परंपरा और संस्कृति की ओर

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असम के वनवासियों में हिन्दू रीति-रिवाज से फिर शरू हो गए विवाह समारोह

सम और पूर्वोत्तर का वनवासी समाज बदल रहा है। वह अपनी पुरानी परंपराओं की ओर लौट रहा है। इसमें सहायक हो रहे हैं विद्या भारती, संस्कार भारती, वनवासी कल्याण आश्रम और इस्कान जैसे स्वयंसेवी संगठन। ब्रिटिश शासकों ने किस तरह भारतीय संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट किया, इसके कई जीवंत उदाहरण आज भी देश के पूर्वोत्तर राज्यों में मिलते हैं। साम्राज्य विस्तार के साथ ही ईसाइयत का विस्तार करने के लिए इनके द्वारा विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाए गए। जहां, एक ओर शासन स्थापित कर चारों ओर लूट खसोट मचाया गया। वहीं, समाज के दबे-कुचले लोगों का धर्म परिवर्तन कराकर उनके संस्कार को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया। इनकी चपेट में सबसे अधिक भोले-भाले वनवासी आए। जो लंबे समय से अपनी परंपराओं से बंधे चले आ रहे थे। अंग्रेज जब भारत के पूर्वोत्तर राज्य में पहुंचे, उससे काफी पहले अमेरिकन बैप्टिस्ट मिशनरियां पहुंच चुकी थी।
इन मिशनरियों ने पूर्वोत्तर राज्यों के जंगलों में रहने वाले वनवासियों का धर्मांतरण करवाया और उन्हें उनके संस्कार से भ्रष्ट कर दिया। मेघालय की खासी जनजाति द्वारा ही किसी समय में विश्व प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में पूजा-अर्चना शुरू की गई थी, लेकिन आज खासी समुदाय ईसाइयत का झंडाबरदार बन चुका है। ब्रिटिश शासकों के साथ यहां आए उद्योगपतियों ने असम की उर्वरा भूमि की तरफ आकृष्ट होते हुए यहां चाय की खेती शुरू की। इसके लिए उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना आदि स्थानों से संथाल, उरांव, मुंडा खरिया आदि प्रजाति के वनवासी स्त्री-पुरुषों को बंधुआ मजदूर बनाकर लाया गया। इनसे न सिर्फ चाय के खेतों और फैक्ट्रियों में जानवरों की तरह काम करवाया जाने लगा। बल्कि, इनका धर्म परिवर्तन करके इन्हें ईसाई भी बना दिया गया। इन्हें नशे की लत डाल दी गई। इनके सोचने की क्षमता समाप्त हो जाए। हुआ भी ऐसा ही। पीढ़ी दर पीढ़ी ये गुमनामी के अंधेरे में डूबे रहे।
सन 1947 में अंग्रेजी हुकूमत समाप्त होने के बाद भी ब्रिटिश चाय कंपनियां यहां बनी रहीं। इन चाय मजदूरों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। धीरे-धीरे ब्रिटिश चाय कंपनियों के हाथों से अधिकांश चाय कंपनियां देशी उद्योगपतियों के हाथों में आने लगीं। लेकिन, इस जनजाति के लोगों की जीवन दशा में कोई बदलाव नहीं आया। स्थिति की गंभीरता का पता तब चला जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कई अनुषांगिक ईकाइयां यथा विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, विश्व हिंदू परिषद, विवेकानंद केंद्र के अलावा इस्कॉन जैसी संस्थाएं इनके बीच पहुंचीं। इनके बीच किसी भी प्रकार की सांस्कृतिक परंपरा नहीं बची थी। यहां तक कि इन्हें किसी भी परंपरा का ज्ञान नहीं था। स्त्री-पुरुष पीढ़ी दर पीढ़ी एक दूसरे के साथ रहते थे, लेकिन उनकी शादियां नहीं होती थीं। संतान होती थीं। फिर संतान भी उसी प्रकार रहती थी। समाज में इसकी वजह से एक बड़ी विषमता उत्पन्न हो गई। बच्चों को पिता का नाम ही नहीं मिलता था। हर कदम पर इन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता था।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इन संगठनों ने इन वनवासियों की सामूहिक शादी करवाने की योजना बनाई। प्रयोग के तौर पर वर्ष 2009 में 12 जोड़ों की शादियां करवाई गईं। इससे इस समाज में शादी के प्रति एक उत्साह जगी। इसके बाद वर्ष 2015 की 5 फरवरी को 467 जोड़ों की शादियां एक साथ करवाई गई। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए चालू वर्ष की तीन फरवरी को 400 जोडि़यों का सामूहिक विवाह शोणितपुर जिले के रंगापारा शिव मंदिर परिसर में संपन्न करवाया गया। आयोजन समिति के सदस्य दिलीप कुमार झा ने बताया कि हिंदू जागरण मंच के साथ ही सेवा भारती एवं अन्य सामाजिक संगठनों के सहयोग से यह वैवाहिक कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
इस विवाह में सभी आयु वर्ग के दूल्हा दुलहन शामिल हुए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सैकत विश्वास की अगुवाई में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में आसपास के करीब 30 चाय बागानों के 4000 के आसपास लोग शामिल हुए। रंगापारा के विधायक तथा असम सरकार के श्रम कल्याण मंत्री पल्लव लोचन दास भी इस विवाह में शामिल हुए। विवाह समारोह में 400 जोड़े दूल्हा-दुलहन की शादी करवाने के लिए राज्य के विभिन्न हिस्से से धर्माचार्य पहुंचे। हर जोड़े की शादी वैदिक विधि-विधान से अलग-अलग पुरोहितों द्वारा करवाई गई। शादी के बाद इन्हें घर बसाने के लिए कुछ छोटे-मोटे सामान भी दिए गए। इन सभी जोड़ों को मैरिज सर्टिफिकेट भी दिलाये जाएंगे। इसके लिए बीते चार अक्टूबर से ही फार्म, फोटो आदि जमा करवाए गए थे। 10 जनवरी को इन लोगों के विवाह हेतु रजिस्ट्रेशन का कार्य संपन्न किया गया था। इस विवाह को सिर्फ दांपत्य जीवन की शुरुआत ही नहीं कही जा सकती है, बल्कि कई दशक पहले शुरू हुए वैवाहिक जीवन को सामाजिक मान्यता दी गई है।

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