खुद से संघर्ष करता यहूदी समाज

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हूदी हजारों साल से भारत में रहते आ रहे हैं। हमें कभी यहां के लोगों के जुल्मों का सामना नहीं करना पड़ा। हम खुद को सबसे पहले भारतीय कहेंगे। भारत हमारी मातृभूमि है तो इजरायल पितृभूमि। एजरा मोजेज ने ठीक साल भर पहले यह बात कही थी।

एजरा मोजेज भारतीय यहूदी संघ के मानद सचिव रहे हैं। कहा जाता है कि 2000 साल पहले येरुशलम में सेकंड टेंपल के तबाह होने के बाद यहूदी समुदाय के लोग भारतीय समुद्र तटों पर आए थे।

दरअसल, वे लोग एक मुश्किल घड़ी में इजराइल से निकलकर अलग-अलग दिशाओं में चले गए थे। उनमें एक समुद्री जहाज महाराष्ट्र के समुद्र तट पर स्थित नौगांव में आकर लगा। नौगांव में अब भी एक स्मारक है, जो उस घटना की याद दिलाता है।

इस समुदाय की पहचान ‘बेने इजराइली’ के तौर है। वैसे यह माना जाता है कि कोच्चीनी और बगदादी यहूदी बाद में भारत आए थे। कोच्चीनी यहूदी समुदाय के पुराने से पुराने दस्तावेजों पर 1000 सीई (एक व्यापारिक घोषणापत्र) की तारीख दर्ज है। 2005 में इजराइल ने मिजोरम और मणिपुर में खोई हुई जनजाति ‘ब्नेई मेनाशे’ की मौजूदगी को स्वीकारा। उसे इजराइली वापसी कानून के मुताबिक उनके आप्रवास को मंजूरी दी।

इसी तरह आंध्र प्रदेश में तमिल बोलने वाला यहूदियों का छोटा-सा समुदाय है। वह खोई हुई जनजाति ‘बेने एफराइम’ होने का दावा करता है।

भारत में यहूदी समुदाय की संख्या दिनों-दिन कम हुई है। अब उन्हें अपनी
विरासत और संस्कृति को बचाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

एक समय यहूदी भारत के महाराष्ट्र, गुजरात, कोलकाता, मिजोरम, मणिपुर, कोच्चि में थे। 1950 के दशक में तो यहूदियों की संख्या 40,000 थी। अब वे महज 5000 के आस-पास हैं। यहूदी इबादतगाहों और विभिन्न संगठनों ने एक सूची तैयार कर इस संख्या का अनुमान लगाया है।

वे उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें भारत सरकार अल्पसंख्यक का दर्जा देगी। यहूदी समुदाय के प्रतिनिधि कहते हैं, ”भारत की आजादी के वक्त हमारे समुदाय के अगुआ मानते थे कि हम पिछड़ा वर्ग नहीं हैं, सो हमें विशेष दर्जे की जरूरत नहीं है। लेकिन, अब अनुभव आ रहा है कि यह दर्जा हासिल करना बेहद जरूरी है।”

उनका तर्क है कि इससे अपनी धार्मिक इमारतों और कब्रिस्तानों के रख-रखाव में मदद मिलेगी। अपने स्कूलों के लिए सरकारी सहायता हासिल कर सकेंगे।

स्मरण होगा कि अप्रैल 2016 में केंद्र में अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्लाह ने घोषणा की थी कि- सरकार 5000 सदस्यों के इस समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने पर विचार कर रही है। पिछले  पखवाड़े हुई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजराइल यात्रा से इस समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने की उम्मीद बढ़ गई हैं।

 

यहूदी खुद को ईश्वर के ‘चुने हुए लोग’ मानते हैं, इसलिए वे केवल अंतरधार्मिक शादी को बढ़ावा देते रहे हैं। इससे भारतीय समाज ने कभी धर्मांतरण का खतरा महसूस नहीं किया। दूसरी तरफ अधिकतर भारतीय यहूदी धर्म की बुनियादी बातों से नावाकिफ रहे हैं।

मुंबई में रहने वाले यहूदी समुदाय के नथानियल झिराद ने अपने अनुभव को साझा करते हुए एक पत्रिका से कहा था- ”बहुत-से लोग सोचते हैं कि हम जीसस की इबादत करते हैं। वे मुझे क्रिसमस पर शुभकामना देते हैं, जबकि दोनों धर्म बिल्कुल जुदा हैं।”

मुंबई के इतिहास में यहूदियों का खास योगदान रहा है। बगदाद के पाशा के मुख्य खजांची डेविड ससून, दाउद पाशा के अत्याचार की वजह से 1832 में मुंबई आ गए थे। मुंबई में ससून डॉक्स, ससून लायब्रेरी, स्कूल और विक्टोरिया एंड अलबर्ट म्यूजियम ससून परिवार की ही देन है।

भारत में इन दिनों यहूदी समुदाय के पांच हजार लोग हैं, जबकि
1950 के दशक में यहां यहूदियों की आबादी 40,000 थी। इजराइल
बनने केबाद बड़ी संख्या में वे इजराइल चले गए थे।

कोलकाता भी यहूदियों का बड़ा केंद्र रहा है। शहर के बीचों-बीच ‘ज्यूइश गर्ल्स स्कूल’ है। वैसे इस स्कूल में पढ़ने वाले अब ज्यादातर बच्चे मुसलमान हैं। कहते हैं कि कोलकाता आने वाले पहले यहूदी शालोम कोहेन थे। वे 1798 में सीरिया से यहां आए थे। उनकी आर्थिक सफलता ने दूसरे यहूदी लोगों को भी यहां आने के लिए प्रेरित किया।

दूसरे विश्व युद्ध के आते-आते यहां पांच हजार से भी ज्यादा लोग रहने लगे थे, लेकिन अब यहां 25 से भी कम यहूदी रह गए हैं, जो कोलकाता शहर को अपना घर मानते हैं। जाइल सिलिमन कोलकाता के यहूदियों के इतिहास को रिकॉर्ड कर उनका डिजिटल आर्काइव तैयार कर रही हैं। वे स्वयं यहूदी समुदाय की हैं।

कोलकाता में यहूदियों का एक उपासनागृह है- दी मैगन डेविड। इसका निर्माण 1880 में कराया गया था। कहा जाता है कि यह यहूदियों का एशिया का सबसे बड़ा उपासनागृह रहा है।

यह उपासनागृह एक समय कोलकाता के विविधता भरे यहूदी समाज की जिंदगी का एक प्रमुख हिस्सा हुआ करता था, अब खाली पड़ा हुआ है। आस-पास के लोग समझते हैं कि यह एक चर्च है। राहुल टंडन ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि इस यहूदी उपासना स्थल की देखभाल राबुल खान नाम के मुसलमान का परिवार कर रहा है।

इन दिनों यहूदी समुदाय का छोटा-छोटा समूह देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहा है। वह अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है।

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