एक सोच, धर्म की

0
24

धर्म संबंधी अपने विचार जिसको बनाने में रुचि हो उसे यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। धर्म के बारे में सही विचार विकसित करने में इससे मदद मिलेगी।

अपने विचार में धर्म संबंधी जो भ्रम हो सकते हैं, उन्हें इससे दूर भी किया जा सकता है। जरूरत इसकी है कि खुले दिल और दिमाग से पढ़ें। पुस्तक है- एक सोच, धर्म की।

यह पुस्तक कुछ दिनों पहले ही छप कर आई है। प्रारंभ में नरेन्द्र मोदी का संदेश है। पुस्तक के कवर पेज पर सबसे ऊपर संदेश का यह वाक्य छपा है। ‘यह पुस्तक विश्व के विभिन्न धर्मों के मुख्य पहलुओं का सुस्पष्ट वर्णन और विश्लेषण करती है।’

हर पुस्तक की एक कहानी होती है। उसका एक प्रयोजन भी होता है। इसे समझने में नरेन्द्र मोदी के संदेश का यह अंश सहायक है। ‘स्वामी विवेकानंद ने इस बात पर बल दिया था कि आध्यात्मिक मामलों में सारी मानवता को एक ही विचार-प्रक्रिया के अंतर्गत लाने का हरेक प्रयास नाकाम रहा है और हमेशा नाकाम ही रहेगा। आस्था और व्यवहार की दृढ़ता के आधार पर सभी धर्मों का कभी विकास हुआ तो कभी वे पतनशील भी रहे हैं। हमारा चाहे जो धर्म हो, हमारी पूजा-अर्चना नियंत्रणों से परे और स्वतंत्र होनी चाहिए क्योंकि हम सभी इश्वर की संतान अविनाशी आत्मा हैं।’

इस संदेश के प्रारंभ में यह उल्लेख है कि प्रो. जे.एस. ठाकुर और जी.डी. सिंह ने अंग्रेजी में ‘दी आइडिया ऑफ वन रिलिजन’ लिखा। उसका ही यह अनुवाद है। जिसका संपादन पत्रकार जगदीश उपासने ने किया है। मौसम बुक्स ने इसे प्रकाशित किया है। प्रकाशक मनीष जैन ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पुस्तक भेंट की।

लगता है कि इस पुस्तक और ऐसी पुस्तकों के प्रकाशन का विचार कभी नरेन्द्र मोदी ने लेखकों और प्रकाशक को दिया था। वह क्रम इस पुस्तक से प्रारंभ हुआ है। इस पुस्तक का अपने आप ही महत्व है। उसमें इसलिए बढ़ोतरी हो जाती है, क्योंकि इससे जो नरेन्द्र मोदी की छवि बनती है वह सेकुलरों के प्रचार के विपरीत है। सकारात्मक है। धर्म की सही समझ वाली है। डेढ़ साल से देश विदेश यानी पूरी दुनिया में ही यही धारणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में बलवती और करीब-करीब पक्की हो रही है।

कोई कह सकता है कि यह प्रचार साहित्य है। सच यह है कि इस पुस्तक को प्रेरक साहित्य की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। जिसे पढ़कर पाठक धर्म के बारे में सोचे। मनन करे और फिर अपनी समझ बढ़ाए। अंग्रेजी की पुस्तक का लोकार्पण अमेरिका में हुआ। अक्टूबर, 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा के दौरान ओवरसीज फ्रेंडस ऑफ भारतीय जनता पार्टी के एक समारोह में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकार्पण किया।

                                                                  सभी धर्मों की बुनियादी एकता पर हिन्दी और अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें हैं। वे भारत में भी लिखी गई हैं। वहीं ऐसी पुस्तकें विदेशों में भी छपी हैं। पर उन पुस्तकों का संदर्भ हमेशा कोई घटना और खास कर सांप्रदायिक उन्माद की घटना से जुड़ा रहा। यह पुस्तक उसी यात्रा की कड़ी में तो है, पर किसी घटना से उत्पन्न नहीं दिखती।

 

रामकृष्ण मिशन के सचिव स्वामी शांता नंद ने लिखा है कि ‘यह पुस्तक स्वामी विवेकानंद के सार्वभौमिक धर्म के संबंध में विभिन्न विचारों को एक सूत्र में पिरोने का बेहतरीन प्रयास है।’ पुस्तक में 12 अध्याय हैं। हर अध्याय का अपना कथ्य है। लेकिन कह सकते हैं कि इसके पांच अध्याय विशेष हैं। इनसे ही पुस्तक का व्यक्तित्व बनता है। वे हैं- ईश्वर, धर्म और आस्था। धर्मों की सर्वव्यापक प्रकृति। भारत का प्रचीन धर्म दर्शन। स्वयं की यात्रा और स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जीवनी। धर्म का विचार और अपने-अपने धर्म के गुणगान में बहुत अंतर है।

धर्म का गुणगान हो, पर वह दूसरे धर्म को समझने में बाधक नहीं होना चाहिए। अगर होता है तो वहीं से धर्मान्धता पैदा होती है। धर्म का विचार एक बात है और धर्म का अस्त्र के रूप में उपयोग बिल्कुल दूसरी बात है। इस पुस्तक में धर्म के अन्तधार्मिक विचार को समझाने और प्रस्तुत करने का प्रयास है। जिसे स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के समक्ष रखा। संभवत: इसलिए प्रकाशक यह बताना जरूरी समझता है कि नरेन्द्र मोदी के बारे में तो दर्जनों पुस्तकें उपलब्ध हैं। यह वह पहली पुस्तक है जिसमें प्रस्तुत विचार से नरेन्द्र मोदी प्रेरणा लेते हैं।

जाहिर है कि इस पुस्तक का एक संदेश है। वह स्वामी विवेकानंद का प्रतिपादित किया हुआ है। जो उन्होंने स्वामी रामकृष्ण परमहंस से प्राप्त किया था। भारत का इतिहास और अध्यात्म उतना ही पुराना है जितना यह जगत। सृष्टि के प्रारंभ से ही जब मानवता ने आंख खोली और उसने प्रकाश की यात्रा प्रारंभ की तब से ही भारत ज्ञान और कर्म का संदेश देता रहा है। उसका रूप समय-समय पर बदलता रहा। सामयिक जो रह सकता है, वही बच जाता है। जो काल में समा जाता है, उसे सिर्फ स्मरण किया जा सकता है। स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ऐसे संत-महात्मा-महापुरुष हुए जिन्हें अपने बीच आज भी महसूस किया जा सकता है। वे किसी कल्पना लोक के पुरुष और विचार लोक के देवता नहीं हैं। जीते-जागते प्रतीक पुरुष हैं।

इस पुस्तक में उन प्रतीकों को एक संदर्भ में समझाया गया है। वह संदर्भ स्वामी विवेकानंद का है। उस संदर्भ से स्पष्ट है कि स्वयं ईश्वर तो हर जगह है। वह अपने को अभिव्यक्त करने के लिए माध्यम खोजता है। वह किसी को अपना मुख बनाता है। वही व्यक्ति जो उपकरण देता है, वह धर्म का एक मार्ग हो जाता है। धर्म की रचना का राज यही है।

दिखने में धर्म अनेक हो सकते हैं। उसे किसी भी नाम से पुकारा और पहचाना जा सकता है। पर सभी धर्मों का मूल तत्व एक है। वह है, ईश्वर को जानना और उससे तदाकार हो जाना। इसी कड़ी में पुस्तक का यह अंश ध्यान देने लायक है। ‘अधिक से अधिक धार्मिक व्यक्तियों को तैयार करना एवं उनका प्रशिक्षण, पूर्व में इतना अधिक आवश्यक नहीं था जितना कि आज है।’ इसमें बहुत कुछ अनकहा है। जिसे अपने आस-पास के अनुभव से जानना आसान है।

यह पुस्तक एक मौलिक सवाल उठाती है। वास्तव में धार्मिक व्यक्ति कौन है? पुस्तक में इसका जवाब भी है। वह यह है- ‘धार्मिक व्यक्ति वह होता है, जिसके आचार, विचार, भावनाएं और कर्म सभी निर्मल होते हैं, जो अपने अंत:करण से निर्देश प्राप्त करता है।’ यह उसी तरह का है जैसे मील का पत्थर। वह रास्ता दिखाता है, स्वयं मंजिल नहीं होता। धार्मिक व्यक्ति के लिए पूरी मनुष्यता एक है। साधारण आदमी के लिए यह सोचना कठिन हो जाता है। उसे ही समझाने और बताने का पुस्तक में प्रयास दिखता है।

साधारण व्यक्ति यह सोच नहीं पाता कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि उसी परमात्मा के हैं। लेकिन धार्मिक व्यक्ति इसे अच्छी तरह समझता है। धार्मिक व्यक्ति धर्म के पक्ष में होता है। साधारण आदमी धर्म को हिन्दू और इस्लाम, ईसाइ में बांटकर देखता है। यह विभाजन जीवन रीति के लिए जरूरी हो सकता है। अपने-अपने धर्म में निष्ठा के लिए इससे स्पष्टता मिलती है। खतरा तब पैदा होता है जब यह विभाजन कट्टरता और उससे उत्पन्न विद्वेष का रूप ले लेता है। स्वामी विवेकानंद के विचार इस बाधा को दूर करते हैं। जिससे धर्म का प्रवाह निर्बाध बनता है। जिससे सार्वभौमिक धर्म की जरूरत महसूस होने लगती है। उसी भावना को इसमें जगाने का प्रयास है।

इस पुस्तक और ऐसी पुस्तकों के प्रकाशन का विचार कभी नरेन्द्र मोदी ने लेखकों और प्रकाशक को दिया था। वह क्रम इस पुस्तक से प्रारंभ हुआ है। इस पुस्तक का अपने आप ही महत्व है।

इससे कोई व्यक्ति गलत अर्थ न निकाल ले इसकी सावधानी भी पुस्तक में दिखती है। धर्मों की सर्वव्यापक प्रकृति के अध्याय में एक स्पष्टीकरण है। जिसे विवेकानंद के कथन से बताया गया है कि ‘वे चाहते थे कि लोग उनके साथ सर्वस्वीकार्य धर्म का स्वप्न देखें। ऐसा जब तक नहीं होता, तब तक सभी धर्मों का आदर आवश्यक है। तभी सर्वस्वीकार्य धर्म का रास्ता खुल सकेगा। इसका उपाय पुस्तक में सुझाया गया है। ‘हमें महान सत्य साधक स्वामी विवेकानंद के उदाहरण से सीखना चाहिए। सबसे पहले हमें विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना चाहिए।’

पुस्तक में धर्म के प्रमुख तत्व की चर्चा है। धर्म की विविधिता में एकता के सूत्र भी बताए गए हैं। इसमें बताया गया है कि वैश्विक धर्म वह है जो सभी धर्मों के सर्वभौमीकरण की राह खोलता है। पुस्तक में सकारात्मकता है। कहीं-कहीं पाठक को सुझाव भी दिए गए हैं। वे उपयोगी हैं या नहीं, इसका निर्णय पाठकों पर छोड़ दिया गया है। जैसे यह सुझाव देखें- ‘हमें ईश्वर का आराधना उन सभी रूपों में करनी चाहिए जिन रूपों में लोग उनकी पूजा करते हैं। हमें मुस्लिमों की मस्जिद में जाना चाहिए, गिरिजाघर में जाकर ईसा मसीह की मूर्ति के सामने घुटने टेकना चाहिए, हमें बौद्ध मंदिर में जाकर बुद्ध के सिद्धांतों में शरण लेना चाहिए। हमें हिन्दुओं से ध्यान करना सीखना चाहिए।’

बेहतर होता कि पुस्तक धर्म संबंधी वे सवाल उठाती जो आज विश्वव्यापी चिंता के केंद्र में हैं। उससे पुस्तक तटस्थ है। जैसे, यह सवाल जरूरी है कि धार्मिक असहिष्णुता क्यों बढ़ती जा रही है, जबकि सभ्यता के दावे पहले की तुलना में अधिक किए जा रहे हैं।

अगर ‘भारत का प्राचीन धार्मिक दर्शन’ अध्याय पुस्तक में न होता तो बात पूरी नहीं हो सकती थी। इस अध्याय का यह वक्तव्य है कि ‘भारत का प्राचीन धार्मिक दर्शन आर्यों के साहित्य का परिणाम है, जिन्हें हम वेद कहते हैं। यह किसी एक के द्वारा प्रारंभ नहीं किया गया था और न ही यह किसी एक ज्ञानी से दूसरे को शिक्षा देने पर केंद्रित है, और न ही एक पैगम्बर पर केंद्रित है, जैसा कि बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्मों में है। यह बहुत से ऋषियों, साधुओं और सत्यान्वेशकों के मिले-जुले प्रयास का परिणाम है। यह उनके वास्तविक जीवन अनुभवों, पवित्र आचरणों और वर्षों के लंबे शोध पर आधारित है।

अत: यही कारण है कि यह दर्शन पूर्णत: शुद्ध अवैयक्तिक है।’ इसको ही इस वाक्य में सार के रूप में समझाया गया है कि ‘प्राचीन भारतीय दर्शन सिद्धांत इस पर विश्वास करता है कि सभी मनुष्य एक ही अनंत सागर से उठने वाली धाराओं के समान हैं।’

पुस्तक में गूढ़ बातों को गले उतारने के लिए सटीक किस्से कहानियों का सहारा लिया गया है। स्वयं की यात्रा के अध्याय में पुनर्जन्म, इसके सिद्धांत की व्याख्या, मृत्यु का भय और कर्म के सिद्धांत जैसे विषय को सरल शब्दों में प्रस्तुत करने का पुस्तक में प्रयास है। पुनर्जन्म और मोक्ष का एक संबंध है। पुनर्जन्म का सिद्धांत इस पर आधारित है कि मनुष्य का अस्तित्व अतीत में भी था। वह मोक्ष पाने तक बार-बार जन्म लेता है।

 

कुछ गलतियां

  1. लगभग हर जगह एकवचन ‘हिंदू’ को बहुवचन ‘हिंदु’ लिखा गया।
  2. ‘अध्यात्म’ को ‘आध्यात्म’ लिखा गया।
  3. ‘महीने’ लगभग हर जगह ‘महिने’ या ‘महिना’ है?
  4. ‘कर्तव्य’ सभी जगह ‘कर्त्तव्य’ हो गया है?
  5. ‘खेतड़ी’ को ‘खत्री’ बना दिया गया।
  6. ‘बेलूर’ को ‘बेल्लुर’ लिखा गया।
  7. ‘केप कोमोरिन'(पेज 25) को कोष्ठक में ‘कन्याकुमारी’ लिखकर स्पष्ट किया जाना चाहिए था, हालांकि तब कन्याकुमारी नाम संभवत: प्रचलन में नहीं था या फिर यह नाम नहीं पड़ा था।
  8. ‘पत्नी’ कुछ जगह (पेज 72-73) ‘पत्नि’ लिखा गया है?
  9. वृहत ‘वृहत्त’ बन गया है? (पेज 51)
  10. ‘किंवदंती’ पेज 72 पर ‘किवदंती’ है?
  11. ‘सेव’ (पेज 87) पर ‘सेब’ होना चाहिए।
  12. पेज 95 पर ‘एसापा’ को ‘ईसप’ होना चाहिए।
  13. पेज 95 पर ‘भोकने’ को ‘भोंकने’ होना चाहिए।
  14. पेज 98, 100-101 पर ‘गैर-प्रतिरोध’ शब्द से अर्थ स्पष्ट नहीं होता।
  15. पेज 115 पर ‘भगवतगीता’ ‘भगवद्गीता’ होना चाहिए।

 

ये कुछ प्रमुख गलतियां है। कई शब्दों के बहुवचन में अंतिम अक्षर पर मात्राओं में अनुस्वार नहीं है, कई शब्दों पर भी नहीं है। पेज 17 पर विवेकानन्द के बारे में यह वाक्य स्पष्ट नहीं है, ”वह अवर्णनीय रूप से स्वावलंबन, व्यक्तिगत प्रयास और तलाश के पैगंबर थे।” प्रुफ की इकअर्सामान्य गलतियां और भी है।

अगर पुस्तक यह समझाती और उसके प्रमाण देती कि मनुष्य का जीवन किन तीन बातों से बनता है तो पाठक को अपने जीवन को समझने में मदद मिलती। अपना जीवन समझना ही स्वाध्याय है। इसके लिए जरूरी है यह जानना कि प्रारब्ध यानी पुनर्जन्म क्यों होता है। हर मनुष्य का एक संचित कोष भी होता है। उसे पुण्य कहते हैं। तीसरी बात होती है- क्रियमाण यानी इस समय जो कर रहे हैं। यह सवाल तो पुस्तक में उठाया गया है कि क्या पुनर्जन्म का कोई विश्वसनीय सबूत है? और इसका जवाब भी हां में दिया गया है। इसे कई तरह से समझाया गया है। पुस्तक का पूरा कथन स्वामी विवेकानंद के साहित्य पर आधारित है। उसकी व्याख्या का इसमें प्रयास है।

पुस्तक का समापन रामकृष्ण परमहंस की जीवनी से किया गया है। रामकृष्ण की जीवनी में जो बात रह गई है जिसे बार-बार बताया और याद दिलाया जाना चाहिए, वह यह है कि धर्म के सारे रास्ते चाहे जिधर से आएं वे ईश्वर से जाकर मिल जाते हैं। वे अलग-अलग मार्गों से मंजिल तक पहुंचाते हैं। स्वामी रामकृष्ण ने एक अनूठा प्रयोग किया। वैसा उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता। उन्हें एक मार्ग से ईश्वर मिल गए थे। आम तौर पर लोग वहीं रुक जाते हैं। स्वामी रामकृष्ण ने दूसरे मार्गों से भी पहुंचने का विचार बनाया। वे पहुंचे। इस्लाम, ईसाइयत की साधना की। सांख्य के मार्ग को खोजा। भक्ति के मार्ग पर चले। सब तरफ से देखा और पाया कि सभी रास्ते ईश्वर के पास पहुंचते हैं। इसे आज निशान लगाकर बताया जाना चाहिए। जो काम यह पुस्तक कर रही है।

सभी धर्मों की बुनियादी एकता पर हिन्दी और अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें हैं। वे भारत में भी लिखी गई हैं। वहीं ऐसी पुस्तकें विदेशों में भी छपी हैं। पर उन पुस्तकों का संदर्भ हमेशा कोई घटना और खास कर सांप्रदायिक उन्माद की घटना से जुड़ा रहा। यह पुस्तक उसी यात्रा की कड़ी में तो है, पर किसी घटना से उत्पन्न नहीं दिखती।

प्रकाशक ने अगर हिन्दी पुस्तक के छापने में भाषा, वर्तनी और स्थानों के बारे में अधिक सतर्कता बरती होती तो इसमें चार चांद लग जाता।

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here