महिलाओं के लिए निराशाजनक

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खेल जगत को छोड़ दें तो महिलाओं के लिए साल 2018 निराशा से भरा रहा। उनके सशक्तिकरण के दावे खोखले साबित हुए। यौैन हिंसा में आई बढ़ोतरी से बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे खूबसूरत कार्यक्रमों पर भी सवाल उठने लगे। कुपोषण से बच्चियों का मरना जारी रहा। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद महिलाएं सबरीमाला मंदिर में दाखिल नहीं हो सकीं। परंपरा के नाम पर मंदिर में उनके प्रवेश पर लगी रोक जारी रही। स्थानीयता को इसमें जिस तरह ऊपर रखा गया, उससे साबित करने की कोशिश हुई कि महिलाओं की समस्याएं व मुद्दे सभी जगह एक नहीं हैं। इससे महिला आंदोलन की अवधारणा ‘महिलाओं की अपनी एक जात और एक से हित’ कमजोर हुई। खास बात इसमें यह रही कि खुद उस क्षेत्र की महिलाओं ने ही आगे बढ़कर कहा कि वे कई सालों से चली आ रही इस परंपरा का स्वागत करती हैं। तृप्ति देसाई ने मंदिरों में प्रवेश के मुद्दे को अदालत में सामाजिक समानता व स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार और उनके स्वाभिमान को कायम करने के लिए उठाया था पर वे नहीं जानती थीं कि देश की बदली राजनीति में इस मुद्दे का भी इतना राजनीतिकरण हो जाएगा कि वामपंथी सरकार और भाजपा दोनों आमने सामने आ खड़े होंगे।

सबरीमाला मुद्दे के इस हद तक राजनीतिकरण के पीछे हाथ भारत सरकार के ‘समान आचार संहिता’ और ‘तीन तलाक पर रोक’ जैसे बिलों को रोकने की मुस्लिम कट्टरपंथी संस्थाओं, दलों और उनके समर्थक विपक्षी दलों की कोशिशें भी रहीं। भाजपा सरकार की पूरी कोशिश थी कि ये दोनों बिल 2018 में पास हो जांए पर राज्य सभा में उसे बहुमत नहीं मिल सका। गलती सरकार की भी रही। अगर उसने इन दोनों बिलों पर प्रमुख राजनीतिक दलों में आम सहमति बना ली होती तो सबरीमाला समेत महिलाओं संबंधी इनमें से किसी भी मुद्दे का राजनीतिकरण न होता और न ही वे सांप्रदायिक राजनीति की चपेट में आते। नतीजा, पैतृक सत्ता को कमजोर करने वाले इन सभी बिलों व सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बावजूद 2018 में पैतृक सत्ता और मजबूत हो गई। पैतृक सत्ता को कमजोर करने वाला एक और अभियान ‘मी टू’ शुरू हुआ। यह किसी संवैधानिक संस्था की पहल न होकर खुद महिलाओं की पहल थी।

फिल्म उद्योग से शुरू होकर मीडिया उद्योग की महिलाएं जिस कदर एक के बाद एक अपने कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण की कहानियां व अनुभव लेकर सामने आईं, उससे सबित हो गया कि सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन लाने वाले इन दोनों माध्यमों के अंदर कितनी सड़न भरी हुई है और बाहर से सशक्त दिखने वाली महिलाओं के लिए निराशाजनक महिलाएं फिर वे चाहे अभिनेत्री हों या पत्रकार, अपने पुरुष सहयोगियों के सामने कितनी कमजोर व असहाय हैं। अच्छी बात यह रही कि एम जे अकबर जैसे पत्रकार बनाम राजनेता को अपना मंत्री पद छोड़ना पड़ा। और भी कई बड़े पत्रकारों व अभिनेताओं को अपना काम गंवाना पड़ा। लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि कार्यस्थलों पर पैतृक सत्ता में कोई कमी जल्दी से आ जाएगी। हो सकता है वह तो न ही आए, महिलाओं के लिए विभिन्न संस्थानों में रोजगार और कम हो जाए।

ऐसे में अगर कहा जाए कि 2018 का साल महिलाओं के विकास की उल्टी चाल की दस्तक है तो गलत नहीं होगा। महिला सशक्तिकरण के लिए अहम संसद और विधानसभाओं ने 33 फीसद आरक्षण का प्रकरण भी लंबित है। हालिया चुनावों में महिलाओं को कम टिकट देकर सियासी दलों ने पैतृक सत्ता को बनाए रखने में दिलचस्पी दिखायी। …2018 सबसे ज्यादा जाना जाएगा यौन हिंसा के लिए। महिलाओं के प्रति हिंसा ने संगठित रूप लिया। बिहार व हरियाणा से जिस तरह रह रहकर महिलाओं के विकास के नाम पर चल रहे गैर सरकारी संगठनों की महिलाओं के यौन शोषण की खबरें आती रहीं, उससे साफ हो गया कि अब यह हिंसा एक संगठित रूप ले रही है। महिला मंत्री तक के इसमें शामिल पाए जाने से सारा समाज ही चिंताग्रस्त हो गया है। दिल्ली में आठ माह तक की बच्चियों से बलात्कार की बढ़ती वारदातों से हर मां आज चिंता में है। अगर इस हिंसा को रोकने के जरूरी उपाय न हुए तो यह बच्चियों की भ्रूण हत्या व महिलाओं को फिर से चारदिवारी में ले जाने वाला भी साबित हो सकता है।

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