आस्था और अंतस

यदि किसी मंदिर की किसी परंपरा में कोई विशेष प्रावधान है, जिसे वर्षों से श्रद्धालु मानते चले आ रहे हैं तो उसमें विभिन्न तर्कों और दलीलों के सहारे अतिक्रमण क्यों किया जाना चाहिये? हम एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र हैं और हर व्यक्ति को अपना धर्म अपने हिसाब से पालन करने की स्वतंत्रता है। किसी भी मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे में किसी को जबर्दस्ती भेजा नहीं जा सकता। लेकिन उस धर्म या पंथ की परंपराओं और मान्यताओं के आधार पर यदि कोई बात वर्ज्य है तो उसे उसी रूप में स्वीकारना ही उचित है। यहां प्रश्न कानून का नहीं, आस्था का है।

न दिनों सबरीमाला के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जिस तरह से बहस और राजनीति हो रही है उसे लेकर दिल दुखता है। आस्था को हम किस तरह की बहस में उलझा रहे हैं? यदि किसी मंदिर की किसी परंपरा में कोई विशेष प्रावधान है, जिसे वर्षों से श्रद्धालु मानते चले आ रहे हैं तो उसमें विभिन्न तर्कों और दलीलों के सहारे अतिक्रमण क्यों किया जाना चाहिये? हम एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र हैं और हर व्यक्ति को अपना धर्म अपने हिसाब से पालन करने की स्वतंत्रता है। किसी भी मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे में किसी को जबर्दस्ती भेजा नहीं जा सकता। लेकिन उस धर्म या पंथ की परंपराओं  और मान्यताओं के आधार पर यदि कोई बात वर्ज्य है तो उसे उसी रूप में स्वीकारना ही उचित है। यहां प्रश्न कानून का नहीं, भावना का है। यदि हमारा मन उस स्थान की मूल भावना को ही स्वीकार करने को तैयार नहीं है तो वहां हमारा जाना ही क्यों जरूरी है? कई धार्मिक स्थल ऐसे हैं जहां सिर ढंक कर जाना होता है। कई ऐसे हैं जहां चमड़े का सामान वर्ज्य है। कहीं-कहीं खुले बदन भी जाना होता है। जिनकी आस्था होती है वे उस नियम का पालन कर वहां जाते हैं। हनुमान जी के ही कई मंदिर ऐसे हैं जहां माता बहनों का मूर्ति के पास जाना मना है। दर्शनों की मनाही नहीं है लेकिन मूर्ति के पास नहीं जा सकते हैं। अब इतनी सारी बातों को हर बार तर्क और कानून के दायरे में तो रखकर नहीं देखा जा सकता। सबरीमाला के मंदिर में एक निश्चित आयु की माता बहनों का जाना यदि परंपरा से वर्ज्य है तो उस परंपरा को तोड़कर या छलपूर्वक वहां जाकर या बलपूर्वक वहां जाने की अनुमति लेकर हम कौन सी बहादुरी का परिचय दे रहे हैं, पता नहीं। पता नहीं ऐसा करके हम कौन सी धार्मिक आस्था का प्रदर्शन कर रहे हैं।
आस्था को लेकर एक घटना याद आ गई। घटना श्रीनगर की है जहां हम दोनों नवम्बर के प्रथम सप्ताह में एक संक्षिप्त यात्रा के लिए गए थे। जब आप कहीं कम दिनों के लिए जाते हैं तो उसी सीमित समय में सारे दर्शनीय स्थल देख लेना चाहते हैं। वैसा ही कुछ हम भी कर रहे थे। जिस जगह हम रुके थे वहां से खीर भवानी माता का मंदिर नजदीक था। वैसे ये मंदिर श्रीनगर से 22 किलोमीटर है लेकिन जहां हम रुके थे (यूनिवर्सिटी के नजदीक) वहां से ये फासला चार पांच किलोमीटर कम था। लिहाजा ये सोचा गया कि अगले दिन पहले माता जी के दर्शन करेंगे और फिर बाकी स्थल देखेंगे।
खीर भवानी मंदिर बहुत सिद्ध स्थान माना गया है। महाराग्या देवी का उल्लेख शास्त्रों में है। इसकी एक कथा रावण से भी संबंधित है। कल्हण की राजतरंगिणी में भी इसका उल्लेख मिलता है। तूल मूल गांव जहां ये मंदिर स्थित है वहां का भी उल्लेख शास्त्रों में है। यहां एक कुंड है और भवानी माता का मंदिर भी। हिन्दू आस्था के महत्वपूर्ण प्रतीक इस मंदिर में कई श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं।
कश्मीर के हिन्दू तीर्थ स्थानों में खीर भवानी मंदिर का महत्व बहुत है। कश्मीर में पहले की जो सांस्कृतिक धरोहर बची हैं, उनमें भी यह मंदिर प्रमुख है। इस मंदिर और भवानी देवी के पौराणिक महत्व की कई कथायें हैं। कुछ वर्ष पहले इसकी भी हालत काफी खराब हो गई थी। लेकिन अब श्रद्धालुओं के प्रयास से और प्रशासन की मदद से इस मंदिर को पुन: अच्छे स्वरूप में देखा जा सकता है।
हम सुबह होटल से नाश्ता करके मंदिर दर्शन करने निकल पड़े। यही कोई दस-साढ़े दस बजे का समय था। मंदिर के पास पहुंचे तो वहां एक बड़ा सा लोहे का दरवाजा था। उस पर सीआरपीएफ के जवान सशस्त्र पहरा दे रहे थे। हम उलझन में थे कि मंदिर कहां है। हमारे ड्राइवर ने बताया, मंदिर अंदर है और वो जवान हमें अंदर जाने देंगे। पहले दिन हम शंकराचार्य मंदिर होकर आए थे इसलिए मंदिरों पर लगने वाली सुरक्षा व्यवस्था से हम वाकिफ थे। गेट के सुरक्षाकर्मी ने हमें अंदर जाने दिया। सुबह का समय था इसलिए इक्का दुक्का लोग ही थे। ज्यों ही गेट से घुसने लगे, मेरी पत्नी मालविका ने एक बोर्ड की तरफ इशारा किया, ‘मंदिर में मांस, मछली, अंडा खाकर प्रवेश करना मना है।’ संयोग से हमने उसी सुबह नाश्ते में अंडा खाया था। ‘हम लौट चलते हैं’ मालविका ने कहा। ‘अब कैसे वापिस जाएंगे। हम गेट से अंदर आ चुके हैं। अंदर के सुरक्षाकर्मी और बाहर के दुकानदार हमें देख रहे हैं। वापस जाना अच्छा नहीं होगा’ मैंने कहा। ‘सोचे लो’ मालविका बोली जरूर लेकिन तब तक हम गेट के अंदर आ चुके थे और सामने वाली चौकी पर एक और सुरक्षाकर्मी रजिस्टर लिए हमारी एंट्री करने के लिए तत्पर खड़ा था। मैंने रजिस्टर में प्रविष्टियां कीं। उस समय मेरे मन में ‘गोल माल है भाई सब गोल माल है’ गाना वैसे ही बजा जैसे ‘हेरा फेरी‘ फिल्म में सुनील शेट्टी के मन में बजता था। हम आगे बढ़े। गेट से मंदिर के द्वार का फासला करीब दो सौ मीटर होगा। उस बीच मैं मालविका को आस्था, मन की भावना ‘जो मन चंगा’ आदि दार्शनिक बातें बताता रहा ताकि उसके मन से अंडा बाहर निकल जाए (पेट से तो निकलने से रहा) और हम शुद्ध मन से दर्शन कर सकें। मैंने उससे ये भी कहा कि अंडा तो वैसे भी शाकाहारी ही माना जाता है। और ये भी कि हमारे अलावा और कौन जानता है यहां कि हमने अंडा खाया है। मालविका बोली, ‘ किसी को मालूम पड़े या न पड़े मगर हमें तो मालूम है। हम किसी और को बताने या दिखाने के लिए तो मंदिर नहीं जा रहे। हम जा रहे हैं क्योंकि हमारी श्रद्धा है।’ उसने कहा, लेकिन हम आगे बढ़ते रहे।

प्रश्न आस्था का है। आस्था भी वो जो कहीं से लादी न जाये बल्कि हमारे अंतस में उभरे। वर्ना तो जूते पहन कर भी मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे जाया जा सकता है। ये अंतस की आस्था ही तो है जो हमें ऐसा करने से रोकती है। ये अंतस की आस्था ही है जो हमें मस्जिद या गुरुद्वारे में सिर ढंकने को प्रेरित करती है।

ज्यों ही हम मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे और जूते उतार कर अंदर जाने लगे, मालविका ने फिर एक बोर्ड की तरफ इशारा किया। इस बार वही बात और बड़े अक्षरों में लिखी थी। मैं जूते उतार कर सीढ़ी चढ़ ही रहा था। फिर वही गोल माल की धुन मल में गूंजने लगी। मालविका ने हाथ पकड़ लिया और कहा ‘नहीं हम अंदर नहीं जाएंगे।’ मैं इस बार उसका विरोध नहीं कर पाया और बाहर आ गया। अब हम दोनों मंदिर की देहरी पर जूते उतारे, हाथ में प्रसाद लिए खड़े थे। लेकिन अंदर नहीं जा रहे थे। वहीं पास खड़ा कार्यकर्तानुमा पुजारी ये सब देख रहा था। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने हार कर कहा ‘जाओ जाओ, अंदर जाओ। यहां क्यों खड़े हो मंदिर तो अंदर है।’ तब हमने उसे अपनी परिस्थिति समझाई और हमारी तरफ से प्रसाद चढ़ाने का आग्रह भी किया। उसने हामी भरी, साथ ही सुझाव दिया कि हम मंदिर के पीछे की तरफ से आ जाएं तो हमें प्रसाद भी मिल जाएगा और खीर भी।

मुझे लगता है जब भी हम भक्ति की बात करते हैं ईमानदारी उसकी पहली शर्त होती है। और अगर मन में सही भाव ही नहीं है तो किसी भी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च या किसी भी धार्मिक स्थानों में जाने का कोई अर्थ नहीं है।

मंदिर का प्रांगण बड़ा था। हम चक्कर लगा कर पीछे की ओर जाने लगे। आधे रास्ते पहुंचे होंगे कि प्रसाद बेचने वाले की एक और दुकान मिल गयी। दुकानदार हम से प्रसाद खरीदने का आग्रह करने लगा साथ ही बताने लगा कि हम गलत जगह से जा रहे हैं मुख्य द्वार तो पीछे छूट गया है। मजबूरन हमें उसे भी अपनी कहानी बतानी पड़ी। मैंने उसे यथासंभव संक्षिप्त किया ताकि हमारी बेवकूफी और उजागर न हो। तब तक वो कार्यकर्ता जिसे हमने प्रसाद दिया था वो प्रसाद चढ़ा कर पीछे के द्वार पर पहुंच चुका था और खीर का दोना लिए हमारा इंतजार कर रहा था। उसने हमें देखा और दूर से इशारा किया। लेकिन तब तक उस दुकानदार ने एक और लॉजिक दिया कि ‘यदि आपने अंडा खा लिया है तो आपको आज खीर प्रसाद नहीं खाना चाहिए।’ इतना ही नहीं, उसने चिल्ला कर उस कार्यकर्ता को कश्मीरी में बता भी दिया। उसका पूरा वाक्य तो याद नहीं पर इतना जरूर याद है कि उसने उसमें दो तीन बार ‘ठूल’ शब्द का प्रयोग किया। बाद में मालूम पड़ा कि ठूल यानी अंडा होता है। उसके चिल्लाने का परिणाम ये हुआ कि जो बात अभी हमारे अलावा दो तीन को ही मालूम थी अब सबको पता चल गई। अब सब हमारी ओर आश्चर्य और सहानुभूति से देख रहे थे। अपनी बेवकूफी का सार्वजनिक होना भला किसे अच्छा लगेगा। हमें लगा अब और देर वहां रुकना ठीक नहीं। ये भी सोचा कि मां को हमें दोबारा बुलाना होगा, इसलिए अभी दर्शन नहीं दिए। किसी तरह हमारा चढ़ाया प्रसाद लिया चढ़ावे की रसीद प्राप्त की और बाहर निकलने की राह पकड़ी।
हम वापस लौट रहे थे। वो लोग जिन्होंने हमारा संभाषण और विशेष रूप से ‘ठूल’ शब्द सुना था, हमें अजीब तरह से देख रहे थे। कम से कम हमें ऐसा लगा कि वो हमें अजीब तरीके से देख रहे हैं। मालविका ने तो इसकी अजीबोगरीब तुलना भी कर डाली, बोली, ‘ऐसा लग रहा है, मानो कोई महिला, अचानक अपनी माहवारी के कारण से मंदिर न जा पा रही हो, और सबको मालूम पड़ जाये।’ मैंने कहा भी ‘तो इसमें क्या है। कम से कम हम अपने आप से बेईमानी तो नहीं कर रहे हैं।’
इसी बात पर मुझे कुछ दिन पूर्व दुर्गा पूजा के समय प्रसारित दो विज्ञापन याद आ गये। एक तो व्हाट्््सएप्प पर था और दूसरा देश के सबसे प्रगतिशील कहे जा सकने वाले अंग्रेजी समाचार पत्र में। व्हाट्सएप्प वाले पोस्टर में एक सेनिट्री नेपकिन पर पूजा के फूल और कुंकुम चंदन अक्षत आदि चढ़ाया हुआ था और नीचे लिखा था ‘मैं तो माहवारी के दिनों मे भी पूजा के पंडाल में जाऊंगी। देखेंगे किसे पता लगता है और कौन मुझे रोकता है।’

 

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