हिमालय परंपरा के योगी

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संसार का कोई भी कार्य बिना अनुभवी गुरु के नहीं हो सकता। योग के मामले में यह बात और अहम हो जाती है, क्योंकि गुरु ही शिष्य की आंखें खोलकर व उसको ठीक मार्ग बताकर लक्ष्य तक पहुंचाते हैं।

इसलिए गुरु की महिमा वेदों और शास्त्रों में भी हुई है। यहां हम योग के उन आधुनिक गुरुओं की चर्चा कर रहे हैं जो दुनिया के लोगों को अपने-अपने तरीके से योग सिखा रहे हैं। इन योग गुरुओं में स्वामी वेद भारती का दुनिया में अलग स्थान है।

ऋषिकेश के एक छोर पर स्थित स्वामी राम साधक ग्राम। यह स्वामी वेद भारती का आश्रम है। बेहद शांत वातावरण। स्वामी वेद भारती महामंडलेश्वर हैं। दुनिया भर में योग और अध्यात्म का प्रसार करने वाले हिमालय के स्वामी राम के शिष्य। पर स्वामी राम साधक ग्राम में अधिक भीड़, अधिक चहल-पहल नहीं दिखती। सबकुछ बेहद शांत, अनुशासित, व्यवस्थित। एक गहरी नदी की तरह गंभीर।

स्वामी राम साधक ग्राम का यह वातावरण स्वामी वेद भारती की कल्पनाओं को साकार करने की कोशिश है। साधक ग्राम उन साधकों के लिए है, जो योग के पारंपरिक ज्ञान को उसके मूल स्वरुप में ग्रहण करना चाहते हैं। जिनके लिए योग सिर्फ आसान और प्राणायाम नहीं, बल्कि आत्म-जाग्रति का माध्यम है।

स्वामी वेद भारती का यह मिशन बीते 60 वर्षों से अनवरत जारी है। स्वामी वेद भारती महज नो वर्ष के थे, जब उन्होंने पतंजलि के योग-सूत्र की शिक्षा देनी शुरू कर दी। 11 वर्ष की आयु में वे वेदों पर प्रवचन देने लगे। सन् 1933 में जन्मे स्वामी वेद भारती ने 14 वर्ष की उम्र से दुनिया का भ्रमण करना और प्रवचन देना आरंभ कर दिया।

एक भी दिन स्कूल गए बिना स्वामीजी ने न केवल योग, ध्यान और अध्यात्म का गहरा ज्ञान अर्जित किया, बल्कि उनने हॉलैंड में बी.ए., एम.ए. और डी.लिट. भी हासिल किया। सन् साठ के दशक में स्वामीजी ने अमेरिका के मिनेसोटा विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया। इसी दौरान वे हिमालय के स्वामी राम के संपर्क में आए और उनके शिष्य बने और ध्यान-योग की ओर प्रेरित हुए।

योग, ध्यान और अध्यात्म का प्रसार करने के अपने अभियान में स्वामीजी ने अब तक विश्व भर में 50 से अधिक केन्द्रों की स्थापना की है, जिनमें से अधिकतर अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका में हैं। योग को विज्ञान से जोड़ने में स्वामीजी ने महती भूमिका निभाई है। ऋषिकेश स्थित स्वामी राम साधक ग्राम में भी स्वामीजी ने एक प्रयोगशाला स्थापित की है, जहां योग, ध्यान और अध्यात्म के विभिन्न प्रयोगों का अध्ययन किया जाता है।

स्वामी वेद भारती मानते हैं कि योग और ध्यान स्व-शासन का विज्ञान  है, उसकी कला है। हिमालय में हजारों वर्षों से ऋषि-मुनियों ने ध्यान-योग की जिस परंपरा को विकसित किया, स्वामी वेद भारती उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

19 भाषाओं के ज्ञाता स्वामीजी ने योग, ध्यान और अध्यात्म पर 18 पुस्तकें लिखी हैं। पतंजलि के योगसूत्र पर 1500 पृष्ठों की टीका स्वामीजी की महत्वपूर्ण कृति है।

स्वामी वेद भारती मानते हैं कि योग और ध्यान स्व-शासन का विज्ञान  है, उसकी कला है। हिमालय में हजारों वर्षों से ऋषि-मुनियों ने ध्यान-योग की जिस परंपरा को विकसित किया, स्वामी वेद भारती उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह परंपरा सिर्फ कुछ आसनों और प्राणायामों तक सीमित नहीं, बल्कि उन पद्धतियों की शिक्षा देती है, जिसमें ध्यान का अभ्यास मनुष्य के समस्त व्यक्तित्व को सुंदरता प्रदान करता है, उसे उन्नत बनाता है।

योग का अर्थ है – ‘जुड़ना’, स्वयं से जुड़ना, अपने भीतर की शक्ति से जुड़ना, अपने मन को जोड़ना, अपनी बुद्धि को जोड़ना। ऋग्वेद में योग को समाधि बताया गया है। हिमालय के ऋषियों की यह परंपरा, जिसे स्वामी वेद भारती आगे बढ़ा रहे हैं, योग को सिर्फ शारीरिक-मानसिक लाभ के लिए शरीर हिलाने की प्रक्रिया नहीं मानती। योग तो स्वयं को जागृत करने का मार्ग है।

भगवद्गीता में इसे ‘अभ्यास’ और ‘वैराग्य’ का मार्ग कहा गया है। यह महर्षि पतंजलि की परंपरा है, जिनने अष्टांग योग की व्याख्या दी। योग की व्याख्या करते हुए स्वामीजी कहते हैं कि योग समाधि है। योग ‘स्व’ की आध्यात्मिक स्वतंत्रता का जरिया है।

योग की यह परंपरा किसी एक धर्म से जुड़ी नहीं है। हिमालय के स्वामी राम और उनके गुरु बंगाली महाराज के जरिये यह हिमालय के ऋषियों से जुड़ती है। शंकराचार्य और श्रृंगेरी पीठ के विद्यारण्य मुनि के साथ इसका जुड़ाव वेदान्त से है। संन्यास की परंपरा में यह शंकराचार्य की दसनामी परंपरा में ‘भारती’ परंपरा से जुड़ी है। ईसाईयत में इस परंपरा का संबंध ईसा मसीह के प्रमुख शिष्य संत पीटर से है, तो इसके संबंध बौद्ध और तिब्बती परंपराओं से भी है।

भक्ति परंपरा में इस योग परंपरा का संबंध 16वीं सदी के मधुसूदन सरस्वती से है। स्वामीजी मानते है कि हिमालय की यह परंपरा न सिर्फ सभी धर्मों को जोड़ती है, बल्कि नास्तिकों के लिए भी यह उतनी ही उपयुक्त है।

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