स्वामी विवेकानंद ने दिया था शिकागो से सहिष्णुता का संदेश

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व्यक्ति विशेष के कारण कुछ तारीखें इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि आगे आने वाला समाज इससे निरंतर प्रभावित होता रहता है। साथ ही वह तारीख हमेशा व्यक्ति और समाज को आत्म-अवलोकन एवं आत्म-परिक्षण के लिए विवश करती रहती है। जिससे उन्हें मानवता के प्रति अपने दायित्वों का बोध लगातार होता रहता है। ऐसा ही एक तारीख है 12 जनवरी और व्यक्ति है विवेकानंद। 1863 में इसी दिन नरेंद्रनाथ दत्त का जन्म हुआ। स्वामी परमहंस की शिष्यता में ज्ञान का साक्षात्कार होने के बाद स्वामी विवेकानंद बने। वैसे तो उनका जीवन ही संदेशों से भरा हुआ है, लेकिन उनके महान योगदानों में से एक है शिकागो धर्म संसद में उनका वक्तव्य। उनके इस भाषण में एक तत्व था सहिष्णुता का। जिसे वर्तमान सन्दर्भ में समझने की आवश्यकता है। इस भाषण में विवेकानंद ने इस मान्यता को स्थापित कर दिया कि भारत का अर्थ और यात्रा धर्म के उस गुण में छिपा हुआ है जो उसे सहिष्णु बनाता है। किन्तु वर्तमान बौद्धिक विमर्श जब भारत की धार्मिक सहिष्णुता को ही खारिज कर देते हैं तो इसका उत्तर खोजना आवश्यक हो जाता है।

शिकागो धर्म संसद:
11 सितम्बर 1893 में स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म सम्मेलन में अपना ऐतिहासिक वक्तव्य दिया। कभी-कभी एक भाषण ही देश, राष्ट्र, समाज की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख देता है। विवेकानंद का यह वक्तव्य ऐसा ही माना जाता है, जिसने पश्चिम द्वारा ‘भारत की मिथ्या संकल्पना’ को अचानक तोड़ दिया। विवेकानंद के इस भाषण से भारतीय ज्ञान को न सिर्फ वैश्विक स्वीकार्यता बल्कि उसे सर्वोत्तम ज्ञान परंपरा के रूप में स्थापित भी करने का प्रयास किया। उसका मुख्य आधार सहिष्णुता था। किन्तु समय के साथ भारत ने विवेकानंद को सिर्फ तस्वीरों में ही कैद करने का प्रयास किया है। आज़ादी के पश्चात राज्य ने छद्म-धर्मनिरपेक्षता के कारण न सिर्फ विवेकानंद के विचारों से जनमानस को दूर किया है बल्कि अपने ज्ञान को भी पश्चिम के हवाले करने का काम किया है। सत्य और ज्ञान को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है। लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता है। विवेकानंद का अमरीका दौरा व्यापक चुनौती से भरा रहा था, हर कदम पर चुनौती और संघर्ष से वो जूझ रहे थे किन्तु अपने ज्ञान पर भरोसे ने उन्हें डिगने नहीं दिया। यही कारण रहा कि भारतीय ज्ञान पर अटूट, अटल विश्वास ने उन्हें अंतिम सिद्धि तक पहुंचा दिया। उनकी यात्रा के शुरुआत से लेकर संबोधन तक का विवरण भी सही अर्थों में व्यापक सन्दर्भ पूर्ण ज्ञात होता है। उनका संघर्ष न सिर्फ भौतिक था वरन मानसिक एवं मीमांसिक भी था।

यात्रा संघर्ष :
विवेकानंद को इस धर्म संसद में जाने से पूर्व न कोई औपचारिक आमंत्रण था न ही तकनीकी रूप में प्रतिभागी होने के शर्तें वो पूरी कर रहे थे। उन्होंने सिर्फ इतना ही सुना था कि अमरीका में किसी दिन, किसी समय, किसी स्थान पर एक सर्वधर्म सम्मेलन होने जा रहा है। बस मन की इच्छा को पूरी करने का निश्चय कर चल दिए थे। इस कार्य को लेकर उनके मन में यह विश्वास निश्चित ही था कि सही समय पर वहां उपस्थित हो जायेंगे, लक्षित कार्य भी सिद्ध हो जायेगा। खेतड़ी नरेश द्वारा जहाज की टिकट और काफी जिद्द के बाद एक अंगरखा के साथ विवेकानंद 31 मई 1893 को मुम्बई से अमरीका की यात्रा शुरू की। पानी के जहाज से श्रीलंका,जापान होते हुए वह मध्य जुलाई में बड़े कष्टमय यात्रा के बाद बदहवास स्थिति में शिकागो पहुंचे। शहर के औद्योगिक दृश्यों से शुरुआती साक्षात्कार उन्हें व्यापक लुभावना लगा। किन्तु अमरीकी समाज का नजदीक से परीक्षण ने उन्हें बैचेन कर दिया। वहां की सामाजिक परिस्थिति को देखकर विवेकानंद क्षुब्ध रह गये। उनका विश्लेषण उन्होंने यह निकाला कि पश्चिम का समाज अपनी भौतिक लालसा को समय की गति से संघर्ष में लगा कर आतंरिक रूप से व्यापक छत-विक्षत हो चुका है। ऐसे में उन्हें आगे की यात्रा और भी कठिन लगी।

विवेकानंद को जब मालूम हुआ कि धर्म सम्मेलन के लिए पंजीकरण की अवधि समाप्त हो चुकी है। सम्मेलन 11 सितम्बर से शुरू होना तय हो गया है तो उन्हें आघात पहुंचा। किन्तु ईश्वर ही जब विश्व-समाज को उनके ज्ञान का दर्शन करवाना चाहता हो तो हर समस्या का समाधान अपने आप हो जाता है। एक भौतिक एवं लालसा केन्द्रित समाज में संन्यासी का जीवन कितना दूभर होता है यह विवेकानंद के जीवन संघर्ष को देख कर मिलता है। सम्मेलन में भाग लेने के लिए सबसे आवश्यक था मान्यता प्राप्त धार्मिक संस्था से परिचयपत्र, शिकागो से जब उन्होंने मद्रास के एक मान्य धार्मिक सभा को अपने लिए एक प्रमाणपत्र भेजने को कहा तो उत्तर मिला ‘‘शैतान को ठंड खाकर मरने दो’’ बोस्टन की रेलगाड़ी में विवेकानंद से प्रभावित हार्वर्ड के प्रोफेसर जे.एच.राईट ने इस धर्म सम्मेलन में उनके प्रतिभागी होने की समस्याओं का समाधान निकाल दिया।

सोमवार, 11 सितम्बर 1893 को धर्म संसद की शुरुआत हुई। भारत से एक नहीं, कई धर्मों, पंथों के नुमाइंदे बैठे थे। ब्रह्म समाज के प्रतापचन्द्र मजूमदार, ईश्वरवादियों के नागरकर, श्रीलंका के बौद्ध प्रतिनिधि धर्मपाल, जैन धर्म के गांधी, थियोसोफिकल सोसायटी के चक्रवर्ती। रोमा रोलां के अनुसार विवेकानंद इन मठाधीशों से अलग थे। वे सही अर्थों में भारत के संपूर्ण ज्ञान और धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो वैदिक ज्ञान के निरंतर प्रवाह पर आज भी न सिर्फ जीवित है बल्कि संपूर्ण विश्व को अंधेरे से उजाले में लाने की क्षमता रखता है।

लगभग सात हजार दर्शकों से भरे उस कक्ष में विवेकानंद शुरुआत में कई बार अपने बोलने की बारी को आगे बढ़ा रहे थे, किसी भी सभा को संबोधित करने का यह उनका पहला अनुभव था। उनसे पूर्व सभी मठाधीशों ने अपने-अपने धर्म, पंथ की विशेषताओं का व्यापक व्याखान प्रस्तुत किया। सभा के अधिकतम दर्शक लगभग शांत हो चुके थे, सभी स्वयं-गाथा सुनते-सुनते शुष्क हो चुके थे। किन्तु जब एक संन्यासी जिसका मनोहारी चेहरा, कुलीन चालढाल और भगवा के भव्य वेश ने अपने संबोधन का पहला वाक्य ‘अमरीका के बहनों और भाईयों’ बोला तो सभा अचानक ऊर्जावान होकर लगभग 10 मिनट तक करतल ध्वनि से अभिनंदन करती रही। उसके बाद उनके भाषण ने सिर्फ इस सम्मेलन की दिशा दशा बदली बल्कि सम्मेलन के अगले दिन वो दर्शकों के अनुरोध पर लगभग बारह बार नई ज्ञान के साथ सभा को संबोधित किए। इस भाषण में उन्होंने कई बातों पर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया किन्तु दो बातें आज के राजनीतिक वातवरण को सोचने के लिए प्रेरित करती है। पहला भारतीय राष्ट्र की धार्मिक सहिष्णुता, दूसरा धर्म-परिवर्तन।

धार्मिक सहिष्णुता:
विवेकानंद अपने भाषण में हिन्दू धर्म एवं भारतीय समाज की धार्मिक सहिष्णुता को अपना मुख्य आधार बनाया। उनके अनुसार यही सबसे प्रमुख गुण है जिस कारण भारतीय सभ्यता अभी तक चली आ रही है। किन्तु वर्तमान समय में विभिन्न संकुचित वैचारिक मानसिकता वाले लोगों ने भारतीय समाज को ऐतिहासिक रूप से असहिष्णु घोषित करने का बेड़ा उठा लिया है, जिसका व्यापक एवं वैचारिक प्रतिउत्तर इस भाषण में मिलता है। विवेकानंद ने अपने इस भाषण के शुरुआती वक्तव्य में सभी धर्मों के लोगों को संबोधित करते हुए ‘उन वक्ताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया, जिन्होंने यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है मुख्यतया भारत से अर्थात अंग्रेजों के राज में जब भारत गुलामी के जंजीरों में बंधा था, भारतीय समाज ने अपने मूल गुण असहिष्णुता को सहेज कर रखा हुआ था। विवेकानंद ने अपने भाषण में कहा ‘‘मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का मंत्र सिखाया है।’’
भारत न सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में विश्वास रखता है, बल्कि विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में भी स्वीकार करता रहा है। अपने भाषण को तर्क प्रदान करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों को परेशान किए बिना सभी लोगों को शरण दी है। इजराइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर अभी तक भारत ने ही रखा है जबकि रोमनों ने उनके धर्म स्थलों पर हमला कर खंडहर बना दिया था। भारत ने महान पारसी धर्म के लोगों को भी शरण दी और आज भी वो हमारे साथ साथ हैं।’
विवेकानंद के भारतीय धार्मिक सहिष्णुता के तर्क को उस काल खंड में विश्व ने तो स्वीकार कर लिया, किन्तु समय के साथ हम स्वयं ही भूल गये। यही कारण है कि आज इस देश के ही कई तथाकथित बुद्धिजीवी एवं राजनीतिक दल सरकार के विरोध करने के चक्कर में भारत के आधार-मूल्यों पर ही प्रश्न खड़ा करते हुए भारतीय समाज को असहिष्णु घोषित कर देते हैं। सदा से भारत के समाज का अभिन्न अंग है सहिष्णुता, जिस आधार पर यहां ज्ञान, धर्म आदि निरंतर विकसित होते रहे हैं। भारत को समझने के लिए पश्चिम के ज्ञान की आवश्यकता नहीं है, इस देश की ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने वाले विवेकानंद जैसे संन्यासियों के विचारों से देखने का प्रयत्न किया जाना चाहिए, जिससे स्वत: भारतीय समाज में सहिष्णुता दिखाई देगा।

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