देखेंगे पहली बार…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रयाग अर्द्धकुंभ प्रारम्भ होने के पहले प्रयागराज पहुंचे। उन्होंने संगम तट के निकट अरैल के नजदीक बने उस स्थल पर पूजा-अर्चना की, जहां कुछ दिन पहले ही 71 देशों के प्रतिनिधियों ने अपने राष्ट्रध्वज स्थापित किए हैं। इस जगह को ‘संगम सेल्फी प्वाइंट’ भी कहा जाने लगा है। सच तो यह है कि प्रयाग कुंभ के लिए विदेशी नागरिकों में उत्सुकता पहले भी रही है। बाहर के देशों से बहुत से लोग पर्यटन के नजरिए से इस कुंभ में आये, तो कुछ ने धर्म के जरिए दुनिया के इस सबसे बड़े समरसतामूलक आयोजन पर शोध कार्य सम्पन्न किए। उनके रिसर्च में यहां तक विचार हुआ है कि एक खास साल- महीने-तिथि और समय विशेष पर गंगा-यमुना और अंत:सलिला सरस्वती के जल में आखिर क्या विशेष खगोलीय असर पैदा हो जाता है। इस पर भी शोध हुआ कि इस खगोलीय घटना की जानकारी देश के सुदूर हिस्सों में बैठे लोगों को किस तरह हुआ करती है। यह उन्हीं शोध का नतीजा है कि इसी साल संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन, यानी यूनेस्को ने प्रयाग कुंभ को भारत की अमूर्त धरोहर घोषित किया है।

दुनियाभर में इन शोध के हवाले और स्वयं कुंभ की अपनी अतुलनीय परंपरा का हवाला देकर ही देश की सरकार ने इस आयोजन को यूनेस्को की सूची में शामिल कराने में सफलता हासिल की है। अब ऐसी जगह पर पहली बार आधिकारिक रूप से दुनिया के एक बड़े हिस्से वाले देशों की सरकारें अपनी मौजूदगी दिखा रही हैं, तो यह चर्चा का बड़ा बिंदु होगा ही। इतने अधिक देशों के राजदूत अथवा दूसरे अधिकारियों ने प्रयाग कुंभ क्षेत्र में अपने ध्वज लगाये तो इसकी अनुगूंज उनके देशों में भी हुई। इन देशों के लोगों में भी कुंभ के प्रति उत्सुकता जगी है। उम्मीद है कि इसके चलते इस बार कुछ अधिक ही विदेशी नागरिक भारत के इस अद्भुत और अविस्मरणीय अवसर को अंगीभूत करना चाहेंगे।

चर्चा के भी पंख हुआ करते हैं। चर्चा तो यह भी है कि प्रदेश सरकार जिसे कुंभ के रूप में आयोजित कर रही है, प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उसे अर्द्धकुंभ ही कहा। यह पहली बार हो रहा है कि उत्तर प्रदेश के संत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुताबिक हिन्दू धर्म की अवधाराणाओं में कहीं भी आधे की परिकल्पना नहीं है, इस आधार पर राज्य सरकार ने इसे कुंभ की ही संज्ञा दी है। चर्चा यह भी है कि 15 जनवरी से 04 फरवरी तक के प्रमुख स्रान और 04 मार्च तक चलने वाले कुंभ के बाद ही लोकसभा चुनाव होने हैं। इसीलिए केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारें इस आयोजन को और अधिक भव्य बनाने में लगी हैं। ऐसे में यह भी देखना चाहिए कि चुनाव और कुंभ-अर्द्धकुंभ निश्चित समय पर ही हुआ करते हैं। कुंभ और चुनाव का संयोग पहले भी हुआ है। पहली बार तो यह हुआ है कि दुनिया ने चुनी हुई सरकारों के जरिए कुंभ में भागीदारी की इच्छा जतायी है।

सबसे बड़ी बात यह भी कि जिस मोक्षदायी अक्षयवट का लोग नाम सुना करते थे, पहली बार उसे साक्षात देख सकेंगे। सम्राट अकबर के बनाये किले की परिधि में पहुंच गये अक्षयवट का दर्शन बाद में भी सर्वजन-सुलभ नहीं हो पाता था क्योंकि आजादी के बाद इस किले में सेना का अति संवेदनशील आयुध भंडार मौजूद है। हां, लोगों की इसके प्रति अक्षय-आस्था को देखते हुए किले के ही एक हिस्से में इस वटवृक्ष की शाखाओं के दर्शन कराए जाते रहे। कुंभ के सेल्फी प्वाइंट पर पूजन-पूर्व प्रधानमंत्री ने अक्षयवट के भी दर्शन किए। लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने अक्षयवट को आम लोगों के लिए सुलभ होने की जानकारी दी। इस वटवृक्ष के बारे में उन्होंने जो कुछ कहा, शायद उनके मन में ये भाव उमड़ रहे थे-

करारविन्देनपदारविन्दं
मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्यपत्रस्यपुटे शयानं,
बालमुकुंदं शिरसा स्मरामि॥

भाव यह है कि प्रलय के बाद भी अक्षयवट के पत्ते पर लीलामय कृष्ण के दर्शन बाल-रूप में होते हैं। असल में लीला-तत्व को ही दर्शन और व्यवहार दोनों का बल मिला है। आम तौर पर हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों ने लीला-तत्व के साथ लय-प्रलय को आनंदप्रद माना है। कुंभ तो आस्था का केंद्र रहा ही है। आस्था के इस केंद्र में पहली बार हर इच्छुक व्यक्ति ऐसे महिमामय अक्षयवट के भी दर्शन कर सकेगा।

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