जनभावनाओं को समझें सरकार और सुप्रीम कोर्ट

0
44

विश्व के कोने-कोने में फैले 125 करोड़ हिंदू उच्चतम न्यायालय के रवैये से मर्माहत हैं। 29 अक्टूबर (2018) को राम मंदिर मामले पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि हमारी प्राथमिकता में और बहुत सारे मुकदमें हैं अर्थात यह मुकदमा उनकी प्राथमिकता में नहीं है। ऐसा कहकर जनवरी, 2019 तक के लिए मुकदमे को टाल दिया गया। गत 8 वर्षों से यह मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित है। इससे जनता में आक्रोश बढ़ना स्वाभाविक है। मुस्लिम पक्ष तो शुरू से मुद्दे को भटका रहा है। मुस्लिमों का कथन है कि विवादित ढांचा सरयू नदी के तट पर खाली पड़ी बंजर भूमि पर बनाया गया। कोई मन्दिर नहीं तोड़ा गया। मुस्लिमों ने दिसम्बर 1961 में अपना वाद दायर कर के अदालत से मांग की थी कि विवादित ढांचे को सार्वजनिक मस्जिद घोषित किया जाए। तब मुस्लिम नेताओं ने सरकार को वचन दिया था कि ‘…यदि यह सिद्ध हो जाए कि मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई तो वे स्वेच्छा से इस विवादित स्थल को हिन्दुओं को सौंप देंगे…।’

यदि भगवान राम का यह मुकदमा इसी प्रकार टाला जाएगा तो समाज में आक्रोश बढ़ेगा। इस आक्रोश का अनुभव करना चाहिए। अदालतों में जनता न्याय मांगने के लिए जाती है। न्याय जल्दी होना ही चाहिए। हम फिर से अदालत से आग्रह करते हैं कि इस मुकदमे को प्राथमिकता से सुने, प्रतिदिन सुने और जल्दी से जल्दी अपना अंतिम निर्णय घोषित करे।

…7 जनवरी, 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रश्न भेजकर उत्तर चाहा था कि ‘क्या अयोध्या में बाबरी मस्जिद जिस स्थान पर खड़ी थी, उस स्थान पर इसके निर्माण के पहले 1528 में (बाबर के आक्रमण के पहले) कोई हिन्दू धार्मिक भवन अथवा कोई हिन्दू मन्दिर था जिसे तोड़कर वह ढांचा खड़ा किया गया?….’ सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति द्वारा प्रश्न पूछने का कारण भारत सरकार से जानना चाहा था। तब भारत सरकार के सॉलिसीटर जनरल ने सितम्बर, 1994 में अपने शपथ- पत्र के साथ कहा था कि ‘यदि राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर सकारात्मक आता है अर्थात एक हिन्दू मन्दिर/भवन को तोड़कर विवादित भवन बनाया गया था तो भारत सरकार हिन्दू समाज की भावनाओं के अनुसार व्यवहार करेगी। यदि प्रश्न का उत्तर नकारात्मक आता है अर्थात कोई हिन्दू मन्दिर/भवन 1528 के पहले वहां था ही नहीं तो भारत सरकार का व्यवहार मुस्लिम समाज की भावनाओं के अनुसार होगा।’ राष्ट्रपति का यह प्रश्न ही सम्पूर्ण विवाद का केन्द्र बिन्दु है। इसका उत्तर मिलने पर ही सत्य उजागर होगा और सब समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। केवल इसी आधार पर विवादित स्थल के स्वामित्व का निर्णय सम्भव है।

 1992 में भी जनआक्रोश को नहीं समझा गया

1992 में जनता की भावनाओं को न्यायपालिका और सरकार ने समझने में देरी की। परिणामस्वरूप समाज का आक्रोश 6 दिसम्बर, 1992 को फूट पड़ा। ढांचे को गिरा दिया गया। ढांचा गिरने के बाद तथाकथित विवादित भूमि और उसके चारों ओर फैली हिन्दू समाज की 67 एकड़ जमीन भारत सरकार ने 7 जनवरी, 1993 को कानून बनाकर (अधिनियम 33/1993) अधिग्रहीत कर ली थी। इस अधिग्रहित 67 एकड़ भूमि में एक इंच भूमि भी किसी मुस्लिम की सम्पत्ति नहीं है। उस समय भी भगवान के दर्शन बन्द हो गए थे परन्तु उच्च न्यायालय के आदेश पर पुन: दर्शन प्रारंभ हुए। उपर्युक्त अधिग्रहण के खिलाफ 1993 में मुस्लिम समाज सर्वोच्च न्यायालय में गया और कहा कि मस्जिद की जगह का अधिग्रहण नहीं हो सकता। इसी निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति के प्रश्न का उत्तर देने से इनकार कर दिया था और राष्ट्रपति का प्रश्न सम्मानपूर्वक वापस कर दिया था। साथ ही साथ विवादित भूमि का अधिग्रहण भी रद कर दिया था तथा विवादित भूमि संबंधी सभी मुकदमों को पुन: प्रारम्भ करने का आदेश दिया था। यह भी कहा था कि भारत सरकार इस विवादित भूमि की यथास्थिति बनाये रखेगी। विवादित भूमि छोड़कर शेष सम्पूर्ण 67 एकड़ जमीन का भारत सरकार द्वारा किया गया अधिग्रहण सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया था। यह निर्णय अक्टूबर, 1994 में हुआ था।

राष्ट्रपति के प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अयोध्या में रामजन्म स्थान के पास जमीन के नीचे की फोटोग्राफी राडार तरंगों से करवाई। राडार फोटोग्रॉफी कनाडा के विशेषज्ञ ने की और उसने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि धरती के नीचे दूर-दूर तक एक भवन के अवशेष दिख रहे हैं। राडार फोटोग्राफी रिपोर्ट के तथ्यों को खोजने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व विभाग को सन 2003 में उत्खनन का आदेश दिया। उत्खनन में जमीन के नीचे एक विशाल भवन के अवशेष मिल गए। रिपोर्ट में लिखा गया कि यहां उत्तर भारतीय शैली का एक हिन्दू मन्दिर था। इन्हीं वैज्ञानिक रिपोर्टों के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने 30 सितम्बर, 2010 को घोषित अपने निर्णय में लिखा है-

1. विवादित ढांचा किसी पुराने भवन को विध्वंस करके उसी स्थान पर बनाया गया था। पुरातत्व विभाग ने यह सिद्ध किया है कि वह पुराना भवन कोई विशाल हिन्दू धार्मिक स्थल था …। (न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

2. विवादित ढांचा बाबर द्वारा बनाया गया था … यह इस्लाम के नियमों के विरुद्ध बना, इसलिए यह मस्जिद का रूप नहीं ले सकता। (न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

3. तीन गुम्बदों वाला वह ढांचा किसी खाली पड़े बंजर स्थान पर नहीं बना था बल्कि अवैध रूप से एक हिन्दू मन्दिर/पूजा स्थल पर खड़ा किया गया था।

4. एक गैर इस्लामिक धार्मिक भवन अर्थात हिन्दू मन्दिर को गिराकर विवादित भवन का निर्माण कराया गया था। (न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल)

5. विवादित स्थल ही भगवान राम का जन्मस्थान है। जन्मभूमि स्वयं में देवता हैं और विधिक प्राणी हैं। जन्मभूमि का पूजन भी रामलला के समान ही देवता मानकर होता रहा है और देवत्व का यह भाव शाश्वत है, यह सर्वत्र रहता है, हर समय रहता है। यह भाव किसी भी व्यक्ति को किसी भी रूप में भक्त की भावनाओं के अनुसार प्रेरणा प्रदान करता है। देवत्व का यह भाव निराकार में भी हो सकता है। (न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

6. हिन्दुओं की श्रद्धा व विश्वास के अनुसार विवादित भवन के मध्य गुम्बद के नीचे का भाग भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है…..। (न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल)

7. यह घोषणा की जाती है कि आज अस्थायी मन्दिर में जिस स्थान पर रामलला का विग्रह विराजमान हैं, वह स्थान हिन्दुओं को दिया जाएगा …। (न्यायमूर्ति एसयू खान)

8. न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने निर्मोही अखाड़ा द्वारा वर्ष 1959, तथा सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड द्वारा दिसम्बर, 1961 में दायर किए गए मुकदमों को निरस्त कर दिया और निर्णय दिया कि ‘निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड को कोई राहत नहीं दी जा सकती।’

9. इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार जोर-जबरदस्ती से प्राप्त की गई भूमि पर पढ़ी गई नमाज अल्लाह स्वीकर नहीं करते हैं और न ही ऐसी सम्पत्ति अल्लाह को समर्पित (वक्फ) की जा सकती है। किसी मन्दिर का विध्वंस करके उसके स्थान पर मस्जिद के निर्माण करने की अनुमति कुरआन व इस्लाम की मान्यताएं नहीं देती। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कुरआन व इस्लाम की मान्यताओं का उल्लेख करते हुए यह लिखा कि विजेता बाबर को भी विवादित भवन को मस्जिद के रूप में अल्लाह को समर्पित (वक्फ) करने का अधिकार नहीं था। तीन गुम्बदों वाला ढांचा इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार वैधानिक नहीं था।

10. एक ओर तो न्यायालय ने निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के मुकदमें निरस्त कर दिए और लिखा कि दोनों को कोई राहत नहीं दी जा सकती। फिर भी न्यायमूर्ति एसयू खान व न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल द्वारा विवादित परिसर का तीन हिस्सों में विभाजन कर दिया गया, अर्थात भगवान रामलला, निर्मोही अखाड़ा तथा सुन्नी वक्फ बोर्ड तीनों ही विवादित परिसर का 1/3 भाग प्राप्त करेंगे। मेरी मान्यता है कि यह मुकदमा सम्पत्ति के बंटबारे का नहीं था। निर्मोही अखाड़ा अथवा सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड अथवा रामलला विराजमान तीनों में से किसी ने भी परिसर के बंटवारे की मांग नहीं की थी। उसी के खिलाफ सभी संबंधित पक्षों ने सर्वोच्च न्यायाल में याचिका दायर की। आठ साल हो गये, सर्वोच्च न्यायालय तारीख पर तारीख देता जा रहा है लिहाजा आक्रोश बढ़ रहा है। मेरा मानना है कि जनाक्रोश का अनुभव करके केन्द्र सरकार को कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हिन्दू समाज के धैर्य की परीक्षा बार-बार न ली जाए। आखिरकार इस मुकदमे को चलते-चलते 68 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। एक पीढ़ी न्याय की आस लिए दुनिया को छोड़कर चली गई। प्रयागराज में कुंभ के अवसर 31 जनवरी एवं 1 फरवरी, 2019 को आयोजित धर्मसंसद में सन्त समाज अपना अगला कदम घोषित करेगा। हम श्रीराम जन्मभूमि को छोड़ नहीं सकते। भारत का राष्ट्रीय समाज अपेक्षा करता है कि यथाशीघ्र पहल करके श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण की सभी बाधाओं को संसद में कानून बनाकर दूर किया जाए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here