रोजगार देता जैविक उत्पाद

हाड़ पर बहुप्रचलित कहावत है कि पहाड़ों का पानी और जवानी दोनों ही यहां नहीं टिकते। पानी तो नीचे बहकर आता है और लोगों को जीवन देता है। जवानी से तात्पर्य ये है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, रोजगार की चाह में अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाता है। इसी बात का ध्यान रखते हुए कुछ लोगों ने मिलकर यह योजना बनाई कि हमारे युवा यहीं रुके और किसी तरह आत्मनिर्भर बने। सामाजिक कार्यकर्ता भवानी भट्ट अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर उत्तराखंड के बागेश्वर के छोटे से गांव गारुड़ में हिम आॅर्गेनिक नाम की एक संस्था चला रहे हैं। इस संस्था का उद्देश्य उन युवाओं को दोबारा पहाड़ पर वापस लाना है जो छोटे रोजगार के चक्कर में अपना घर छोड़कर महानगरों की धूल फांक रहे हैं। भवानी भट्ट के इस प्रकल्प में उनके दो साथियों हेम चंद्र पंत और महेंद्र सिंह बिष्ट उनकी मदद कर रहे हैं। संस्था का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में कहते हैं, कि बागेश्वर में गांव-गांव में मिल रहे रोजगार के चलते लोग आजीविका हासिल कर रहे है। लोग स्वरोजगार के तहत मडुआ से विभिन्न प्रकार की चीजें उगा रहे हैं। सूदुर गांव में मिलने वाले इस रोजगार का सरोकार सीधे सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधा से है। स्टैंडअप इंडिया और स्टार्टअप इंडिया का ये नतीजा है। भले ही मन की बात के इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने हिम आॅर्गेनिक संस्था का नाम न लिया हो लेकिन संस्था के संचालक भवानी भट्ट का कहना है कि पूरे बागेश्वर में हम ही जैविक खेती कर रहे हैं। जिसकी गूंज पूरे दिल्ली तक पहुंच रही है। हालांकि सरकार की तरफ से उस स्तर का सहयोग अभी तक नहीं मिला जिसकी हमे अपेक्षा थी। भवानी भट्ट की बात को समझना है तो पहाड़ की तरफ जाना होगा। पिकनिक मनाने की बात दूसरी है जब वहां रहना होता है तो समस्याओ का सामना होता है। हिम आॅर्गेनिक के माध्यम से भवानी भट्ट नौजवानो से जैविक खेती से जुड़ने की अपील कर रहे हैं। वह युवाओं को जैविक खेती और उससे होने वाले लाभ के बारे में भी बता रहे हैं। भवानी भट्ट का कहना है कि ‘उत्तराखंड को अलग करने के लिए आंदोलन हुए। आज उत्तराखंड अलग हो चुका है लेकिन इस नये प्रदेश को बनाने वालों ने पहाड़ के साथ एक बड़ा हिस्सा सपाट क्षेत्र का जोड़ दिया। इस फैसले ने पहाड़ की समस्या को जस का तस बनी रहने दिया। प्रशासनिक लोग ये समझ नहीं सके कि एक अलग राज्य बनवाने का कारण क्या था? उत्तराखंड बने 18 साल हो चुके हैं लेकिन स्थिति आज उससे भी बुरी हो चुकी है। ’ इस काम में भवानी भट्ट का साथ दे रहे हेम चंद्र पंत का कहना है कि ‘हम युवाओं से सिर्फ एक बात कहना चाहेगें कि अपनी नई तकनीक के साथ खेती करो जिससे उपज को बढ़ावा मिले। इस काम में बस इतनी जरूरत है कि रासायनिक का उपयोग बिल्कुल भी नहीं करना है। जो बाजार का दाम है उससे अच्छा दाम हम देने का प्रयास भी कर रहे हैं। यहां तक कि खेती के लिए पहले से भुगतान भी किया जाएगा। ’ महेंद्र सिंह बिष्ट कहते हैं ‘हम लोग 20 साल से इस मिशन में लगे हुए हैं ।

उत्तराखंड प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे नारयण दत्त तिवारी के साथ मुझे काम करने का मौका मिला। हमारे काम में वही जोश देखने को मिलता है जिसकी ट्रेनिंग नारायण दत्त तिवारी जी से मुझे मिली थी।’ – भवानी भट्ट

इसका प्रतिफल ये है कि बागेश्वर जैसे पहाड़ी स्थान पर हजारों की संख्या में किसान हमारे साथ जुड़ चुके हैं। ये सभी किसान आॅर्गेनिक खेती कर रहे हैं। हमारी संस्था पंजीकृत है। हमारे यहां उत्पाद के बाद होने वाले पैकिंग और सिंलिग में काम करने वाले युवाओं की संख्या 70 के करीब है जोकि गांव में ही रोजगार प्राप्त कर रहे हैं।’ अब हिम आॅर्गेनिक देश भर में गैर रासायनिक खाद्य सामग्री बेच रही है। यहां हल्दी से लेकर सभी तरह के अनाज उनके द्वारा उगाये जा रहे हैं। वह कुछ ऐसे भी अनाज उगा रहे हैं जो सिर्फ उत्तराखंड के पहाड़ों पर ही मिलते हैं। जैसे मडुआ है, सोयाबीन है, पहाड़ के फलों का अचार, जूस, जैम, मडुवा नमकीन, भट्ट नमकीन, मडुवा बिस्किट, मसाला, दाल, हर्बल टी, निटिल सिसुड़ा, लेमन ग्रास, कैमोमाइल, तुलसी, बुरांश, मल्टीग्रेन आटा, मडुवा, चौलाई, पल्थी, आटा, तिमुल, बेडू, लखौरी मिर्च समेत कई उत्पादों को बहुराष्ट्रीय पैकेज में बाजार में दिया जा रहा है।

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