घटनाएं जिन्होंने बीते लम्हों को मथा

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साल 2018 में जिन बड़े सामाजिक बदलावों की पीठिका तैयार हुई, उनकी पटकथा देश के संवैधानिक स्तंभों में से एक न्यायपालिका ने लिखी। दिलचस्प यह है कि ये पटकथाएं एक ही महीने सितंबर की छह और 27 तारीखों को लिखीं गईं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रगतिशीलता के नाम पर सदियों से विकसित मूल्यों और संस्कारों को तिलांजलि देने की दिशा में कदम बढ़ा दिया।

साल 2018 सामाजिक मोर्चे पर खास बदलावों के लिए शिद्दत से याद किया जाएगा। इस साल जिन बड़े सामाजिक बदलावों की पीठिका तैयार हुई, उनकी पटकथा देश के संवैधानिक स्तंभों में से एक न्यायपालिका ने लिखी। दिलचस्प यह है कि ये पटकथाएं एक ही महीने सितंबर की छह और 27 तारीखों को लिखीं गईं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रगतिशीलता के नाम पर सदियों से विकसित मूल्यों और संस्कारों को तिलांजलि देने की दिशा में कदम बढ़ा दिया। साल 1860 से चली आ रही सीआरपीसी की धारा 377 और 497 के तहत जारी व्यवस्थाओं को खत्म किया जाने को देश के एक बड़े वर्ग ने क्रांतिकारी से कहीं ज्यादा सामाजिक मूल्यों पर प्रहार माना।

समलैंगिता और परस्त्रीगमन के खिलाफ भले ही ये कानून 158 साल पहले बने हों, लेकिन भारतीय परंपरा में इन्हें सदियों से दुर्गुण ही माना जाता रहा है। बेशक समाज में ढंके – छिपे ये सब चलता रहा हो, लेकिन कानूनी प्रावधानों के चलते इन पर सार्वजनिक रोक जरूर रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 6 और 27 सितम्बर के आदेशों ने यह व्यवस्था बदलकर रख दी है। सदियों से भारतीय समजा में परस्त्रीगमन और समलैंगिकता अप्राकृतिक और गलत माने जाते रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद समलैंगिकता अब अपराध नहीं रहा और परस्त्रीगमन को लेकर भी सजा का प्रावधान खत्म हो गया। हालांकि धारा 497 के जरिए परस्त्रीगमन अब अधिक से अधिक वैवाहिक अपराध ही रह गया है और इसके चलते दंपत्ति तलाक ले सकते हैं। चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व के मूल्यों को लेकर आगे बढ़ते रहे हैं, लिहाजा उन्हें लेकर माना गया कि दोनों इन कानूनों पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। संघ प्रमुख मोहन राव भागवत ने अपने 20 सितम्बर के व्याख्यान में समलैंगिकता पर कहा कि समाज में स्थित ऐसे लोगों के लिए भी उचित व्यवस्था बनानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानूनी रूप से समलैंगिकता और परस्त्रीगमन गैरकानूनी न रहा, लेकिन सुदूर इलाकों में रह रहे लोग, चाहे किसी भी धर्म के क्यों न हों, इसे सही मानने को तैयार नहीं हैं। भारत के रग- रग में राम की व्यापकता बनी हुई है। राम ने एकनिष्ठ पत्नी व्रत का जो उदाहरण पेश किया था, उसे देश स्वीकार करता है। भारतीय पारिवारिक मूल्य की ताकत को पश्चिमी विचारधारा पर आधारित आर्थिकी ने भी स्वीकार किया है। साल 2008 में आई वैश्विक मंदी के सामने जब दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं भहरा रही थीं, तब हनोई और भारत की अर्थव्यवस्थाएं खड़ी रहीं। तब विश्व बैंक ने भी इसे खुले दिल से माना था। राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के महासचिव क्रांति प्रकाश कहते हैं कि पश्चिम में पारिवारिक संस्थाएं ध्वस्त हो गईं हैं, लिहाजा पश्चिमी बाज़ारवादी ताकतें चाहतीं हैं कि भारतीय पारिवारिक संस्थाएं भी ढह जाएं।

यह तभी सम्भव हो सकता है, जब उसके पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों पर हमला हो और उन्हें बदला जाय। इसमें अपने देश के वे बुद्धिजीवी और गैर सरकारी संगठन सहयोगी बन रहे हैं, जिनकी संस्थाओं को विदेशी अनुदान या सहायता खूब मिलते रहे हैं। सामाजिक बदलाव लाने वाले सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों में वह मांग शामिल ही नहीं हो पाई, जिसको लेकर याचिका दायर की गई थी। किसी विवाहिता से सम्बंध के चलते पुरुष को दोषी मानने वाली धारा 497 के खिलाफ दायर याचिका में मांग की गई थी कि ऐसे संबंधों के लिए सिर्फ पुरुष ही दोषी क्यों? यहां यह बता देना वाजिब है कि विवाहेतर संबंध में दोषी पाए जाने पर सीआरपीसी की धारा 497 और 198(2) के तहत सिर्फ पुरुष को ही पांच साल तक की सज़ा का प्रावधान था।

राममंदिर समर्थकों का तर्क है कि जब किसी सजायाप्ता की फांसी रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट देर रात बैठ सकता है तो करोड़ों लोगों के आराध्य राम और करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े मामले के लिए वह रोजाना सुनवाई क्यों नहीं कर सकता या इसे लेकर जल्द फैसला क्यों नहीं कर सकता।

याचिका में मांग की गई थी कि इस कानून के तहत दोषी महिला को भी क्यों न सज़ा का भागीदार बनाया जाए? याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में इस मामले में सज़ा को सही और भारतीय मूल्यों के अनुरूप बताया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी एडल्ट्री में महिला को दोषी मानने के संकेत दिए थे। लेकिन 27 सितम्बर को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने जो फैसला सुनाया, वह इसके ठीक उलट था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध मानने से इनकार कर दिया। हां, वैवाहिक प्रताड़ना जरूर माना और पति की शिकायत पर तलाक का आधार जरूर माना। दिलचस्प यह है कि महिला संगठन और महिलाओं के लिए हमेशा सक्रिय रहने वाली दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल भी इस फैसले से असहमत नज़र आईं।

महिला संगठनों तक ने माना कि विवाहेतर रिश्ते के लिए विवाहित महिला को भी दोषी माना जाय क्योंकि ऐसे मामलों में विवाहित महिला का पति भी प्रताडि़त होता है। दरअसल अमेरिका भी यूरोपीय आर्थिकी और संस्कृति का विस्तार है। इसलिए दोनों की कोशिश एशियायी समाजों, परिवारों और मूल्यों को ध्वस्त करने की रही है। वियतनाम युद्ध में अमेरिका को भले ही मुंह की खानी पड़ी, लेकिन वह एक मोर्चे पर कामयाब रहा। उसने थाईलैंड को वेश्यावृत्ति का अड्डा जरूर बना दिया। नई अर्थव्यवस्था के साथ उसने चीन की पारिवारिक व्यवस्था को चोट पहुंचा दी, जापान के पारिवारिक तन्त्र में भी दरार डाल दी। अब वहां के युवा परिवार बनाने और शादी करने से बचने लगे हैं। पिछले साल राममंदिर का मुद्दा भी व्यापक सामाजिक बदलाव लाने की दिशा में कारगर नजर आया। राममंदिर की विवादित भूमि को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में फैसला देते हुए विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने और राम लला को हिस्सेदार बनाया।

उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 13 याचिकाएं दायर हैं। उन पर विचार करते हुए 11 अगस्त 2017 को फैसला दिया था कि वह जनवरी 2018 से मामले की रोजाना रोजाना सुनवाई का फैसला किया था। लेकिन केस से जुड़ी फाइलों के अनुवाद की समस्या को लेकर पहले यह मामला अप्रैल 2018 तक चला। फिर इसे 29 अक्टूबर 2018 से रोजाना सुनवाई के लिए निर्धारित किया गया। लेकिन 29 अक्टूबर को महज तीन मिनट की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 27 जनवरी 2019 तक के लिए टाल दिया। यह भी तय नहीं किया गया कि उस दिन से इस मामले की रोजाना सुनवाई होगी या नहीं। इसे लेकर देशभर में राममंदिर समर्थक नाराज हो गए। उनका तर्क है कि जब किसी सजायाμता की फांसी रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट देर रात बैठ सकता है तो करोड़ों लोगों के आराध्य राम और करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े मामले के लिए वह रोजाना सुनवाई क्यों नहीं कर सकता या इसे लेकर जल्द फैसला क्यों नहीं कर सकता। साल 2018 इसलिए भी याद रखा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट ने 21 मार्च 2018 को एससी एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले में तत्काल गिरμतारी पर रोक लगा दी थी। इसे लेकर दलित समुदाय गुस्से से भर उठा था।

भारतीय जनता पार्टी को इसका राजनीतिक नुकसान होते नजर आया था, इसलिए उसकी अगुआई वाली केंद्र सरकार ने इस फैसले को अध्यादेश लाकर पलट दिया और उसे कानूनी जामा भी पहना दिया। जिसके खिलाफ छह सितंबर को देशव्यापी बंद का आयोजन किया गया था। पिछले साल समाज को दुखी करने वाली भीड़तंत्र के हाथों इंसाफ की भी घटनाएं हुईं। इनमें कुछ गौभक्तों को कई बार बदनाम किया गया तो कई बार गौभक्तों पर गोकशी के लिए गौ ले जा रहे तस्करों ने हमला किया। इसे लेकर देश में छुआछूत और धार्मिक भेदभाव दिखाने की कोशिश मीडिया और राजनीति के एक वर्ग ने की। साल बीतते-बीतते दिसंबर महीने में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में अल्पसंख्यक समुदाय की एक बड़ी धार्मिक सभा के ठीक बाद गोकशी की घटना हुई। इसके बाद हुए बवाल में एक पुलिस इंसपेक्टर और एक सामान्य नागरिक की मौत हो गई।

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