ताकि न टूटे सब्र का बांध

जय श्रीराम की ऐसी हुंकार 1992 के बाद पहली बार सुनने को मिली। जिसने सुनी, उसने कहा, ‘राम की लीला है अपरंपार।’ दिल्ली के रामलीला मैदान में उमड़ी रामभक्तों की भीड़ भी अपरंपार ही लगती थी। वही जोश, वही जुनून, वही उत्साह, वही नारे, जो नब्बे के दशक में अयोध्या से लेकर देशभर में गूंजे थे। 9 दिसम्बर को रामलीला मैदान में आयोजित विश्व हिंदू परिषद की विराट धर्मसभा ने वहां अब तक आयोजित सभाओं और रैलियों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। इसी के साथ यह भ्रांति भी ध्वस्त हो गयी कि लोगों में राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण की आकांक्षा क्षीण होने लगी है। यह भी कि नई पीढ़ी को अब मंदिर-मस्जिद के झगड़े या मंदिर के निर्माण से कोई लेना-देना नहीं है। रामलीला मैदान में उमड़े बड़ी संख्या में युवा रामभक्तों की हुंकार का संदेश साफ था- बाधाएं सब दूर करो, मंदिर का निर्माण करो। रामभक्तों की सरकार से यह अपेक्षा की भी जानी चाहिए। विशाल मंच पर जुटे संतों- महंतों-धर्माचार्यों और हिन्दू संगठनों के नेताओं ने इस बात को दोहराया भी। याद दिलाया कि आज आप जहां पहुंचे हैं, वह सब रामजी का प्रसाद है। तब नारा लगता था- जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा। हिन्दू हितों की बात करने वाले राज करने लगे।

अब अपेक्षा दूसरी है। जो हिन्दू हित में काज करेगा, वही…। राज-काज का सीधा नाता है। यही याद दिलाने के लिए दिल्ली, उससे सटे हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में जन जागरण कर दिल्ली चलो का आह्वान किया गया था। इस छोटे से दायरे से इतनी बड़ी संख्या में
लोग रामलीला मैदान की ओर बढ़ चले, जितने 1992 की कारसेवा के समय भी अयोध्या नहीं पहुंचे थे। हालात ये थे कि जितने लोग मैदान के भीतर थे उससे दोगुने बाहर। चारों तरफ ‘जय श्रीराम’ की गूंज और भगवा रंग से पटी सड़कें।

  • दिल्ली के रामलीला मैदान में विराट धर्म सभा का आयोजन 11 बजे से होना था पर लोग सुबह से ही पहुंचने लगे थे और 11 बजे से पहले ही मैदान भर गया।
  • आसपास के जिलों से बसों से लोग आए तो दिल्ली की सीमा पर भोजन के पैकेट देकर उनका स्वागत किया गया।
  • इस विराट धर्म सभा की अध्यक्षता साधु-संतों के सबसे बड़े जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि महाराज ने की। उन्होंने मंदिर निर्माण के लिए सर्वस्व समर्पण का एक बार फिर संकल्प दोहरवाया।
  • अयोध्या आंदोलन की सबसे सशक्त आवाज साध्वी ऋतंभरा में 1990 के दशक वाला तेज दिखा और उनका भाषण सुनकर लोगों में जोश देखने को मिला।
  • मंच से जितना जोश पैदा किया जा रहा था, उससे ज्यादा जोश मैदान के बाहर पहले ही सड़कों पर दिख रहा था।
  • ढोल-मंजीरे के साथ नाचते गाते लोग। कोई हनुमानजी का भेष धरे तो कोई त्रिशूल और गदा लिए- झलक अयोध्या आंदोलन वाली।
  • पापियों के नाश को ..रामजी की सेना चली गीत फिर सड़कों पर गूंज रहा था।
  • सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम थे लेकिन आए हुए रामभक्त स्वयं भी नियंत्रण में दिखे। इतनी बड़ी संख्या जुटी और चली गई, कहीं कोई अव्यवस्था नहीं हुई।

खुफिया एजेंसियां भी संख्या ढाई लाख से ऊपर आंक रही थीं तो उमड़े जन सैलाब से अभिभूत आयोजक चार लाख का दावा कर रहे थे। संतों ने कहा ‘सोचिए सारे देश का आह्वान किया गया तो क्या होगा।’ मंच से संतों और नेताओं ने राम मंदिर पर निर्णय न होने की स्थिति में चेताया, वक्त भी दिया। वक्त दोनों के पास कम है। सरकार को चुनावों में जाना है तो संतों को उनके आह्वान पर सड़कों पर उतर पड़ी जनता को जवाब देना है। सवाल है कि रामभक्तों की सरकार ने राम मंदिर के लिए क्या किया? इसलिए मांग है कि सरकार या तो संसद के शीतकालीन सत्र में कानून लाए, उस पर बहस कराए। या फिर सत्र समापन के बाद अध्यादेश लाए।


जो लोग आज सत्ता में बैठे हैं, वे हमारी भावनाओं से परिचित हैं। उनका भी घोषित संकल्प है कि जहां राम का जन्म हुआ था, मंदिर वहीं बनाएंगे। अब संकल्प पूर्ति का समय आ गया है। बिना किसी झिझक के, बिना किसी संकोच के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए आगे बढ़ें। हम भीख नहीं मांग रहे हैं। अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं। जो सत्ता में हमारे बंधु बैठे हैं, वह इस बात को समझकर सकारात्मक पहल करेंगे। ऐसा हमारा विश्वास है।


भैयाजी जोशी, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ्

अन्यथा 31 जनवरी और 1 फरवरी, 2019 को प्रयागराज में होने वाली धर्म संसद में संत कठोर निर्णय लेने को मजबूर होंगे। जगतगुरु रामानंदाचार्य स्वामी हंसदेवाचार्य ने चेतावनी देते हुए कुछ राहत भी दी। कहा कि हमने तुम्हें राम मंदिर बनाने के लिए सत्ता में बैठाया है। जब तक यह काम पूरा नहीं करोगे, सत्ता से उतरने भी नहीं देंगे। यह मोदी-योगी सरकार के लिए कुछ राहत की बात हो सकती है। इसमें यह भी संदेश छिपा है कि मंदिर निर्माण की कुछ बाधाएं दूर करो तो रामभक्त तुम्हें दोबारा सत्ता में देखना चाहेंगे। दरअसल रामभक्तों को सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत निराश किया है। नियमित सुनवाई की आशा और जल्द न्याय पाने की अभिलाषा के बीच बदले हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मात्र 3 मिनट में कह दिया कि राम मंदिर प्रकरण प्राथमिकता में नहीं है।

मंच से सवाल पूछे गए कि जो न्यायालय एक आतंकवादी को फांसी के मामले में आधी रात को खुल सकता है। किसी राज्यपाल के फैसले पर सारी रात सुनवाई कर सकता है। उसकी प्राथमिकता में पिछले साढ़े चार दशक से लंबित ऐसा ज्वलंत मामला क्यों नहीं है जिसने समाज से लेकर सत्ता प्रतिष्ठान तक को झकझोर कर रख दिया है। न्यायालय के इस रुख से निराश लोगों को अब मोदी-योगी की सरकार से ही आशा है। ऐसे में संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी के संदेश का खासा महत्व है। रामलीला मैदान से कहा कि जो लोग आज सत्ता में बैठे हैं, वे हमारी भावनाओं से परिचित हैं। इतना ही नहीं बल्कि उनका भी घोषित संकल्प है कि जहां राम का जन्म हुआ था, मंदिर वहीं बनाएंगे। उन्होंने सरकार से आह्वान किया- अब संकल्प पूर्ति का समय आ गया है।

बिना किसी झिझक के, बिना किसी संकोच के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए। संघ का संदेश इससे भी कड़ा है। सरकार को कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का निवेदन करने के बाद भैयाजी कहा, ‘हम भीख नहीं मांग रहे हैं। हम अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं। उन भावनाओं का सम्मान करना, जनभावनाओं की अपेक्षा की पूर्ति करना, सत्ता की इसमें बड़ी भूमिका होती है। आज जो सत्ता में हमारे बंधु बैठे हैं, वह इस बात को समझकर सकारात्मक पहल करेंगे। ऐसा हमारा विश्वास है।’ सरकार के सामने संतों, रामभक्तों और संघ के इस विश्वास पर खरा उतरने का अवसर भी है, और चुनौती भी।

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