था वह ऐतिहासिक क्षण

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अध्यक्ष के आसन पर बैठने की बारी अब डॉ. राजेंद्र प्रसाद की थी। बधाई भाषण के क्रम में ‘भारत-कोकिला और बुलबुले हिन्द’ सरोजिनी नायडू का भाषण जैसे ही समाप्त हुआ कि अस्थाई अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने संविधान सभा को अपने अनोखे अंदाज से चकित कर दिया। सरोजिनी नायडू कह चुकी थीं कि ‘बहैसियत औरत के सबसे अंत में उन्हें बोलने का अधिकार है।’ इसे डा. सिन्हा ने विनोद का विषय बनाया। इसलिए उसी लहजे में कहा कि उन्होंने ‘मेरा बोलना ही रोक दिया, पर आप में से बहुतेरे जो कानूनदां हैं, यह जानते हैं कि आखिरी बात आखिर आखिरी बात होती है।’ इस तरह डा. सिन्हा ने अपने लिए अवसर बनाया। वास्तव में वे ऐसे अवसर की बाट ही जोह रहे थे जब वे संविधान सभा के जरिए देश-दुनिया को डा. राजेंद्र प्रसाद का वह परिचय दे सकें जो अज्ञात सा था। वह आज भी प्रासंगिक है और प्रेरक भी है।

यह भविष्य में भी जस का तस रहेगा। उस ऐतिहासिक क्षण में डा. सच्चिदानंद सिन्हा के श्रीमुख से ये शब्द निकले- ‘इस महती सभा में जो लोग अभी यहां मौजूद हैं, उनमें मैं ही एक नाम का ऐसा व्यक्ति हूं, जिसे डा. राजेंद्र प्रसाद को गत 44 वर्षों से घनिष्ठ रूप से जानने की सबसे ज्यादा सुविधा प्राप्त है। मैं उन्हें उस समय से जानता हूं जब उन्होंने सन् 1902 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की, जिसका विस्तार उन दिनों असम से पंजाब और सीमा प्रांत तक था, मैट्रीकुलेशन परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। मुझे याद है कि उन्होंने जब मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम स्थान पाया था तो मैंने ‘‘हिन्दुस्तान रिव्यू’’ में जिसका तब मैं संचालक था और आज भी हूं, इस आशय का एक नोट लिखा था कि राजेंद्र प्रसाद सरीखे प्रतिभा संपन्न व्यक्ति को कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं है।’ ‘मैंने कहा था कि हम लोग इस बात की भविष्यवाणी कर सकते हैं कि वे एक दिन भारतीय राष्ट्रीय महासभा (कांग्रेस) के सभापति बनेंगे और सभापति का भाषण पढ़ते समय जैसा कि गतवर्ष लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में सर नारायण चंद्रावरकर के साथ हुआ। इन्हें भी वायसराय से पत्र मिलेगा, जिसमें उन्हें हाईकोर्ट की जजी देने की बात लिखी होगी। इनके संबंध में उस समय मैंने यह भविष्यवाणी की थी।

मुझे आशा है, और मैं विश्वास करती हूं कि यह आशा ठीक है कि मेरे मित्र डा. अम्बेडकर, जो आज इतने विरोधी हैं, शीघ्र ही इस संविधान सभा के कट्टर समर्थक बन जाएंगे। तब उनके लाखों अनुयायियों को भी यह बोध हो जाएगा कि उनके हित भी उसी तरह सुरक्षित रहेंगे जैसे और अधिक सुविधा प्राप्त वर्गों के रहेंगे। – सरोजिनी नायडू

ये भारतीय राष्ट्रीय महासभा (कांग्रेस) के एकाधिक बार सभापति तो हुए पर हाई कोर्ट का जज न होकर इन्होंने मुझे अवश्य ही बहुत निराश किया है। भला मैं क्यों इतना चिंतित था कि वे हाई कोर्ट के जज बनें? यह इसलिए कि उस पद पर पहुंचकर कर ये अपनी स्वतंत्र न्याय-बुद्धि और तीव्र आलोचना से ब्रिटिश नौकरशाही के प्रबंध विभाग को ठीक कर देते। परंतु यदि डा. राजेंद्र प्रसाद हाई कोर्ट के जज नहीं हुए तो संविधान सभा के अध्यक्ष तो निर्वाचित हुए। आज मुझे इस बात का गौरव है और मेरे जीवन का यह महत्तम गौरव है कि मैं उन्हें संविधान सभा का पहला भारतीय अध्यक्ष कह कर अध्यक्ष के आसन पर आसीन करता हूं (जिसको अयोग्यता पूर्वक कई दिनों तक मैं संभाले रहा)।’ इस पर सभा में प्रसन्नता और उल्लास की लहर उठी। सभा उनकी घोषणा की आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी। डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने संविधान सभा को ज्यादा इंतजार नहीं कराया। यह घोषणा की कि ‘अब मैं अस्थाई अध्यक्ष का आसन खाली करता हूं और इस महती सभा की ओर से डा. राजेंद्र प्रसाद से अनुरोध करता हूं कि वे इस आसन पर आएं और इसे सुशोभित करें। वे सर्वथा इसके योग्य हैं।’ इस पर सभा में ‘इनक्लाब जिंदाबाद’ और राजेंद्र बाबू जिंदाबाद के नारे देर तक लगते रहे। आचार्य जे.बी. कृपलानी ही थे जिन्होंने संविधान सभा के पहले दिन अस्थाई अध्यक्ष के लिए डा. सच्चिदानंद सिन्हा के नाम का प्रस्ताव रखा था।

अध्यक्ष के निर्वाचन के पश्चात उन्होंने ही अस्थाई अध्यक्ष डा. सच्चिदानंद सिन्हा के प्रति आभार जताया। यह याद दिलाया कि इन तीन दिनों में उन्होंने जो अपनी छाप सभा पर छोड़ी वह अमिट है। एक बार डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने सदस्यों से कहा कि ‘मुझे आशा है कि आप विवेक से काम लेंगे।’ इसका चमत्कारिक प्रभाव पड़ा। उस मनोभाव का अपनी शैली में मजाकिया चित्रण कर कृपलानी ने कहा कि ‘यदि हम लोग इसके बाद कुछ कहते तो हमारी विवेकबुद्धि पर उन्हें संदेह होगा और इसीलिए हमें चुप होकर बैठना पड़ा।’ यह उदाहरण संविधान निर्माताओं के आत्मसंयम को भी बताता है। यह एक कसौटी भी है। जिस पर आज की लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों का व्यवहार परखा जा सकता है। डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने सरोजिनी नायडू से कहा था कि वे अपना भाषण गद्य में नहीं, पद्य में दें। इसीलिए सरोजिनी नायडू ने अपने भाषण की शुरूआत यूं की‘ बुलबुल को गुल मुबारक गुल को सुखन मुबारक। रंगीन तबियतों को रंगे सखुन मुबारक।’ उन्होंने कहा कि ‘जब मुझसे कहा गया कि मैं राजेंद्र बाबू के संबंध में कुछ कहूं, तो मैंने जवाब दिया था कि मेरे लिए यह तभी संभव है जब मेरे पास सोने की कलम और शहद की स्याही हो, क्योंकि संसार भर की स्याही भी काफी नहीं है, जिससे उनके गुणों का वर्णन किया जा सके।’ उन्होंने आगे यह कहा कि डा. राजेंद्र प्रसाद के व्यक्तित्व में आध्यात्मिक रूप से करूणा, ज्ञान, त्याग और प्रेम उसी तरह हैं जैसे भगवान बुद्ध में था। इसे उन्होंने अपने अनुभवों के हवाले चिन्हित किया।

डा. राजेंद्र प्रसाद उनसे पांच साल छोटे थे। एक वक्ता ने कहा था कि डा. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के जनक स्वरूप संरक्षक रहेंगे। इसका उल्लेख कर सरोजिनी नायडू ने कहा कि ‘मेरी कल्पना में वह संरक्षक एक कठोर खड़गधारी न होकर एक सुमनोहर पुष्पधारी देवदूत के रूप में होगा, जो मानव हृदय पर विजय पाता है। यह इसलिए कि राजेंद्र बाबू में स्वाभाविक माधुर्य है जो बल का काम करता है, उनमें अनुभव जन्य सहज ज्ञान है, शुद्ध दृष्टि है, रचनात्मक कल्पना शक्ति और विश्वास है, जो गुण उन्हें स्वयं भगवान बुद्ध के चरणों के निकट पहुंचा देते हैं।’ सरोजिनी नायडू ने सिर्फ डा. राजेंद्र प्रसाद के व्यक्तित्व की सुगंध को ही प्रस्तुत नहीं किया, संविधान सभा के समक्ष जो यक्ष प्रश्न थे, उन्हें भी मजेदार तरीके से रखना वे नहीं भूलीं। इस तरह उनका भाषण संपूर्णता में था। संविधान सभा की कार्यवाही बताती है कि उन्हें बड़े ध्यान से सुना गया। किसी ने न रोका और न टोका। सरोजिनी नायडू की वाकपटुता का जादू सभा पर छाया रहा। वे बोलीं कि ‘इस सभा में कुछ जगहें खाली दिखाई दे रही हैं और इन मुस्लिम बंधुओं की अनुपस्थिति से मुझे हार्दिक क्लेश है। मैं उस दिन की ओर देख रही हूं जब ये बंधु भी चिर परिचित मित्र मि. मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में यहां उपस्थित होंगे। यदि इसके लिए प्रोत्साहन आवश्यक है, जादू की छड़ी जरूरी है तो मैं समझती हूं कि राजेंद्र बाबू का सहज सौजन्य, उनकी बुद्धि और उनका निर्माणात्मक विश्वास इसका काम करेंगे।’ कुछ सदस्यों के असमंजस को दूर करना भी वे अपना कर्तव्य समझती थीं। यही सोचकर उन्होंने कहा कि ‘मुझे आशा है, और मैं विश्वास करती हूं कि यह आशा ठीक है कि मेरे मित्र डा. अम्बेडकर, जो आज इतने विरोधी हैं, शीघ्र ही इस संविधान सभा के कट्टर समर्थक बन जाएंगे। तब उनके लाखों अनुयायियों को भी यह बोध हो जाएगा कि उनके हित भी उसी तरह सुरक्षित रहेंगे जैसे और अधिक सुविधा प्राप्त वर्गों के रहेंगे।

मुझे आशा है कि आदिवासी भी, जो अपने को इस देश का मौलिक स्वामी समझते हैं यह जान जाएंगे कि इस संविधान सभा में जाति और धर्म का, प्राचीन और नवीन का कोई भेद-भाव नहीं है। मुझे विश्वास है कि इस देश का छोटे से छोटा अल्पसंख्यक संप्रदाय भी, उसे चाहे जिस रूप में यहां प्रतिनिधित्व मिला हो, यह अनुभव करेगा कि उनके हितों की रखवाली वाला एक ऐसा सतर्क और स्रेह परायण संरक्षक है, जो कभी भी ऐसा न होने देगा कि सुविधा प्राप्त संप्रदाय उनके जन्मजात अधिकारों को समानता और सम अवसर के अधिकारों को रत्ती भर भी दबा सकें। मुझे आशा है कि देशी नरेश भी, जिनमें बहुतों को मैं अपना मित्र मानती हूं, जो आज चिंता, अस्थिरता अथवा भय में पड़े हैं, यह समझ जाएंगे कि भारत का विधान ऐसा विधान होगा, जो प्रत्येक भारतीय को चाहे राजा हो या रंक, सबको स्वतंत्रता और मुक्ति प्रदान करेगा।

मैं चाहती हूं कि सभी लोग इसे समझें, सभी इसका विश्वास करें और ऐसी समझ और ऐसा विश्वास उत्पन्न कराने का सर्वोत्तम माध्यम है राजेंद्र बाबू की संरक्षकता और उनका तत्वावधान।’ खुद से सवाल पूछते हुए वे बोलीं- ‘मुझे बोलने के लिए कहा गया है पर कितनी देर तक? मैं समझती हूं कि मुझे निश्चय ही इस पुरानी कहावत का खंडन करना चाहिए कि ‘औरत अंत में बोलती है और बहुत ज्यादा बोलती है’। मैं अंत में तो बोल रही हूं पर इसलिए नहीं कि मैं औरत हूं बल्कि इसलिए कि आज मैं भारतीय राष्ट्रीय महासभा (कांग्रेस) की मेजबान (यमजान) हूं और महासभा के प्रसन्नता पूर्वक इन अतिथियों को जो सभा के सदस्य नहीं हैं, संविधान बनाने में हमारा साथ देने के लिए आमंत्रित किया है और यह संविधान भारतीय स्वतंत्रता का अमर संविधान होगा।’ ‘मित्रो, मैं राजेंद्र प्रसाद की प्रशंसा नहीं करती और न उनकी सिफारिश ही करती हूं। मैं तो यह जोर देकर कहती हूं कि वे आज भारतीय भाग्य के, उसके लक्ष्य के प्रतीक हैं। वह हमें संविधान बनाने में सहायता करेंगे जो हमारी मातृ-भूमि को स्वतंत्र कराकर उसका उचित स्थान दिलाएगा। जो शांति, स्नेह और स्वातंत्र्य का प्रदीप दे उसे संसार का पथ-प्रर्दशक बनाएगा।’ उन्होंने अपने भाषण का समापन इन शब्दों में किया-‘बर्फानी छतों और समुद्री दीवारों के चिर प्रचीन अपने भवन में खड़ी होकर हमारी भारत-भूमि मानव इतिहास में फिर एक बार ज्ञान और प्रेरणा का दीपक जलाकर संसार के स्वातंत्र्य पथ को आलोकित करेगी। इस तरह पुन: उसे अपनी संतति का गौरव और संतति को अपनी माता का गौरव प्राप्त होगा।’ संविधान सभा का विधिवत प्रारंभ का क्षण उस समय आया जब डा. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष के आसन पर बैठे। तारीख थी-सन् 1946 में 11 दिसंबर की। सचमुच वह ऐतिहासिक क्षण था।

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