देश के अभिभावक बने मोहन भागवत

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मुहावरे की भाषा में ही इसे कहना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत दिल्ली आए। साफ मन और दिल से आए। सज-धजकर आए। चार दिन रहे। अपने कथन और भाव-भंगिमा से सिर्फ राजधानीवासियों का ही नहीं, पूरे देश और दुनिया का दिल जीत लिया। संघ के करीब 93 साल के इतिहास में यह पहली और इस प्रकार एक ऐतिहासिक घटना बन गई है। विज्ञान भवन के बंद सभागार में वे बोले। तीसरे दिन प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने जो कहा, वह कर्णप्रिय तथा सपनों को जगाने वाली आवाज थी। वह घर-घर पहुंच गई। विज्ञान भवन का नाम सार्थक हुआ।

‘भविष्य का भारत-संघ का दृष्टिकोण‘ वह शीर्षक है जो अनूठी पहल की पहेली बन गया है। संघ को चाहने वाले प्रेरित और उत्साहित हैं। इसलिए कि कोई विवाद नहीं पैदा हुआ। यह पहला अवसर है जब संघ के शिखर पुरुष के लंबे आख्यान में मीन मेख निकालने वाले एक शब्द भी ऐसा नहीं खोज सके जो उनकी मंशा पूरी करते हों। संघ के लिए इससे बड़ा महोत्सव दूसरा नहीं हो सकता।

 

“मोहन भागवत को जितने लोगों ने विज्ञान भवन में सुना, उससे अधिक बहुत बड़े समुदाय को उनके एक-एक शब्द को घर-दफ्तर बैठे हिन्दुस्थान समाचार, डिजिटल ने सुलभ कराया। इसका श्रेय विजय त्रिवेदी और उनकी टीम को है।”

 

मोहन भागवत को जितने लोगों ने विज्ञान भवन में सुना, उससे अधिक बहुत बड़े समुदाय को उनके एक-एक शब्द को घर-दफ्तर बैठे हिन्दुस्थान समाचार, डिजिटल ने सुलभ कराया। इसका श्रेय विजय त्रिवेदी और उनकी टीम को है। पूरी मीडिया ने वही छापा और दिखाया जो मोहन भागवत बोले। इस दृष्टि से संघ अपनी जय यात्रा में पहली बार प्रतीकात्मक रूप में चित्रकूट पहुंचकर मीडिया रूपी कोल भीलों का सहयोग-समर्थन प्राप्त कर सका है। फिर भी कुछ प्रश्न उठ रहे हैं। जैसे, एक यह कि संघ ने अपने अभिभावक कथन के लिए यही समय क्यों चुना? क्या इसलिए कि लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं? क्या संघ अपनी धारणाओं में परिवर्तन की सूचना दे रहा है?

ये प्रश्न वे लोग पूछ रहे हैं जो चकित हैं। वे मोहन भागवत की वाकपटुता से पहले मोहित हुए। अब प्रश्नों की गली में रास्ता खोज रहे हैं। व्याख्यान से अक्सर विवाद नहीं होता। उसे एक दृष्टिकोण का वक्तव्य समझा जाता है। प्रश्नोत्तर में परीक्षा होती है। मोहन भागवत के उत्तर ने ही वास्तव में अमिट प्रभाव छोड़ा है। जिससे संघ की व्याख्या बदल गई है। क्या वास्तव में उन्होंने ऐसी बात कही जो बिल्कुल नई हो। पहले न कही गई हो। अवश्य ही ऐसा हुआ है।

 

“विज्ञान भवन के आयोजन से मोहन भागवत देश के अभिभावक हो गए हैं। अब तक वे संघ के ही मार्गदर्शक थे। संघ एक लोकतांत्रिक संस्था है। इसे उन्होंने जिस तरह समझाया, वह सारे पूर्वाग्रहों को मिटा देने में समर्थ है।”

 

इस श्रेणी में हिन्दुत्व, जाति व्यवस्था, संविधान, आरक्षण, महात्मा गांधी, डा. लोहिया और भीमराव अंबेडकर आदि विषय आते हैं। मोहन भागवत ने राष्ट्रीयता, हिन्दुत्व और भारतीयता को एक ही माला की एक दूसरे की पर्यायी मनका बताया। इसे कौन स्वीकार नहीं करेगा? सभी स्वीकारेंगे। ऐसा ही भाव प्रकट हुआ है। उन्होंने पूर्वजों के प्रति गौरव, देशभक्ति और संस्कृति में श्रद्धा को राष्ट्रीयता का ऐसा आधार बनाया जिसमें हर भारतीय आ जाता है। उसी कड़ी में उन्होंने यह भ्रम भी दूर किया कि दूसरे सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरूजी‘  ने जो शाश्वत बातें कही हैं उसे ही प्रामाणिक मानना चाहिए।

वह ‘गुरूजी विजन एंड मिशन‘ पुस्तक में है। यह कहकर उन्होंने विचार नवनीत के उस अंश को अप्रासंगिक बताया जो विवाद का कारण रहा है। समय के साथ बदलने का स्वभाव संघ का है। इसे लोगों के गलेे उतारने के लिए उन्होंने कहा कि ‘समय बदलता है, संगठन की स्थिति बदलती है। हमारा सोचना भी बदलता है और बदलने की अनुमति हमें डा. हेडगेवार से मिलती है।‘

विज्ञान भवन के आयोजन से मोहन भागवत देश के अभिभावक हो गए हैं। अब तक वे संघ के ही मार्गदर्शक थे। संघ एक लोकतांत्रिक संस्था है। इसे उन्होंने जिस तरह समझाया, वह सारे पूर्वाग्रहों को मिटा देने में समर्थ है। प्रश्न संघ की कार्यपद्धति और रीति-नीति से संबंधित था। उस पर विस्तार से वे बोले। उनका यह वाक्य ही संघ की रीति-नीति को परिभाषित करता है-‘मैं जो बोल रहा हूं वह संघ की सहमति बोल रही है।‘ सरसंघचालक बनने के बाद मोहन भागवत ने सामूहिक सहमति की एक कार्यपद्धति अपनाई है। जिसे कुछ साल पहले अपने अनुभव से जान सका, वही इस समय सबने सही समय पर जाना। यही वास्तव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। जो देशज है। हमारी परंपरा में है।

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