पाइका विद्रोह के दो सौ साल

आजादी के आंदोलन की एक लंबी शृंखला है। 1757 के प्लासी युद्ध और 1947 के बीच देश में अनगिनत संघर्ष हुए। ओडिशा का पाइका विद्रोह उन्हीं में से...

दावा बहुत है, तो दिखता क्यों नहीं

बात 19 सितंबर, 2017 की है। राज्य सरकार के छह महीने पूरे होने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मीडिया से मुखातिब हो...

आंदोलन की राह पर किसान

किसान अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं। फसल ऋण मांफी और फसल का लाभकारी दाम तय करने की मांग को लेकर अलग-अलग धरना-प्रदर्शन नहीं...

गडकरी का गंगा विचार

नए गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने कार्यभार संभालते ही अपने पहले संबोधन में दो विचार सामने रखे। पहला गंगा और अन्य नदियों से...

ताजा होती बंटवारे की स्मृति

देश ने 71वां स्वतंत्रता दिवस मनाया है। अगस्त का पूरा महीना उत्सव सरीखा रहा, लेकिनइसी दौरान राजधानी दिल्ली के बीचों-बीच बीकानेर हाउस में एक प्रदर्शनी लगी, जिसनेदेश बंटवारे के दर्द को ताजा कर दिया। 9 से 24 अगस्त तक चली इस प्रदर्शनी को ‘1947 आर्काइव‘ शीर्षक से लगाया गया था। प्रदर्शनी मेंकुछ वैसे सामान रखे गए थे, जिसे बंटवारे के वक्त आम लोगों ने इस्तेमाल किया था। प्रदर्शनी में एक छोटी छुरी रखी दिखी। उसके साथ एक पर्ची में जो लिखा है, उसके अनुसार छुरीभाग मल्होत्रा नामक व्यक्ति की है। बंटवारे के समय हुए साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान सुरक्षा केलिहाज से मल्होत्रा ने उस छुरी को अपने साथ रखा था। कहा जाता है कि ऐसे लोगों की संख्या काफी थी, जो हिंसा और भय के वातावरण में अपने पासयथासंभव धारदार हथियार रखने को विवश थे, ताकि मुश्किल घड़ी में परिवार और स्वयं की रक्षा करसकें। मुल्क के बंटवारे से प्रभावित लोगों से बातचीत कर बनी डॉक्यूमेंट्री भी यहां दिखाई गई। बीकानेर हाउस के एक खूबसूरत कक्ष में प्रदर्शनी लगी थी, जो कक्ष प्रवेश करते ही बंटवारे के दर्द का आभास करा रही थी। उस छुरी के साथ ही धातु से बनी यह सीटी रखी है। वह नंद किशोर निजवान की है। निजवानस्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश सेना में शामिल थे। बंटवारे के वक्त वे इस सीटी को अपने साथ भारत लेकरआए थे। देश बंटवारे के वक्त निजवान 19 साल के थे। मुल्क के बंटवारे से प्रभावित लोगों से बातचीत कर बनी डॉक्यूमेंट्री भी यहां दिखाई गई।बीकानेरहाउस के एक खूबसूरत कक्ष में प्रदर्शनी लगी थी, जो कक्ष प्रवेश करते ही बंटवारे के दर्द का आभासकरा रही थी। 70 साल पहले जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ था तो देश का बंटवारा भी हो गया। एक नए देश बना– पाकिस्तान। भारत और पाकिस्तान की सीमाओं की घोषणा स्वतंत्रता के दो दिन बाद 17 अगस्त कोहुई। अफरातफरी और हिंसा के बीच लाखों जिंदगियां तबाह हुई। काफी कम अंतराल में करोड़ों लोगसीमा के आर–पार आए और गए। उस दौरान जो घटनाएं हुईं ‘1947 आर्काइव‘ ने प्रदर्शनी के जरिएउस स्मृति को जिंदा किया है। इसकी वजह यही है कि समय के साथ वो स्मृतियां धुंधली पड़ती जा रही थी। जिस पीढ़ी ने बंटवारे कोदेखा और भोगा है, वह तेज़ी से खत्म हो रही है। उनके साथ उनकी यादें भी, लेकिन उनकी स्मृतियोंको उनकी ही आवाज में संरक्षित करने की कोशिश सराहनीय है। प्रदर्शनी में दर्द का इतिहास तो हैही, लेकिन मानवता के भी खुश खूबसूरत पल सुनने को मिलते हैं। यहां पत्थर और लकड़ी से बना यह मूसल रखा है, जो इसर दास निजवान का है। वे इसे पाकिस्तान केशहर डेरा गाजी खान से रोहतक ले आए थे। इसर दास निजवान एक हकीम थे और इस मूसल कीमदद से दवाइयां पीसने का काम करते थे। उसी तरह इंद्र प्रकाश पोपली का रिफ्यूजी पहचान पत्र भीरखा दिखाई देता है। उस पत्र के अनुसार पोपली का जन्म मुल्तान में हुआ था। विभाजन के दौरान वेदिल्ली चले आए। ऐसी कई ऐतिहासिक महत्व की चीजें बीकानेर हाउस में प्रदर्शित थीं। वहां लगी मानचित्र को देखकरकोई भी अनुमान लगा सकता था कि बंटवारे ने देश के हर कोने को प्रभावित किया। दिल्ली औरलाहौर के बीच आने–जाने वालों का तो कोई हिसाब ही नहीं है।

बाघों के 25 स्टार्ट-अप से अरबों की कमाई

यह आपको अजीब लगे पर हकीकत यही है कि भारत में इस समय बाघों के अनेक स्टार्ट-अप हैं और हरेक की कमाई करोड़ों नहीं...

न मृता तेन नर्मदा..

पिछले कुछ सालों से मीडिया की भूमिका सामाजिक-पर्यावरणीय आंदोलनों में तेजी से बढ़ी है। कैसे ?    कुछ समय पहले तक किसी भी आंदोलन की...

नौकरशाह बने भ्रष्टाचारियों के संरक्षक

संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाह भ्रष्टाचारियों के संरक्षक बने बैठे हैं। मंत्रालय से जुड़ी तकरीबन सभी संस्थाओं में यह चर्चा आम है। वे सहज ही...

पोर्नोग्राफी की दुनिया में खोता बचपन

बढ़ती तकनीक के इस दौर में बच्चों को उसके दुष्प्रभावों से बचाने का सवाल समाज औरदेश के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। 127 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 100 करोड़ से अधिक मोबाइल फोन तथा स्कूलों में इंटरनेट से जुड़कर बच्चे अब जल्दी बड़े होरहे हैं। इसकी गंभीरता को विचारक के.एन. गोविंदाचार्य ने पांच वर्ष पहले ही समझ लिया था और सरकार से इंटरनेट के कानूनों का कड़ाई से पालन कराने की मांग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। भारत में कॉन्ट्रैक्ट एक्ट कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ सोशल मीडियाकंपनियों द्वारा किए गए अनुबंध गैर–कानूनी हैं। अमेरिका में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे कानून केअनुसार सोशल मीडिया जैसे– फेसबुक, यू–ट्यूब इत्यादि से जुड़ नहीं सकते और 13-18 उम्र केबच्चे माता–पिता के माध्यम से ही सोशल मीडिया से जुड़ सकते हैं। इन नियमों का सोशल मीडिया कंपनियों के अनुबंध में भी उल्लेख रहता है, जिन्हें केन्द्र सरकार नेदिल्ली उच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर भारत में भी मान्यता दे दी। गोविंदाचार्य मामले में बच्चोंको साइबर संसार में सुरक्षा देने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को अनेक आदेश दिए थे, जिन्हें लागू करने में पूर्ववर्ती संप्रग और वर्तमान राजग सरकार पूर्णत: विफल रही हैं। भारत में स्मार्ट फोन और मोबाइल से 25 करोड़ लोग एडल्ट कंटेन्ट देखते हैं, जो डिजिटल इंडिया में सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है। सोशल मीडिया कंपनियां अपना कारोबार और लाभ बढ़ाने के लिए छोटे बच्चों को गलत जन्म तारीखके विवरण के माध्यम से फर्जी अकाउंट बनाने की खुली छूट देती हैं। इस बात के सबूत बीबीसी औरटीसीएस के सर्वे में मिलता है, जिसके अनुसार 10 से 12 वर्ष के तीन चौथाई बच्चे तथा 13 से 18 के96 फीसदी बच्चे सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं। स्कूलों में पढ़ाई का अजब तरीका बन गया है, जहां शिक्षकों द्वारा बच्चों को इंटरनेट से होम–वर्ककरने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे बच्चों की पढ़ने की क्षमता के साथ मस्तिष्क के क्रियाशीलविकास को काफी क्षति पहुंचती है। एसोचम की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार सोशल मीडिया केअधिक इस्तेमाल से बच्चों में खेल–कूद के साथ पढ़ाई में एकाग्रता की कमी, खराब खान–पान कीप्रवृत्ति और अवसाद के मामलों में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अलावा सोशल मीडिया में फेक–न्यूज सेएक भारत और इसके दुष्प्रभावों से श्रेष्ठ भारत का सपना भी दरक रहा है।    इंटरनेट के वहशी बाजार में बच्चों का नग्नता तथा अश्लीलता के लिए बढ़ता इस्तेमाल सोचनीय है।डिजीटल इंडिया के दौर में इंटरनेट तथा मोबाइल कनेक्टविटी के विस्तार के साथ बच्चों को पोर्नोग्राफी के खतरे से बचाने की जिम्मेदारी भी तो केन्द्र सरकार की है। पोर्नोग्राफी रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले चार वर्षों में अनेक निर्देशों के पालन में विफलतासे, कानूनों की लचरता के साथ सरकार की निरीहता भी स्पष्ट हो रही है। इंटरनेट के मामलों में केन्द्रसरकार ही प्रभावी कार्यवाही कर सकती है, पर पोर्न वेबसाइटस को रोकने में सरकार पूर्णत: विफल रही। गैर- कानूनी होने के बावजूद पोर्नोग्राफी का विस्तार इस बात से जाहिर है कि पोर्न स्टार रही सनी लियोनी गूगल में सर्वाधिक सर्च होने की वजह से भारत की सबसे चर्चित सेलिब्रिटी हैं। विदेशों में यौन पिपासु लोगों द्वारा बच्चों का पोर्नोग्राफी के लिए इस्तेमाल होता है, जो भारतीय कानूनके अनुसार पूर्ण   प्रतिबंधित है। भारत में आईपीसी, आईटी एक्ट तथा अन्य कानूनों के अनुसार पोर्नोग्राफिक साहित्य या वीडियो का निर्माण, प्रकाशन तथा प्रसारण गैर–कानूनी है। बच्चों की सुरक्षा के लिए पास्को जैसा सख्त कानून होनेके साथ पोर्नोग्राफी के लिए पांच साल की सजा और दस लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके बावजूद भारतीय बाजार में 20 लाख से अधिक वीडियो तथा अनेक वेबसाइट्स के माध्यम सेपोर्नोग्राफी की सहज उपलब्धता से बच्चों का जीवन नर्क बन रहा है। आंकड़ों के अनुसार बलात्कारतथा टीन प्रेग्नेंसी की संख्या में वृद्धि का बड़ा कारण अश्लील वीडियो का बढ़ता चलन है। पोर्नोग्राफी का निर्माण और प्रसारण ही गैर–कानूनी है, जिसे रोकने में सरकार विफल रही तो फिरपोर्नोग्राफी देखने को ही अपराध बनाने की बेतुकी मांग की जाने लगी। पोर्नोग्राफी बनाने तथा वितरणके खिलाफ कानून का पालन कराने में सरकार विफल रही तो फिर पोर्नोग्राफी देखने के विरुद्ध यदिकानून बन भी जाए तो उसका पालन कौन सी सरकारी मशीनरी कराएगी? सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके पहले भी इंटरनेट कंपनियों को लिंग जांच संबंधी विज्ञापन रोकने के आदेश दिए गए थे, पर उनका पालन अभी तक सुनिश्चित नहीं हो सका है। संता–बंता जैसे आपत्तिजनक चुटकुलों को इंटरनेट में रोकने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं ले पाई, क्योंकि सरकारके पास इंटरनेट के नियमन के लिए तकनीक और इच्छाशक्ति का अभाव है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह बताया कि बाल पोर्नोग्राफी के मुद्दे से निपटने के लिए समग्र कदमों के तहत पिछले महीने 3,500 बेवसाइट्स को ब्लॉक किया गया। सरकार को यह भी बताना चाहिए किब्लॉक की गई बेवसाइट्स नए तरीके से कैसे फिर बाजार में आ गई और यू–ट्यूब जैसे चैनलों में पोर्नोग्राफी कितनी आसानी से उपलब्ध है? पोर्नोग्राफी बच्चे और बड़े सभी के लिए गैर–कानूनी है।फिर ऐसी सभी बेवसाइट्स पर सख्ती से प्रतिबन्ध लगाने की बजाए, सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट मेंमामले को बेवजह भटकाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने स्टेट्स रिपोर्ट दायर करके बताया कि भारत में पोर्नोग्राफी पर लगाम लगानेके लिए अमेरिका स्थित एक निजी संस्था की मदद ली जा रही है। हकीकत यह है कि अमेरिकी संस्थानेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एण्ड एक्स्प्लॉयटिड चिल्ड्रन (एनसीएमईसी) लापता और पीडि़त बच्चों केबारे में 99 देशों की कानून परिवर्तन एजेंसियों को नि:शुल्क जानकारी देती है, जिसके साथ सीबीआईपिछले पांच वर्षों में अभी तक ठोस सम्पर्क ही नहीं कर पाई। केन्द्र सरकार की तरफ से पेश एएसजी ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि स्कूल की बसों में जैमर लगानासंभव नहीं है, परन्तु स्कूलों में सीबीएसई द्वारा जैमर लगाने पर विचार किया जा रहा है। आईटी एक्टतथा 2011 में बनाए गए नियमों के अनुसार पोर्नोग्राफिक कंटेंट तथा वेबसाइट्स को रोकने कीजवाबदेही इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (आईएसपी) की है, जिन्हें कानूनी भाषा में इंटरमीडियरी कहाजाता है। टीवी तथा अखबार में आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण के लिए संपादक की जवाबदेही का कानून है। सेंसर बोर्ड के पुराने कानूनों का पालन करके फिल्मों में गालियां रोकने का हास्यास्पद प्रयास हो रहा है। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट कंपनियों के नियमन में सरकार पूर्णत: विफल हो रही है। सरकार द्वारा यदि आईएसपी को पोर्नोग्राफी वेबसाइटों का प्रसारण रोकने का आदेश दिया जाए, तोस्कूल और बसों में जैमर लगाने की जरूरत क्यों पड़ेगी?  इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स खरबों का कारोबार कर रहे हैं, जिनसे नियमों का पालन कराने की बजाएसरकार द्वारा ऑनलाइन चाइल्ड एब्यूज के एडवांस सॉफ्टवेयर बनाने का दावा किया जा रहा है। स्कूलोंके 100 मीटर के दायरे में तंबाकू, गुटखा और सिगरेट बेचने पर प्रतिबंध है। महाराष्ट्र में स्कूल केकैंटीनों में जंग–फूड की बिक्री पर प्रतिबंध है। दरअसल इन अध–कचरे प्रतिबंधों से भ्रष्टाचार, पोर्नोग्राफी का गैर–कानूनी कारोबार के साथ चीन मेंबने सीसीटीवी एवं जैमर आदि का कारोबार बढ़ जाता है। अश्लील वीडियो यदि गैर–कानूनी है तोउन्हें सिर्फ बच्चों के ग्रुप में देखने से कैसे रोका जा सकता है। यदि पोर्नोग्राफी इंटरनेट में उपलब्ध हैतो बच्चों को घर या अन्य स्थानों में पोर्नोग्राफी देखने से कैसे रोका जा सकेगा? बच्चों को इस खतरे सेकैसे बचाया जाए, जबकि बड़े अफसर तथा माननीय भी विधान मण्डल में पोर्नोग्राफी देखते हुए पकड़े गए हैं! नवीनतम सर्वे के अनुसार मुंबई मेट्रो में फ्री वाई–फाई सुविधा का पोर्न देखने के लिए बहुतायत में इस्तेमाल होता है। एक अन्य सर्वे के अनुसार देश के सार्वजनिक स्थानों में उपलब्ध फ्री वाई–फाईसुविधा का हर तीन में एक व्यक्ति नग्नता देखने के लिए इस्तेमाल करता है। सरकारी दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों के कंप्यूटरों में पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स को चलाना गैरकानूनी है, जिन्हें ब्लॉक करके देश मेंबेहतर कार्य संस्कृति की शुरुआत क्यों नहीं की जाती? टीवी तथा अखबार में आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण के लिए संपादक की जवाबदेही का कानून है।सेंसर बोर्ड के पुराने कानूनों का पालन करके फिल्मों में गालियां रोकने का हास्यास्पद प्रयास हो रहा है। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट कंपनियों के नियमन में सरकार पूर्णत: विफल हो रही है। दरअसल, अश्लील वीडियोज और पोर्नोग्राफी का खरबों डॉलर का विश्व बाजार है, जिसकी खपत केमामले में भारत की  पांचवी रैंक है। एक अनुमान के अनुसार भारत में स्मार्ट फोन और मोबाइल से 25 करोड़ लोग एडल्ट कंटेन्ट देखते हैं, जो डिजिटल   इंडिया में सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है। इंटरनेट में पोर्नोग्राफी को रोकने से देश की टेलीकॉम कंपनियों द्वारा डेटा बिक्री से आमदनी में 30 से70 फीसदी तक की कमी हो जाएगी। कानून के अनुसार सरकार द्वारा इन बेवसाइट्स को यदि बंद कर दिया गया तो खरबों डॉलर का गैर–कानूनी कारोबार ठप्प हो जाएगा। ध्यान रहे कि छोटे–मोटे सटोरियों के खिलाफ कार्रवाई होती है, पर खरबों डॉलर के पोर्नोग्राफी व्यापार को रोकने में रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय समेत सभी सुरक्षा एजेंसियां विफल हो रही हैं। भारत में छोटे–बड़े सभी व्यापारी जीएसटी के दायरे में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए विवश हैं। भारत में व्यापार कर रहीइंटरनेट कंपनियों और वेबसाइट्स का जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता का नियम   यदि बन जाए, तो पोर्नोग्राफी के गैर–कानूनी तन्त्र की कमर ही टूट जाएगी। सेंसर बोर्ड के कट पर हल्ला बोलने वाले देश में इंटरनेट के पोर्नोग्राफिक संसार पर बवाल क्यों नहीं होता? भारत में   इंटरनेट के विस्तार के साथ सरकार अपनी जवाबदेही निभाने में विफल रही है, परबच्चों के चरित्र का कानून से ही नियमन भी तो संभव नहीं है। इस बारे में अध्यापकों और अभिभावकों को भी अपनी जवाबदेही निभाने के साथ सामाजिक जागरुकता बढ़ानी होगी। इंटरनेट सूचना ज्ञान का महासागर है, जिसमें नग्नता की गन्दगी के अनेक द्वीपों में समाज रम रहा है।कंपनियों के बड़े मुनाफे की वजह से इस नग्नता और उसके दुष्प्रभावों से सरकार आंख मूंद रही है।फिर सुप्रीम कोर्ट के अजब गजब आदेश बच्चों को पोर्नोग्राफी की रंगीन दुनिया में जाने से कैसे रोक सकेंगे?

रेरा को ठेंगा दिखाते बिल्डर

नोएडा में यूनीटेक का कास्केड नाम का प्रोजेक्ट है। इसमें कुल आठ टावर हैं निवेशकोंसे वादा किया गया था कि 2012 में उन्हें घर मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। घर की जगह खरीददारों को आश्वासन मिला, जो सालों तक चलता रहा। इससे तंग आकर खरीददारों ने कोर्ट का दरवाजा खट–खटाया। उन्होंने मांग की कि कंपनी उनका पैसा वापस करे। कंपनी बहाना बनाने लगी। कहने लगी कि उसके पास रुपए नहीं हैं। कोर्ट की सख्तीके बाद वह रास्ते पर आई। पर अभी तक खरीददारों को कुछ हासिल नहीं हुआ है। कुछ इसी तरह के हालात विस्टा प्रोजेक्ट (गुरुग्राम) को लेकर भी है। यहां भी खरीददारों को मकानतय समय पर नहीं मिला है। यूनीटेक से अलग कहानी जेपी इंफ्रा की नहीं है। उनसे भी निवेशकपरेशान हैं। एक दशक बीत जाने के बाद भी उन्हें घर नहीं मिला। यही नहीं, खरीददारों को मकान देने के बाद भी बिल्डर परेशान करते हैं। उनसे तरह–तरह के खर्चमांगते हैं। मसलन रख–रखाव का। खर्च न देने पर प्रोजेशन तक नहीं देते। विरोध करने पर बाउंसरोंसे मार–पिटाई कराते हैं। हद तो तब हो जाती है जब पुलिस बिल्डरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहींकरती। कानून को बने तीन महीने हो चुके हैं, पर एनसीआर के खरीददारों को कोई राहत नहीं मिली है। राज्य सरकार भी...

केन-बेतवा.. कुछ खामोश सवाल

आशंकाओं ने आकार लेना शुरू कर दिया है। केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के बारे में दावा है कि यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में...

खुद से संघर्ष करता यहूदी समाज

यहूदी हजारों साल से भारत में रहते आ रहे हैं। हमें कभी यहां के लोगों के जुल्मों का सामना नहीं करना पड़ा। हम खुद...

विश्व राजनीति में भारत का अंगद पांव

रूस के शासक परिवार का एक दंपत्ति करीब 150 साल पहले अपने साम्राज्य के दक्षिणीछोर पर कैस्पियन सागर के तट पर स्थित बाकू कस्बे के भ्रमण पर आया। स्थानीय गवर्नर ने जार और जरीना को वहां स्थित अग्नि मंदिर के बारे में बताया। शाही दंपत्ति जब अग्नि मंदिर पहुंचा तो भारतीय पुजारी ने परंपरागत तरीके से उनका स्वागत किया।उन्हें गर्भ गृह तक ले गया, जहां पृथ्वी से अग्नि की लौ प्राकृतिक रूप से प्रकट थी। यही मंदिर कीआराध्य ज्योति थी। आध्यात्मिक परिवेश से अभिभूत जरीना ने अपने पति से पूछा– ‘क्या हम भारत मेंआ गए हैं या हमारा साम्राज्य भारत तक फैल गया है।‘ आज बाकू मध्य एशिया के अजरबैजान देश का हिस्सा है। कभी दुनिया की ऊर्जा राजधानी माने  जानेवाले इस इलाके में तेल और प्राकृतिक गैस का इतना दोहन हुया कि   स्वाभाविक रूप से अग्नि मंदिरतक आने वाली गैस समाप्त हो गई। आराध्य लौ बुझ गई। ऐसे समय जब अमेरिका का ट्रंप प्रशासन विश्व मामलों में अपनी दिलचस्पी कम कर रहा है तो ‘शंघाई सहयोग संगठन‘ (एससीओ) इस रिक्तता को भरनेका कारगर माध्यम है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अजरबैजान अधिकारियोंसे आग्रह किया कि वे कोई वैकल्पिक व्यवस्था करें। आज बाकू का अग्नि मंदिर अजरबैजान कीसांस्कृतिक धरोहर है और वहां कृत्रिम  रूप से गैस की आपूर्ति कर आराध्य ज्योति को प्रज्जवलितरखा गया है। इसी तरह गुजरात मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को वर्ष 2001 में बाकू से कुछ दूर स्थित दक्षिणी रूस के अस्त्राखान  कस्बे के भ्रमण का अवसर मिला। वह आश्चर्यचकित रह गए, जब अधिकारियों नेवहां स्थित मुल्तानी बस्ती के बारे में उन्हें बताया। यह बस्ती भारतीय व्यापारियों ने बसाई थी, जो उसइलाके में कारोबार करते थे। बाकू का अग्नि मंदिर और अस्त्राखान की मुल्तानी बस्ती इस बात का प्रमाण है कि कुछ सदी पहले तक भारतीय लोग मध्य एशिया के देशों से सांस्कृतिक और व्यापारिक रूप से कितनी निकटता के साथ जुड़े थे। आजादी के बाद भारत के लिए यह अवसर था कि वह इन संबंध सूत्रों को और मजबूत बनाता। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय कूटनीति को मध्य एशिया केंद्रित बनाने की पहल की है। देश कीभावी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस इलाके का विशेष महत्व है। भारत को अतीत में पश्चिमोत्तर से ही हमलों का सामना पड़ा था। इस्लामी आतंकवाद यहां पांव जमा रहा है और भारत उसके निशाने पर है। एक व्यापक गठजोड़ के जरिए ही भारत इस खतरे का सामना कर सकता है। मोदी सरकार केकूटनीतिक प्रयासों का ही नतीजा है कि भारत को हाल ही में मध्य एशिया के देशों की प्रमुख भूमिकावाले एशियाई मंच ‘शंघाई सहयोग संगठन‘ (एससीओ) की पूर्ण सदस्यता हासिल हो गई है। पिछलेदिनों कजाखिस्तान के अस्ताना नगर में आठ और नौ जून को संपन्न एससीओ शिखर बैठक में भारतऔर पाकिस्तान को पूर्ण सदस्यता प्रदान की गई और इस प्रकार अब इस संगठन की सदस्य संख्याआठ हो गई है। यह ‘अष्ट प्रधान‘ 21वीं सदी की विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। अस्ताना घोषणा–पत्र विश्व को बहु–ध्रुवीय बनाने का जरिया बनेगा। एससीओ के चार्टर के अनुसार इस संगठन में शामिल देश अपने द्विपक्षीय मुद्दों को नहीं उठा सकते हैं। रूस और चीन के वर्चस्व वाले 16 वर्ष पुराने इस संगठन में अब तक कुल छह सदस्य थे। अन्यसदस्य थे–कजाखिस्तान, किर्गिजस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान।नए सदस्य देशों केप्रतिनिधि के रूप में प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने बैठक में भागलिया।ईरान, अफगानिस्तान, बेलारूस और मंगोलिया के नेताओं ने पर्यवेक्षक रूप में बैठक मेंहिस्सेदारी की।पहले भारत और पाकिस्तान को भी पर्यवेक्षक का दर्जा हासिल था। एससीओ के बीजिंग स्थित मुख्यालय में 15 जून को भारत तिरंगा और पाकिस्तान का झंडा फहरायागया।संगठन महासचिव रशीद अलीमोव ने इस अवसर पर कहा कि 16 साल पहले यह संगठन विश्वमानचित्र पर उभरा था।आज मुख्यालय पर आठ देशों का झंडा फहरा रहा है। ये सब देश संगठन के चार्टर की भावना के अनुरूप सम्मिलित रूप से विश्व घटनाक्रम को प्रभावितकरेंगे।बीजिंग में एससीओ मुख्यालय पर भारत और पाकिस्तान राष्ट्रीय ध्वजों का साथ–साथ फहरानाभारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति में एक नई शुरुआत है।सीमा पार आतंकवाद का शिकार भारतलंबे समय तक पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग थलग करने की मुहिम  चलाता रहा है। भारतने पाकिस्तान को राष्ट्रमंडल देशों की बिरादरी से बाहर रखने का अभियान भी चलाया  था। इसी तरह भारत चाहता है कि समुदाय पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करे इन परिस्थितियोंमें यह सवाल उठना  लाजिमी है कि भारत संगठन में क्यों शामिल हुआ, जिसमें पाकिस्तान बराबर की हैसियत रखता है? सरसरी तौर पर तो कारण यह है कि चीन संगठन में पाकिस्तान को शामिल करने की वकालत कररहा था लेकिन इससे भीमहत्व की बात यह है कि एससीओ चार्टर और इस संगठन की आतंकवाद विरोधी रणनीति भारत के तात्कालिक और   दूरगामी हितों से मेल खाती है। मुंबई हमलों सहित विभिन्नवारदातों से पल्ला झाड़ने वाले पाकिस्तान को एससीओ देशों की आतंकवादी विरोधी सैन्य औरखुफिया गतिविधियों में भाग लेना  होगा। आने वाले दिनों में असंभव लगने वाली बात संभव बनेगी, जब भारत और पाकिस्तान के कमांडोज एकसाथ एससीओ के आतंकवाद विरोधी अभियान के तहत सैन्य अभ्यास करेंगे।एक तरफ रूस चेचन्यामें तो चीन शिंजियांग में और भारत जम्मू कश्मीर में आतंकवाद का सामना कर रहा है।

इस्लामिक आतंकवाद पर एकमत मोदी और ट्रंप

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में हुई पहली मुलाकात से दोनों के बीच एक प्रकार की...

रोहानी की जीत में ईरान का भविष्य

ईरान में हसन रोहानी राष्ट्रपति पद पर दोबारा चुन लिए गए हैं। यह ईरान के लोगों की मानसिकता में आ रहे परिवर्तन और ईरानी...

सही समय पर नरेन्द्र मोदी की दस्तक

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाल ही में यूरोप के चार देशों की छह दिवसीय यात्रा कर वापस लौटे हैं। प्रधानमंत्री की यह यात्रा उस समय...

डुबकियों के तीन साल

आरटीआई से मिला एक जवाब, गंगा की अविरलता और निर्मलता की बहस पर ‘गिलोटिन’ की तरह गिरा। गिलोटिन प्राचीन काल में मृत्युदंड के लिए...

खराब निर्माण के लिए कौन जिम्मेदार?

घाटे में चल रही दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को एक और झटका लगा है। पंच निर्णय न्यायाधिकरण के आदेश के तहत दिल्ली मेट्रो रेल...

यहां हो रहा गांधी के सपनों से खिलवाड़

अब बिहार विद्यापीठ का केवल नाम रह गया है। यहां न कोई शिक्षक है, न छात्र। महात्मा गांधी ने स्वावलंबन के जो सपने देखे...

शताब्दी वर्ष में बिदेसिया को यहां से देखें

इस वर्ष ‘बिदेसिया’ के सौ साल पूरे हो रहे हैं। भिखारी ठाकुर ने 1917 में इसकी रचना की थी। फिर भी उनकी यह कृति...