पहले नफरत बसी, फिर पाक – इमाम मोहम्मद ताहिदी

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स्लाम में कट्टरपंथ के खिलाफ अलग-अलग मंचों से आवाज बुलंद करने वाले इमाम मोहम्मद ताहिदी पिछले दिनों दिल्ली में थे। राजधानी पहुंचने के साथ ही ट्विटर पर अपने प्रशंसकों के लिए एक संदेश छोड़ा जिसमें उन्होंने भारत की सुंदरता की बड़ाई की। मोहम्मद इमाम इंदिरा गांधी कला केंद्र में ‘अर्थ-अ कल्चर फेस्ट’ नाम के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये थे। वहां देश भर से आये युवाओं से वह मुखातिब थे। मोहम्मद ताहिदी का जन्म ईरान में हुआ था। इराक-ईरान की लड़ाई और सद्दाम हुसैन के बढ़ते आतंक के चलते वह अपने परिवार सहित ऑस्ट्रेलिया में जाकर बस गये। यहां से वह इस्लाम में कट्टरवाद के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। इस्लाम को लेकर कड़े बयानों पर उनके खिलाफ फतवा भी जारी किया जा चुका है। मुस्लिमों का एक तबका उन्हें ‘फेक इमाम’(फर्जी इमाम) भी बताता है। ऑस्ट्रेलिया के नेशनल इमाम काउंसिल भी बयान देकर उन्हें फर्जी शेख बता चुकी है।

जब उनसे पूछा गया कि आप पर मुस्लिम विरोध का आरोप लगता रहता है? उनका जवाब बड़ा संजीदगी भरा रहा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज को लेकर लोगों की सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। उसके पर्याय को बदलना होगा। मैं इस्लाम के पाकिस्तानीकरण का विरोधी हूं। इस्लाम का विरोधी नहीं हूं। पाकिस्तान, मुस्लिम समाज के दुष्प्रचार का सबसे बड़ा अड्डा बना हुआ है। इसकी वजह वहां पनप रहा कट्टरवाद है। मैंने एक बात गौर की, वह यह कि सभी देशों में अपनी सेना है। लेकिन पाकिस्तान पूरा का पूरा देश ही खुद एक सेना है। जिन्ना ने एक ऐसा देश बनाया जहां नफरत पहले बसी, उसके बाद देश बना।

वह कहते हैं कि मेरी समझ से, इस्लाम को लेकर सोच में बदलाव जरूरी है। लोकतंत्र में विश्वास बढ़ना चाहिए। मानवता में विश्वास बढ़ना चाहिए, तभी हम कट्टरवाद से छुटकारा पा सकेंगे। मुस्लिम समाज के पास बोलने की स्वतंत्रता और लिखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। हर बात पर फतवा और कट्टरवाद किसी भी समाज को विकसित नहीं कर सकता।
वह कहते हैं कि मैं पहला इमाम हूं जिसने खुद महिला इमाम को ऑस्ट्रेलिया में नियुक्त किया। उसको लेकर मेरी खूब आलोचना भी हुई। मेरा मानना है कि हिजाब को लेकर जब तक मुस्लिम कट्टरपंथियों की सोच नहीं बदलेगी तब तक महिलाओं के विकास में रुकावटें आती रहेंगी। कई ऐसे मुस्लिम देश हैं जहां हिजाब अनिवार्य नहीं है। लेकिन कई जगहों पर इसको लेकर जबरदस्ती का हो हल्ला होता है। मेरी शिकायत शरिया कानून अपनाने वाले मुस्लिम देशों से है। आप देख सकते हैं कि कुछ समय पहले लंदन में आतंकी हमला हुआ था। ये इस्लाम में ही कैंसर की तरह फैल रहे कट्टरपंथ का नतीजा है।

भारत में गाय खाने, न खाने पर विवाद होता है। इस पर आप क्या कहना चाहेगें? यह बेहद दिलचस्प बात है कि कुरान खाने के बारे में कुछ नहीं कहता। बेशक शराब को छोड़कर। सलाद खाओ, बीफ खाओ, क्या खाओ, क्या न खाओ, ये कौन सी बात है? अब इस्लाम ये नहीं कहता कि ये खाओ, तभी तुम मुसलमान हो। मैं खुद दो साल से शाकाहारी हूं। मैं यहां एक बात और जोड़ना चाहता हूं। किसी भी देश में अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक समाज के विचारों की पूरी इज्जत करनी चाहिए। ये उसकी मजबूरी नहीं बल्कि उसकी जिम्मेदारी है। बहुत बड़ा है खाने का क्षेत्र है, जरूरी नहीं कि गाय ही खाई जाए।

उन्होंने दावे के साथ कहा कि भारत एक शानदार देश है। व्यवस्था पर विश्वास करो। गजब का देश है यह। मैं नेता नहीं हूं। लेकिन जब इस्लाम भारत आया तो यहां हिन्दू जनसंख्या ही थी, कश्मीर हिन्दू-धरती है। इसमें क्या गलत है? इस सवाल पर कि क्या भारत माता की जय कहने से कुछ फर्क पड़ता? वह कहते हैं कि आप अल्लाह-ओ-अकबर बोल सकते हैं तो मैं भारत माता की जय भी बोल सकता हूं। इसमें इस्लाम कहां से आ गया?

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