिर क्यों विशेष है, इसे यह पुस्तक समझाती है।

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