चर्च के भंवरजाल में दलित ईसाई

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भारत के सबसे बड़े कैथोलिक चर्च में ही दलित ईसाई उपेक्षित और अपमानित स्थिति में हैं। चर्च के विशाल साम्राज्य में दलित ईसाइयों की कितनी हिस्सेदारी है? कितने स्कूलों में ईसाई प्रिंसिपल और अध्यापक हैं? कितने कॉलजों में प्रोफसर या डीन हैं? कितने अस्पतालों में डाक्टर हैं? चर्च की कृपा से पढ़-लिखकर कितने दलित ईसाई उच्च पदों पर हैं? चर्च के नेतृत्व के पास इसका जवाब नहीं है।

अकैथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्चों ने देश के दलितों ईसाइयों की मुक्ति के लिए 11 नवम्बर को ‘दलित मुक्ति संडे’ मनाया। कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस आॅफ इंडिया और नेशनल काउंसिल फार चर्चेज इन इंडिया संगठनों को दलितों की दशा पर चिंता सताने लगी है। दोनों ही चर्च संगठन वेटिकन और जिनेवा स्थित वर्ल्ड काउंसिल ऑफ़ चर्चेज के दिशा-निर्देशों के तहत अपने कार्यों को विस्तार देते हैं। दिसंबर 2016 में कैथलिक चर्च ने अपनी ‘पॉलिसी ऑफ़ दलित इम्पावरन्मेंट इन द कैथलिक चर्च इन इंडिया’ रिपोर्ट में यह माना था कि चर्च में दलितों से छुआछूत और भेदभाव बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। इसे जल्द से जल्द खत्म किए जाने की जरूरत है।

दलित ईसाइयों को उम्मीद थी कि चर्च की स्वीकारोक्ति के बाद भारत का कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट नेतृत्व उनके विकास और सामाजिक जीवन की बेहतरी के लिए कुछ ठोस काम करेगा। लेकिन ‘दलित मुक्ति संडे’ के बहाने चर्च नेतृत्व ने अपना वही पुराना राग ‘धर्मांतरित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों’ की श्रेणी में शामिल करने की मांग उठाई है। ईसाइयत में 60 प्रतिशत से ज्यादा दलित ईसाई हैं, दलित ईसाई यानी हिंदू धर्म से ईसाइयत में आए लोग हैं। आजादी के बाद संविधान में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था। धर्म-आधारित आरक्षण की मनाही है। चर्च-नेतृत्व बड़ी चतुराई से धर्मांतरित ईसाइयों के विकास की बात करता है। उन्हें हिंदू दलितों से जोड़ देता है। उनकी जड़ें और समस्या एक बताता है। यह सच है कि वे इन समुदायों की जातिवादी व्यवस्था से विद्रोह कर ईसाइयत में आए हैं, लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि उसके बाद उनका गैर-ईसाईद िलतों के साथ कोई खास रिश्ता नहीं रहा।

यहां तक कि उनकी पूजा-पद्धति, प्रतीक, रहन-सहन और जीवन जीने का ढंग सब बदल गया है। उनकी समस्याओं और तकलीफों को गैर-ईसाई दलितों के समान नहीं देखा जा सकता। दलित ईसाइयों को आज अनुसूचित जाति के ‘टैग’ की जरूरत नहीं है। जरूरत है उनके सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा और आर्थिक विकास की सुविधाएं उपलब्ध कराने की। उन्हें चर्च के संसाधनों पर बराबर का हक देने की। देख सकते हैं कि चर्च द्वारा संचालित संस्थानों में दलित ईसाइयों को महत्वपूर्ण स्थान कभी नहीं दिया गया। भारत के सबसे बड़े कैथोलिक चर्च में ही वे उपेक्षित व अपमानित स्थिति में हैं। सीबीसीआई और एनसीसीआई क्या यह बता सकते हैं कि चर्च के इस विशाल साम्राज्य में दलित ईसाइयों की कितनी हिस्सेदारी है। कितने स्कूलों में ईसाई प्रिंसिपल और अध्यापक हैं? कितने कॉलजों में प्रोफसर या डीन हैं? कितने अस्पतालों में डाक्टर हैं? शिक्षा का डंका बजाने वाले चर्च की कृपा से पढ़-लिखकर कितने उच्च पदों पर हैं? हजारों करोड़ के विदेशी अनुदान से गरीबों का उद्धार करने वाले चर्च के सामाजिक संगठनों में कितनो के निर्देशक दलित ईसाई हंै? आध्यात्मिक मामलों की ही बात करें तो दलित ईसाइयों की स्थिति बेहद दयनीय है। मौजूदा समय में भारत के कैथोलिक चर्च में 6 कार्डीनल हैं। इनमें कोई दलित ईसाई नही है। 30 आर्च बिशप हैं। इनमें कोई दलित ईसाई नही है। 175 बिशप हैं। इनमें केवल 9 दलित बिशप हैं। कैथोलिक चर्च में 822 मेजर सुप्रीरियर हैं। इनमें केवल 12 दलित ईसाई हंै। 25000 कैथोलिक पादरियों में केवल 1130 दलित ईसाई हंै। एक लाख नन में से केवल कुछ हजार धर्म बहनें ही दलित वर्ग से आती हैं। करीब एक दशक पूर्व दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज में चर्च नेतृत्व ने धूमधड़ाके के साथ दलित ईसाइयों को 40 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐलान किया था। इसे देखते हुए दिल्ली कैथोलिक आर्च डायसिस ने भी 30 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐलान किया था। सेंट स्टीफन कॉलेज ने दो साल के अंदर ही आरक्षण बंद कर दिया।

कैथोलिक ने कभी इसे लागू ही नहीं किया। चर्च के पूरे साम्राज्य पर मुट्ठीभर कलर्जी वर्ग का एकाधिकार बन गया है। कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश माइकल एफ सलदना के मुताबिक चर्चों के नीतिगत फैसले लेने में केवल 1.3 प्रतिशत कलर्जी वर्ग का दबाव है। 98.7 प्रतिशत लेइटी की कोई भूमिका ही नहीं है। पिछले छह दशकों में चर्च ने हजारों अरब रुपयों की संपत्तियों को बेच दिया है। वह पैसा कहां गया, इसकी समाज को कोई जानकारी नही है। भारत में हजारों ऐसे चर्च हैं जहां हर चर्च में प्रति वर्ष 2.5 मिलियन रुपये इकट्ठा होते हैं। चर्चों में इकट्ठा होने वाले इन अरबों रुपयों को गरीब ईसाइयों के विकास पर खर्च करने का कोई मॉडल ही नहीं है। वर्ष 2002 में देश की राजधानी दिल्ली में ‘पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट’ ने दलित ईसाइयों के विकास के लिए कैथोलिक बिशप काफ्रेंस आॅफ इंडिया एवं नेशनल काउंसिल चर्चेज फॉर इंडिया के सामने दस सूत्री मांग पत्र रखा था।

इसमें चर्च संस्थानों में समुदाय की भागीदारी, धर्म परिवर्तन पर रोक, विदेशी अनुदान में पारदर्शिता, बिशपों का चुनाव वेटिकन/पोप की जगह समुदाय द्वारा करने, चर्च संपत्तियों की रक्षा हेतु बोर्ड बनाने जैसे मुद्दे उठाये गये थे। इसे चर्च नेतृत्व ने अपनी कुटिलता से दबा दिया था। मूवमेंट के कार्यकर्ता ईसाई समाज में जन-चेतना फैलाने के अपने कार्य में लगे हैं। इसी का परिणाम है कि आज सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले रोमन कैथोलिक चर्च में भी आम ईसाइयों के अधिकारों की बात उठने लगी है। भारत का चर्च न तो चर्च संसाधनों पर अपनी पकड़ ढीली करना चाहता है और न ही वह वेटिकन और अन्य पश्चिमी देशों का मोह त्यागना चाहता है। विशाल संसाधनों से लैस चर्च अपने अनुयायियों की स्थिति से पल्ला झाड़ते हुए उन्हें सरकार की दया पर छोड़ना चाहता है। साल 2004 में कुछ चर्च संगठनों द्वारा दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली गई थी।

दिल्ली में इस बावत प्रदर्शन भी किए गए। सुनवाई के समय माननीय न्यायाधीशों ने सवाल किया था कि क्या ईसाइयत में भी जाति प्रथा होती है? सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल किया था कि क्या ईसाइयत इस तथ्य को स्वीकार करेगी जिसके आधार पर उन्हें भी अनुसूचित जातियों की तरह सूचीबद्ध किया जाए। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को भारत सरकार की तरफ मोड़ दिया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी ने कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट नेतृत्व के साथ मिलकर दलित ईसाइयों का जमकर शोषण किया है। कांग्रेसनीत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने अपने शासनकाल के बचे अंतिम कुछ दिनों में एक अध्यादेश लाकर लॉलीपॉप देने का काम जरूर किया था लेकिन उस समय के राष्ट्रपति ने उसे लौटा दिया था। भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए कोई नौसिखिया भी यह बता सकता है कि चर्च नेतृत्व अपने निजी लाभ और दलित ईसाइयों का ध्यान असली मुद्दों से हटाने और कांग्रेस को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के लिए आम चुनावों से पहले जोरदार कसरत कर रहा है।

भारतीय जनता पाटी शुरू से ही धर्म-आधारित आरक्षण के खिलाफ है। चर्च नेतृत्व ने दलित ईसाइयों को एक ऐसे भंवरजाल में फंसा लिया है जिसे भेद पाना उनके लिए आसान नहीं है। फिर भी राहत की बात यह है कि धीरे-धीरे दलित ईसाई इसे समझने लगे हैं। कुछ साल पहले दलित ईसाइयों के दक्षिण भारतीय एक समूह ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून के नाम एक ज्ञापन देकर आरोप लगाया था कि कैथोलिक चर्च और वेटिकन दलित ईसाइयों का उत्पीड़न कर रहे हैं। जातिवाद के नाम पर चर्च संस्थानों में दलित ईसाइयों के साथ लगातार भेदभाव किया जा रहा है। उन्हें चर्च में बराबर के अधिकार उपलबध कराएं जाएं, अगर वह ऐसा नहीं करते हंै तो संयुक्त राष्ट्र में वेटिकन को मिले स्थाई आर्ब्जवर के दर्जें को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

 

 

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