कार्ल मार्क्स आज भी प्रासंगिक

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आज दुनिया भर में बेहतर भविष्य की कामना करने वाले लोग मार्क्स का 200वां जन्म दिन मना रहे हैं।

”मार्क्स की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की प्रस्थापना ने समूची दुनिया को झकझोर कर रख दिया था।अर्थशास्त्र, इतिहास और दर्शन में तो सीधे उनके विचार की धमक सुनी गयी, कला और संस्कृति के क्षेत्र को भी उसने जबर्दस्त तरीके से बदल दिया।”

यह विचार लोक लहर के संपादक राजेन्द्र शर्मा का है। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्मारक संग्रहालय पुस्तकालय में वे ‘थिंक इंडिया सेंटर’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि, ”मार्क्स का जन्म एक जर्मन यहूदी वकील के घर में 5 मई 1818 को हुआ था। 65 वर्ष की आयु में, 14 मार्च 1883 को उनका निधन हुआ। इस अपेक्षाकृत छोटी कालावधि में उन्होंने जो कुछ लिखा, उसमें ऐसा क्या था, कि न सिर्फ आज भी सारी दुनिया उसके महत्व को मानती है बल्कि यह भी स्वीकार करती है कि मार्क्स के बाद, दुनिया पहले जैसी नहीं रह गयी है। जाहिर है कि इसका संबंध, मार्क्स के विचारों के वास्तविक जीवन पर प्रभाव से है।”

मार्क्स ने कभी दावा नहीं किया कि उनका कहा ही आखिरी हर्फ है। वह खुद जीवन भर अपने विचारों का विकास करते रहे।  भारत के संबंध में मार्क्स का लेखन इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

मार्क्स ने कभी दावा नहीं किया कि उनका कहा ही आखिरी हर्फ है। वह खुद जीवन भर अपने विचारों का विकास करते रहे।

भारत के अपने संदर्भ में, साम्राज्यवादी गुलामी से मुक्ति और पूंजीवाद की गुलामी से मुक्ति के रिश्ते को, सबसे पहले मार्क्स ने ही रेखांकित किया था।

मार्क्स ने न सिर्फ 1857 के विद्रोह की पहचान ‘भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में की थी बल्कि एक अमेरिकी दैनिक के लिए उसकी खुले तौर पर पक्षधरतापूर्ण रिपोर्टिंग भी की थी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश राज के संपर्क से आ रहे आधुनिक प्रगति के साधनों का भारत को कोई वास्तविक लाभ तभी होगा, जब वह ब्रिटिश दासता को उखाड़ फेंकेगा।

ब्रिटिश हुकूमत के आर्थिक दस्तावेजों का अध्ययन कर, मार्क्स भारत में ब्रिटिश राज की आर्थिक लूट को नोट कर चुके थे। इसका सबूत अर्थशास्त्री एनएफ डेनिअल्सन को लिखी चिट्ठी है,जो उन्होंने अपनी मृत्यु से सिर्फ दो वर्ष पहले लिखी थी।

भारतीय भाषाओं में मार्क्स का पहला उल्लेख, 1903 में अमृत बाजार पत्रिका में एक पत्रकारीय टिप्पणी में आया। यह टिप्पणी विदेशी समाजवादियों के उदय पर अंग्रेजी के किसी लेख पर आधारित थी।

इसके एक दशक के अंदर,1912 में कार्ल मार्क्स की रामकृष्ण पिल्लै  की जीवनी आ चुकी थी। एक दशक और गुजरने से पहले ही भारत में मार्क्स के विचारों पर आधारित कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी।

इसके बाद, पूर्ण स्वतंत्रता की मांग से लेकर, राष्टीय आंदोलन के साथ मजदूरों तथा किसानों के हितों के बुनियादी प्रश्नों पर मार्क्स के विचारों का प्रभाव पड़ा।

इस अवसर पर प्रो.पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि, ”मार्क्स सिर्फ  मार्क्सवादियों के लिए ही नहीं वरन हम सबके लिए प्रासंगिक हैं। मार्क्स ने यह बताया कि समाज और संस्कृति की निणार्यक ताकत भौतिक है।

साझे सपने के बिना किसी की मुक्ति नहीं हो सकती है। आज भी बदलाव की शक्तियां मार्क्सवाद से अंतरदृष्टि प्राप्त कर सकती हैं।”

उन्होंने कहा कि कार्ल मार्क्स ने उस समय यह समझ लिया था कि पूंजी राष्ट्र-राज्य की सीमा से बंधी नहीं रह सकती है।

पूंजी अंतरराष्ट्रीयता की तरफ बढ़ेगी। मार्क्स की बुनियादी चिंता मनुष्य के मनुष्य न रह जाने की चिंता है।  पूर्व सांसद देवी प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि, ”मनुष्यता,सभ्यता और संस्कृति का सबसे सटीक विश्लेषण कार्ल मार्क्स ने किया। मार्क्स ने कहा कि पूंजीवाद अनैतिक और समाजवाद नैतिक है।”

सितंबर,1999 में बीबीसी न्यूज के एक ऑनलाइन जनमत सर्वेक्षण ने कार्ल मार्क्स को सहस्त्राब्दी का सबसे महान चिंतक ठहराया था। तब तक सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोपीय समाजवादी राज्यों के पतन को लगभग एक दशक गुजर चुका था।

 

ब्रिटिश हुकूमत के आर्थिक दस्तावेजों का अध्ययन कर, मार्क्स भारत में ब्रिटिश राज की आर्थिक लूट को नोट कर चुके थे।

इक्कीसवीं सदी में भी इस क्रांतिकारी चिंतक का दर्जा नहीं घटा है। नयी सदी के पहले और दूसरे दशकों के मध्य में भी अलग-अलग सर्वेक्षणों में कार्ल मार्क्स को ‘महानतम दार्शनिक’ से लेकर, ‘अब तक का सबसे प्रभावशाली चिंतक’ तक ठहराया गया है।

कार्ल मार्क्स ने1848 में प्रकाशित कम्युनिस्ट घोषणापत्र के जरिए शोषण मुक्त समाज का लक्ष्य मानवता के सामने रखा था, जिसकी गिनती आज भी दुनिया की अब तक की सबसे प्रभावशाली 50 पुस्तकों में होती है।

मार्क्स ने न सिर्फ 1857 के विद्रोह की पहचान ‘भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में की थी बल्कि एक अमेरिकी दैनिक के लिए उसकी खुले तौर पर पक्षधरतापूर्ण रिपोर्टिंग भी की थी।

उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश राज के संपर्क से आ रहे आधुनिक प्रगति के साधनों का भारत को कोई वास्तविक लाभ तभी होगा, जब वह ब्रिटिश दासता को उखाड़ फेंकेगा।

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