कुंभ में किन्नर अखाड़ा भी!

0
104

जनवरी में लगने वाले प्रयाग कुंभ में पहली बार किन्नर अखाड़ा भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी कर रहा है। कुंभ और अर्धकुंभ के अवसरों पर आकर्षण का केन्द्र बनने वाली अखाड़ों की पेशवायी यात्रा और प्रमुख स्रान पर्वों पर शाही जुलूस की तर्ज पर किन्नर अखाड़ा भी अपनी पेशवायी यात्रा और शाही जुलूस निकालेगा। इसके लिए पूरे देश से किन्नर समाज के लोगों को लाने का दायित्व अखाडेÞ के महामंडलेश्वरों, मंडलेश्वरों, श्रीमहंत तथा अन्य पदाधिकारियों को सौंपा गया है। यह अखाड़ा अपने मेला शिविर में पूरी अवधि तक पूजा- पाठ, यज्ञ,अनुष्ठान, कथा तथा अन्न क्षेत्र का भी आयोजन करेगा। 13 अक्टूबर 2015 को अस्तित्व में आया किन्नर अखाड़ा लगातार अपना विस्तार कर रहा है। अकेले लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, जो अब अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर हैं, द्वारा स्थापित किन्नर अखाड़े में संख्या-बल बढ रहा है।

गत वर्ष स्थापना दिवस के अवसर पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये एक साथ 60 किन्नरों को प्रयाग के बद्रिकाआश्रम मठ स्थित कार्यालय पर स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती द्वारा वैदिक संस्कारों से दीक्षित किया गया। दीक्षा प्राप्त करने के बाद किन्नरों ने संन्यासी का वेश धारण करके सारे वैदिक संस्कार भी किये जो एक संन्यासी करता है। इस वर्ष सितम्बर में अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर द्वारा देश के प्रमुख राज्यों, तमिलनाडु, हिमाचल, राजस्थान, हरियाणा, ओडिसा, पश्चिम बगांल,असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के अतिरिक्त दक्षिण भारत, उत्तर भारत, विदर्भ, पूर्वोत्तर भारत के लिए अलग-अलग महामंडलेश्वर बनाये गये। इसके बाद भी अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर ने कहा कि स्थापना दिवस कुछ लोगों को दीक्षित तथा कुछ लोगों को पद पर स्थापित किये जाने की योजना है। किन्नर अखाड़ा अपनी स्थाापना के बाद से ही अलग अखाड़े के रूप में मान्यता दिये जाने की मांग करता आ रहा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने किन्नर अखाड़े को 14 वें अखाड़े के रूप में मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया है।

इसी आधार पर उज्जैन कुंभ में अखाड़ों ने किन्नर अखाड़े को कोई महत्व न देते हुये पूरी तरह बहिष्कार किया लेकिन इस अखाड़े ने तमाम विवादों के बाद भी उज्जैन कुंभ में अपनी पेशवायी यात्रा और शाही यात्रा निकाल कर उपस्थिति दर्ज करायी। अब प्रयाग कुंभ में भी किन्नर अखाड़ा वही दृश्य दोहराने की तैयारी कर रहा है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरी कहते हैं कि आदिगुरु शकंराचार्य द्वारा स्थापित की गयी परम्परा के अनुसार 13 अखाड़ों के अतिरिक्त अन्य कोई अखाड़ा नही बन सकता है। उज्जैन कुंभ के बाद इन तीन सालों में तमाम स्थितियां उनके अनुकूल हुयी है क्योंकि अखाड़ा परिषद अब किन्नरों को संन्यासी बनाने के लिए तैयार हो गया है। सभी अखाड़ों ने संन्यासी बनने के इच्छुक किन्नरों के प्रवेश के लिए अपना द्वार खोलते हुये कहा है कि संन्यास लेने वाले किन्नरों को सनातन धर्म की परम्परा के अनुरूप आचरण और जीवनयापन करते हुये जप-तप में लीन होना पड़ेगा। संन्यास लेने वाले किन्नर को धर्मशास्त्र की जानकारी है तो मंडलेश्वर या महामंडलेश्वर जैसे उच्च पद भी दिये जायेंगे।

अखाड़ा परिषद ने किन्नरों को धर्म से जोड़ने के लिए उन्हें संस्कृत और वेदों की शिक्षा अखाड़ों द्वारा संचालित संस्कृत स्कूलों के माध्यम से दिलाये जाने की भी योजना बना रखी है लेकिन किन्नर अखाड़ा इससे संतुष्ट नही है। अखाड़े की आचार्य पीठाधीश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं कि यह परिषद की ‘बांटो और राज करो’ नीति है, उन्होंने किन्नर अखाड़े से भयभीत होकर इस प्रकार का निर्णय लिया है यदि किन्नरों से समस्या नही हैं तो मान्यता क्यों नही दे देते? कुंभ की तैयारी पर कहा कि हम अपनी दैवत्य यात्रा (पेशवायी की तर्ज पर) निकालेगें और मेले में किन्नर गांव स्थापित करेगें जहां से सारी धार्मिक गतिविधियां संचालित की जायेंगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here