आओ खेलें मन की होली

0
29

होली मुक्त व स्वछंद हास-परिहास का त्योहार है। नाचने-गाने, हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती की त्रिवेणी है होली। सुप्त मन की कंदराओं में पड़े ईर्ष्या-द्वेष, राग-विराग जैसे कलुषित व गंदे विचारों को तन-मन से सदा के लिए निकाल बाहर फेंकने का सबसे सुंदर अवसर है होली।

लगता है कि दुर्भावनाओं और मन में गहरे बैठ चुके मालिन्य को पूरी तरह से मिटाने व परस्पर प्रेम भाव बढ़ाने के लिए ही विधाता ने होली बनाई होगी।

तभी तो होली की रंगीली छटा के छाते ही जो मनमुटाव या आपसी वैर-विरोध था, सब खत्म! फागुन लगते ही समूचे देश में होली का ऐसा उल्लास छा जाता है, जो ठेठ चैत्र महीने की काली अमावस तक बिना रुके चलता है। फागुन की मनभावन बयार ऐसी है जो बिना किसी भेदभाव के सबमें मादकता भरकर हरेक मन की थिरकन को और भी तेज कर देती है।

हमारे लंबे-चौड़े साहित्यिक इतिहास में न केवल संस्कृत के रससिद्ध काव्यकारों ने बल्कि देशज भाषाओं के अनेक भक्त-कवियों ने भी राधा-कृष्ण के रंगीले होली प्रेम में आसक्त होकर अपनी लेखनी को धन्य बनाया है।

होली के ऐसे मनोहारी चित्र खींचे, जिनको देखकर लगता है कि वे कहीं गोपी-भाव से तो कहीं स्वयं ही राधा बनकर उस रस-रूप के महासागर रंगीले कन्हैया के रंग में सराबोर हो रहे हैं।

इन कवियों की वृत्ताकार काव्य यात्रा का केंद्र है-राधा-कृष्ण का होली प्रेम और ब्रज के अनूठे फागुनी रंग। होली वैदिक परंपरा से चले आ रहे चार त्योहारों में एक है।

हजारों सालों की परंपरा को अपने भीतर समेटती होली आनंदोत्सव का सर्वश्रेष्ठ रसमय उत्सव है। एक तथ्य बहुत ही अल्पज्ञात है कि होली ऋषि और कृषि से जुड़ा पवित्र उत्सव है, जो कदाचित सृष्टि के आदिकाल से ऋषियों और कृषकों द्वारा मनाया जाता रहा है।

आश्रमों में ऋषि और बटुक फागुन में ‘सामवेद’ के मंत्रों का गान करते थे वहीं नई फसल के पक जाने पर किसान चटकीले फागुन में रंग-बिरंगी ‘होली’ खेलते थे।

शास्त्र परंपरा ने होली को ‘अग्नि’ से मिलाया। भला, पके धान्य को ऐसे थोड़े ही खाना है? खेतों में लहलहा रही बालियां कोई साधारण नहीं बल्कि माता लक्ष्मी का मुख हैं।

इसीलिए खेतों में चमचमा रही जौ-गेहूं की बालियों को सबसे पहले ‘अग्नि देवता’ को समर्पित किया जाता है। फिर होली की अग्नि-ज्वाला में नवीन धान्य को पकाकर उन पकी हुई बालियों को प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।

ऐसे में स्पष्ट है, होली हमारे जीवन को चलाने वाला उत्सव भी है। अब जरा यह राग-अनुराग देखिए, होली पर प्रेम की कैसी आंख-मिचौनी है कि चहुं ओर होली का हुड़दंग मचा हुआ है।

होली की उमंग और मादकता ने क्या स्त्री और क्या पुरुष, सभी की लाज-शरम हटाकर रख दी है। कहते हैं कि पूरे ब्रज में तो एक भी ऐसी नवेली नारी नहीं बची जो होली पर नटखट कन्हैया के प्रेम में न रची हो। अरे, देखो तो सही कि लुभावनी, अनूठी होली ने पूरे संसार को बावला बनाकर रख दिया है।

एक गोपी कृष्ण के सांवरे रंग में ऐसी रंगी कि श्यामसुंदर की सलौनी सूरत को इकटक निहारते हुए कान्हा से याचना करती है, भक्त रसखान यह सब देख रहे हैं-

खेलिए फाग निसंक ह्वै आज, मयंक मुखी कहे भाग हमारौ
तेहु गुलाल छुओ कर में, पिचकारिन मैं रंग हिय मंह डारौ।
भावे सु मोहि करो रसखान, जू पांव परों जनि घूंघट टारौ


वीर की सौंह हौं देखि हौं कैसे, अबीर तौ आंखि बचाय कै डारौ।
होली में वसंत की महक और फागुन की मस्ती का रसीला वातावरण ऐसा रूप धरता है कि ढप, ढोल, चंग, नगाड़े सभी साज-सजीले होकर जनमानस की उमंगों के संग स्वत: ही बजने लगते हैं। इस अवसर पर जैसा दिव्य रस धरती पर बरसता है वैसा कदाचित बैकुंठ में भी नहीं। होली के रस में सारे रसिकजन सराबोर हो रहे हैं। डगर-डगर और गली-गली होली की मस्ती में चहक रही है।

सुंदर युवतियों की टोलियां अबीर-गुलाल लेकर होली खेलने निकल पड़ी हैं तो नौजवानों का टोला भी अपनी पूरी तैयारी में हैं। भला, आज कैसी लोक-लाज? दिव्य अध्यात्म में आज सब शरीर की सुध-बुध खो बैठे हैं।

रसिक शिरोमणि परमात्मा श्रीकृष्ण के साथ होली खेलने की आत्मा की साधना अब पूरी होगी। फाग का मनोरथ पूरा होगा। संभवत: यह सोचते हुए ही द्वापर में एक गोपी श्रीकृष्ण को ढूंढ़ने अकेली ही निकल पड़ी पर कन्हैया तो अंतरयामी जो ठहरे।

बस, मन से पुकारा और आ गए। श्रीकृष्ण को पाने के लिए छटपटाती भाग्यशालिनी है वह गोपी, जो प्रेम-रस में सराबोर होकर कृष्ण-कन्हैया के मधुर रंग को प्राप्त कर रही है।

अब जरा इधर देखिए, ब्रज की रंगीली गलियों में रसभरी होली हो रही है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे गोप-गोपियों का समूह कन्हैया का अनुराग-रस पीने निकल पड़ा।

होली की धमाचौकड़ी से सारा ब्रज क्षेत्र पुलकित हो उठा। रसिकों से सुनी यह कथा कितना मन मोहती है कि होली पर गोकुल गांव में बेचारी बाहर की कोई नई बहू आई। भला वो क्या जाने कन्हैया की होली के रीति-रिवाजों को! जिधर भी जाए, उधर ही होली का ऊधम। सांवरिया कन्हैया तो जगह-जगह ठिठोली करते फिर रहे हैं। संत नागरीदास ने इसी अनूठे फाग के रंग में भीगकर इस कथा का बड़ा सुंदर चित्रण किया-

 

और हूं गांव सखी बहुतैं पर गोकुल गांम कौ पैड़ो ई न्यारौ।

 

रसखान, नागरीदास तथा कई कृष्णभक्त कवियों ने होली के बड़े ही सरस वृत्तांत लिखे हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि श्रीकृष्ण हाथ में पिचकारी लेकर हम सभी जीवों को अपने आनंदरस के रंग में रंगने हेतु मोर्चा संभाले बैठे हैं।

जब उनकी आनंद की पिचकारी सतरंगी धार छोड़ेगी तो भला क्या मजाल कि कोई बचकर निकल जाए! ऐसी धार पड़ेगी कि एक ही पिचकारी में जन्म-जन्मांतर रंगीले हो जाएंगे। पर क्या वह होली खेलना भी कोई होली है जो आज खेलें और कल ही उतर जाए। होली तो ऐसी खेली जाए कि जन्म-जन्मांतरों की पीड़ा शांत होकर बस आनंद रस ही बरसे।

जीवन में वसंत और होली की जुगलबंदी हो तो ऐसी कि श्रीकृष्ण का साथ और प्रेम का रंग कभी न छूटे। जीवन के यथार्थ से जुड़कर होली इतने सतरंगी रंग हमारे जीवन में बिखेर दे कि उन रंगों की खुमारी फिर ताउम्र उतरे ही नहीं। भला, आनंद के महासागर की ओर बढ़ते होली के रथ को कोई रोक सका है क्या? उसे तो आनंद के समुद्र तक जाना ही है।

होली के कोठार में हर रोग का समाधान और ऐसी खनकती सुरीली रागनियां हैं जिन्हें जिंदगी से जोड़कर हम अपने तन-मन के वृंदावन में उस कन्हैया के साथ प्रेम के रंग सिर्फ होली को ही नहीं वरन हर रोज खेल सकते हैं।

जरूरत है बस होली के रंगों में छिपे निहितार्थ को पहचानने की। यदि हम होली और उसके लाल-पीले-हरे-गुलाबी रंगों की वास्तविकता को पहचानने में सफल हो गए तो होली केवल आज के लिए ही नहीं बल्कि सदा के लिए हमारे भीतर और बाहर को रंगीन बनाने वाली हो जाएगी।

जीवन में पुलकित प्रणय और चिरंतन यौवन को बढ़ाती होली की ताल से अपनी थिरकन को मिलाकर हम पतझड़ से दूर ऐसे वसंत को जी सकते हैं जहां हमेशा मिलन और एकता के रंगों की बहार है।

हमारे देश के यौवन को रंगने वाली होली के रंग घृणा, द्वेष और कटुता के कालेपन को मिटाने के लिए हैं। इसीलिए होली के रंगों की जरूरत किसी एक दिन और माह के लिए नहीं बल्कि सदा के लिए और सभी के लिए है।

होली एक दिन या पखवाड़े का उत्सव नहीं हैं। यह पर्व तो प्यार के रंगों और आनंद के गीतों का है, एक-दूसरे में प्रेम-रंग रंगने का है।

अब भले ही बदलते परिवेश की काली परछाई हमारी आत्मा से जुड़े परंपरा के इन अनूठे रंगों को बदरंग करने पर तुली है, परंतु यह सनातन रंग तो ऐसा है, जिसे बिना आंखों वाले सूरदास भी पहचानते है-चढ़त न दूजो रंग!  न केवल संस्कृत के रससिद्ध काव्यकारों ने बल्कि देशज भाषाओं के अनेक भक्त कवियों ने भी राधा-कृष्ण के रंगीले होली प्रेम पर अपनी लेखनी चलाई है।

होली के ऐसे मनोहारी चित्र खींचे, जिनको देखकर लगता है कि वे कहीं गोपी-भाव से तो कहीं स्वयं ही राधा बनकर उस रस-रूप के महासागर रंगीले कन्हैया के रंग में सराबोर हो रहे हैं। होली वैदिक परंपरा से चले आ रहे चार त्योहारों में एक है। हजारों सालों की परंपरा को अपने भीतर समेटती होली आनंदोत्सव का सर्वश्रेष्ठ रसमय उत्सव है। मुक्त व स्वछंद हास-परिहास का त्योहार है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here