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Sunday, November 18, 2018

धरोहरों को मिलेगी नई चमक!

केंद्र सरकार ने दिल्ली के लाल किला और आंध्र प्रदेश के कडापा स्थित गांधीकोटा किला के संरक्षण और संवर्धन का जिम्मा डालमिया औद्योगिक घराने...

विश्व संचार क्षितिज तक फैला भारत

मार्च में जब देश में कई तरह की गतिविधि और संसदीय उलझनें चल रही थीं, स्पेन के खूबसूरत शहर बार्सिलोना में भारत की तेज...

कार्ल मार्क्स आज भी प्रासंगिक

आज दुनिया भर में बेहतर भविष्य की कामना करने वाले लोग मार्क्स का 200वां जन्म दिन मना रहे हैं। ”मार्क्स की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की प्रस्थापना...

निरंतरता के लिए पुन: सरकार्यवाह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेश जोशी (भैय्याजी जोशी) को लगातार चौथी बार सरकार्यवाह घोषित किया गया है। संघ की नागपुर में हुई प्रतिनिधि...

आओ खेलें मन की होली

होली मुक्त व स्वछंद हास-परिहास का त्योहार है। नाचने-गाने, हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती की त्रिवेणी है होली। सुप्त मन की कंदराओं में पड़े ईर्ष्या-द्वेष, राग-विराग...

आध्यात्मिक संस्कृति का आदर्शलोक

भारत के सांस्कृतिक मूल्यों में ‘सर्व’ को समाहित कर लेने की प्रवृत्ति मूल तत्व के रूप में विद्यमान है। दुनिया की तमाम सांस्कृतिक विविधताओं...

ताजा होती बंटवारे की स्मृति

देश ने 71वां स्वतंत्रता दिवस मनाया है। अगस्त का पूरा महीना उत्सव सरीखा रहा, लेकिनइसी दौरान राजधानी दिल्ली के बीचों-बीच बीकानेर हाउस में एक प्रदर्शनी लगी, जिसनेदेश बंटवारे के दर्द को ताजा कर दिया। 9 से 24 अगस्त तक चली इस प्रदर्शनी को ‘1947 आर्काइव‘ शीर्षक से लगाया गया था। प्रदर्शनी मेंकुछ वैसे सामान रखे गए थे, जिसे बंटवारे के वक्त आम लोगों ने इस्तेमाल किया था। प्रदर्शनी में एक छोटी छुरी रखी दिखी। उसके साथ एक पर्ची में जो लिखा है, उसके अनुसार छुरीभाग मल्होत्रा नामक व्यक्ति की है। बंटवारे के समय हुए साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान सुरक्षा केलिहाज से मल्होत्रा ने उस छुरी को अपने साथ रखा था। कहा जाता है कि ऐसे लोगों की संख्या काफी थी, जो हिंसा और भय के वातावरण में अपने पासयथासंभव धारदार हथियार रखने को विवश थे, ताकि मुश्किल घड़ी में परिवार और स्वयं की रक्षा करसकें। मुल्क के बंटवारे से प्रभावित लोगों से बातचीत कर बनी डॉक्यूमेंट्री भी यहां दिखाई गई। बीकानेर हाउस के एक खूबसूरत कक्ष में प्रदर्शनी लगी थी, जो कक्ष प्रवेश करते ही बंटवारे के दर्द का आभास करा रही थी। उस छुरी के साथ ही धातु से बनी यह सीटी रखी है। वह नंद किशोर निजवान की है। निजवानस्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश सेना में शामिल थे। बंटवारे के वक्त वे इस सीटी को अपने साथ भारत लेकरआए थे। देश बंटवारे के वक्त निजवान 19 साल के थे। मुल्क के बंटवारे से प्रभावित लोगों से बातचीत कर बनी डॉक्यूमेंट्री भी यहां दिखाई गई।बीकानेरहाउस के एक खूबसूरत कक्ष में प्रदर्शनी लगी थी, जो कक्ष प्रवेश करते ही बंटवारे के दर्द का आभासकरा रही थी। 70 साल पहले जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ था तो देश का बंटवारा भी हो गया। एक नए देश बना– पाकिस्तान। भारत और पाकिस्तान की सीमाओं की घोषणा स्वतंत्रता के दो दिन बाद 17 अगस्त कोहुई। अफरातफरी और हिंसा के बीच लाखों जिंदगियां तबाह हुई। काफी कम अंतराल में करोड़ों लोगसीमा के आर–पार आए और गए। उस दौरान जो घटनाएं हुईं ‘1947 आर्काइव‘ ने प्रदर्शनी के जरिएउस स्मृति को जिंदा किया है। इसकी वजह यही है कि समय के साथ वो स्मृतियां धुंधली पड़ती जा रही थी। जिस पीढ़ी ने बंटवारे कोदेखा और भोगा है, वह तेज़ी से खत्म हो रही है। उनके साथ उनकी यादें भी, लेकिन उनकी स्मृतियोंको उनकी ही आवाज में संरक्षित करने की कोशिश सराहनीय है। प्रदर्शनी में दर्द का इतिहास तो हैही, लेकिन मानवता के भी खुश खूबसूरत पल सुनने को मिलते हैं। यहां पत्थर और लकड़ी से बना यह मूसल रखा है, जो इसर दास निजवान का है। वे इसे पाकिस्तान केशहर डेरा गाजी खान से रोहतक ले आए थे। इसर दास निजवान एक हकीम थे और इस मूसल कीमदद से दवाइयां पीसने का काम करते थे। उसी तरह इंद्र प्रकाश पोपली का रिफ्यूजी पहचान पत्र भीरखा दिखाई देता है। उस पत्र के अनुसार पोपली का जन्म मुल्तान में हुआ था। विभाजन के दौरान वेदिल्ली चले आए। ऐसी कई ऐतिहासिक महत्व की चीजें बीकानेर हाउस में प्रदर्शित थीं। वहां लगी मानचित्र को देखकरकोई भी अनुमान लगा सकता था कि बंटवारे ने देश के हर कोने को प्रभावित किया। दिल्ली औरलाहौर के बीच आने–जाने वालों का तो कोई हिसाब ही नहीं है।

पोर्नोग्राफी की दुनिया में खोता बचपन

बढ़ती तकनीक के इस दौर में बच्चों को उसके दुष्प्रभावों से बचाने का सवाल समाज औरदेश के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। 127 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 100 करोड़ से अधिक मोबाइल फोन तथा स्कूलों में इंटरनेट से जुड़कर बच्चे अब जल्दी बड़े होरहे हैं। इसकी गंभीरता को विचारक के.एन. गोविंदाचार्य ने पांच वर्ष पहले ही समझ लिया था और सरकार से इंटरनेट के कानूनों का कड़ाई से पालन कराने की मांग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। भारत में कॉन्ट्रैक्ट एक्ट कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ सोशल मीडियाकंपनियों द्वारा किए गए अनुबंध गैर–कानूनी हैं। अमेरिका में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे कानून केअनुसार सोशल मीडिया जैसे– फेसबुक, यू–ट्यूब इत्यादि से जुड़ नहीं सकते और 13-18 उम्र केबच्चे माता–पिता के माध्यम से ही सोशल मीडिया से जुड़ सकते हैं। इन नियमों का सोशल मीडिया कंपनियों के अनुबंध में भी उल्लेख रहता है, जिन्हें केन्द्र सरकार नेदिल्ली उच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर भारत में भी मान्यता दे दी। गोविंदाचार्य मामले में बच्चोंको साइबर संसार में सुरक्षा देने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को अनेक आदेश दिए थे, जिन्हें लागू करने में पूर्ववर्ती संप्रग और वर्तमान राजग सरकार पूर्णत: विफल रही हैं। भारत में स्मार्ट फोन और मोबाइल से 25 करोड़ लोग एडल्ट कंटेन्ट देखते हैं, जो डिजिटल इंडिया में सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है। सोशल मीडिया कंपनियां अपना कारोबार और लाभ बढ़ाने के लिए छोटे बच्चों को गलत जन्म तारीखके विवरण के माध्यम से फर्जी अकाउंट बनाने की खुली छूट देती हैं। इस बात के सबूत बीबीसी औरटीसीएस के सर्वे में मिलता है, जिसके अनुसार 10 से 12 वर्ष के तीन चौथाई बच्चे तथा 13 से 18 के96 फीसदी बच्चे सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं। स्कूलों में पढ़ाई का अजब तरीका बन गया है, जहां शिक्षकों द्वारा बच्चों को इंटरनेट से होम–वर्ककरने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे बच्चों की पढ़ने की क्षमता के साथ मस्तिष्क के क्रियाशीलविकास को काफी क्षति पहुंचती है। एसोचम की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार सोशल मीडिया केअधिक इस्तेमाल से बच्चों में खेल–कूद के साथ पढ़ाई में एकाग्रता की कमी, खराब खान–पान कीप्रवृत्ति और अवसाद के मामलों में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अलावा सोशल मीडिया में फेक–न्यूज सेएक भारत और इसके दुष्प्रभावों से श्रेष्ठ भारत का सपना भी दरक रहा है।    इंटरनेट के वहशी बाजार में बच्चों का नग्नता तथा अश्लीलता के लिए बढ़ता इस्तेमाल सोचनीय है।डिजीटल इंडिया के दौर में इंटरनेट तथा मोबाइल कनेक्टविटी के विस्तार के साथ बच्चों को पोर्नोग्राफी के खतरे से बचाने की जिम्मेदारी भी तो केन्द्र सरकार की है। पोर्नोग्राफी रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले चार वर्षों में अनेक निर्देशों के पालन में विफलतासे, कानूनों की लचरता के साथ सरकार की निरीहता भी स्पष्ट हो रही है। इंटरनेट के मामलों में केन्द्रसरकार ही प्रभावी कार्यवाही कर सकती है, पर पोर्न वेबसाइटस को रोकने में सरकार पूर्णत: विफल रही। गैर- कानूनी होने के बावजूद पोर्नोग्राफी का विस्तार इस बात से जाहिर है कि पोर्न स्टार रही सनी लियोनी गूगल में सर्वाधिक सर्च होने की वजह से भारत की सबसे चर्चित सेलिब्रिटी हैं। विदेशों में यौन पिपासु लोगों द्वारा बच्चों का पोर्नोग्राफी के लिए इस्तेमाल होता है, जो भारतीय कानूनके अनुसार पूर्ण   प्रतिबंधित है। भारत में आईपीसी, आईटी एक्ट तथा अन्य कानूनों के अनुसार पोर्नोग्राफिक साहित्य या वीडियो का निर्माण, प्रकाशन तथा प्रसारण गैर–कानूनी है। बच्चों की सुरक्षा के लिए पास्को जैसा सख्त कानून होनेके साथ पोर्नोग्राफी के लिए पांच साल की सजा और दस लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके बावजूद भारतीय बाजार में 20 लाख से अधिक वीडियो तथा अनेक वेबसाइट्स के माध्यम सेपोर्नोग्राफी की सहज उपलब्धता से बच्चों का जीवन नर्क बन रहा है। आंकड़ों के अनुसार बलात्कारतथा टीन प्रेग्नेंसी की संख्या में वृद्धि का बड़ा कारण अश्लील वीडियो का बढ़ता चलन है। पोर्नोग्राफी का निर्माण और प्रसारण ही गैर–कानूनी है, जिसे रोकने में सरकार विफल रही तो फिरपोर्नोग्राफी देखने को ही अपराध बनाने की बेतुकी मांग की जाने लगी। पोर्नोग्राफी बनाने तथा वितरणके खिलाफ कानून का पालन कराने में सरकार विफल रही तो फिर पोर्नोग्राफी देखने के विरुद्ध यदिकानून बन भी जाए तो उसका पालन कौन सी सरकारी मशीनरी कराएगी? सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके पहले भी इंटरनेट कंपनियों को लिंग जांच संबंधी विज्ञापन रोकने के आदेश दिए गए थे, पर उनका पालन अभी तक सुनिश्चित नहीं हो सका है। संता–बंता जैसे आपत्तिजनक चुटकुलों को इंटरनेट में रोकने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं ले पाई, क्योंकि सरकारके पास इंटरनेट के नियमन के लिए तकनीक और इच्छाशक्ति का अभाव है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह बताया कि बाल पोर्नोग्राफी के मुद्दे से निपटने के लिए समग्र कदमों के तहत पिछले महीने 3,500 बेवसाइट्स को ब्लॉक किया गया। सरकार को यह भी बताना चाहिए किब्लॉक की गई बेवसाइट्स नए तरीके से कैसे फिर बाजार में आ गई और यू–ट्यूब जैसे चैनलों में पोर्नोग्राफी कितनी आसानी से उपलब्ध है? पोर्नोग्राफी बच्चे और बड़े सभी के लिए गैर–कानूनी है।फिर ऐसी सभी बेवसाइट्स पर सख्ती से प्रतिबन्ध लगाने की बजाए, सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट मेंमामले को बेवजह भटकाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने स्टेट्स रिपोर्ट दायर करके बताया कि भारत में पोर्नोग्राफी पर लगाम लगानेके लिए अमेरिका स्थित एक निजी संस्था की मदद ली जा रही है। हकीकत यह है कि अमेरिकी संस्थानेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एण्ड एक्स्प्लॉयटिड चिल्ड्रन (एनसीएमईसी) लापता और पीडि़त बच्चों केबारे में 99 देशों की कानून परिवर्तन एजेंसियों को नि:शुल्क जानकारी देती है, जिसके साथ सीबीआईपिछले पांच वर्षों में अभी तक ठोस सम्पर्क ही नहीं कर पाई। केन्द्र सरकार की तरफ से पेश एएसजी ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि स्कूल की बसों में जैमर लगानासंभव नहीं है, परन्तु स्कूलों में सीबीएसई द्वारा जैमर लगाने पर विचार किया जा रहा है। आईटी एक्टतथा 2011 में बनाए गए नियमों के अनुसार पोर्नोग्राफिक कंटेंट तथा वेबसाइट्स को रोकने कीजवाबदेही इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (आईएसपी) की है, जिन्हें कानूनी भाषा में इंटरमीडियरी कहाजाता है। टीवी तथा अखबार में आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण के लिए संपादक की जवाबदेही का कानून है। सेंसर बोर्ड के पुराने कानूनों का पालन करके फिल्मों में गालियां रोकने का हास्यास्पद प्रयास हो रहा है। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट कंपनियों के नियमन में सरकार पूर्णत: विफल हो रही है। सरकार द्वारा यदि आईएसपी को पोर्नोग्राफी वेबसाइटों का प्रसारण रोकने का आदेश दिया जाए, तोस्कूल और बसों में जैमर लगाने की जरूरत क्यों पड़ेगी?  इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स खरबों का कारोबार कर रहे हैं, जिनसे नियमों का पालन कराने की बजाएसरकार द्वारा ऑनलाइन चाइल्ड एब्यूज के एडवांस सॉफ्टवेयर बनाने का दावा किया जा रहा है। स्कूलोंके 100 मीटर के दायरे में तंबाकू, गुटखा और सिगरेट बेचने पर प्रतिबंध है। महाराष्ट्र में स्कूल केकैंटीनों में जंग–फूड की बिक्री पर प्रतिबंध है। दरअसल इन अध–कचरे प्रतिबंधों से भ्रष्टाचार, पोर्नोग्राफी का गैर–कानूनी कारोबार के साथ चीन मेंबने सीसीटीवी एवं जैमर आदि का कारोबार बढ़ जाता है। अश्लील वीडियो यदि गैर–कानूनी है तोउन्हें सिर्फ बच्चों के ग्रुप में देखने से कैसे रोका जा सकता है। यदि पोर्नोग्राफी इंटरनेट में उपलब्ध हैतो बच्चों को घर या अन्य स्थानों में पोर्नोग्राफी देखने से कैसे रोका जा सकेगा? बच्चों को इस खतरे सेकैसे बचाया जाए, जबकि बड़े अफसर तथा माननीय भी विधान मण्डल में पोर्नोग्राफी देखते हुए पकड़े गए हैं! नवीनतम सर्वे के अनुसार मुंबई मेट्रो में फ्री वाई–फाई सुविधा का पोर्न देखने के लिए बहुतायत में इस्तेमाल होता है। एक अन्य सर्वे के अनुसार देश के सार्वजनिक स्थानों में उपलब्ध फ्री वाई–फाईसुविधा का हर तीन में एक व्यक्ति नग्नता देखने के लिए इस्तेमाल करता है। सरकारी दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों के कंप्यूटरों में पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स को चलाना गैरकानूनी है, जिन्हें ब्लॉक करके देश मेंबेहतर कार्य संस्कृति की शुरुआत क्यों नहीं की जाती? टीवी तथा अखबार में आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण के लिए संपादक की जवाबदेही का कानून है।सेंसर बोर्ड के पुराने कानूनों का पालन करके फिल्मों में गालियां रोकने का हास्यास्पद प्रयास हो रहा है। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट कंपनियों के नियमन में सरकार पूर्णत: विफल हो रही है। दरअसल, अश्लील वीडियोज और पोर्नोग्राफी का खरबों डॉलर का विश्व बाजार है, जिसकी खपत केमामले में भारत की  पांचवी रैंक है। एक अनुमान के अनुसार भारत में स्मार्ट फोन और मोबाइल से 25 करोड़ लोग एडल्ट कंटेन्ट देखते हैं, जो डिजिटल   इंडिया में सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है। इंटरनेट में पोर्नोग्राफी को रोकने से देश की टेलीकॉम कंपनियों द्वारा डेटा बिक्री से आमदनी में 30 से70 फीसदी तक की कमी हो जाएगी। कानून के अनुसार सरकार द्वारा इन बेवसाइट्स को यदि बंद कर दिया गया तो खरबों डॉलर का गैर–कानूनी कारोबार ठप्प हो जाएगा। ध्यान रहे कि छोटे–मोटे सटोरियों के खिलाफ कार्रवाई होती है, पर खरबों डॉलर के पोर्नोग्राफी व्यापार को रोकने में रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय समेत सभी सुरक्षा एजेंसियां विफल हो रही हैं। भारत में छोटे–बड़े सभी व्यापारी जीएसटी के दायरे में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए विवश हैं। भारत में व्यापार कर रहीइंटरनेट कंपनियों और वेबसाइट्स का जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता का नियम   यदि बन जाए, तो पोर्नोग्राफी के गैर–कानूनी तन्त्र की कमर ही टूट जाएगी। सेंसर बोर्ड के कट पर हल्ला बोलने वाले देश में इंटरनेट के पोर्नोग्राफिक संसार पर बवाल क्यों नहीं होता? भारत में   इंटरनेट के विस्तार के साथ सरकार अपनी जवाबदेही निभाने में विफल रही है, परबच्चों के चरित्र का कानून से ही नियमन भी तो संभव नहीं है। इस बारे में अध्यापकों और अभिभावकों को भी अपनी जवाबदेही निभाने के साथ सामाजिक जागरुकता बढ़ानी होगी। इंटरनेट सूचना ज्ञान का महासागर है, जिसमें नग्नता की गन्दगी के अनेक द्वीपों में समाज रम रहा है।कंपनियों के बड़े मुनाफे की वजह से इस नग्नता और उसके दुष्प्रभावों से सरकार आंख मूंद रही है।फिर सुप्रीम कोर्ट के अजब गजब आदेश बच्चों को पोर्नोग्राफी की रंगीन दुनिया में जाने से कैसे रोक सकेंगे?

खुद से संघर्ष करता यहूदी समाज

यहूदी हजारों साल से भारत में रहते आ रहे हैं। हमें कभी यहां के लोगों के जुल्मों का सामना नहीं करना पड़ा। हम खुद...

यहां हो रहा गांधी के सपनों से खिलवाड़

अब बिहार विद्यापीठ का केवल नाम रह गया है। यहां न कोई शिक्षक है, न छात्र। महात्मा गांधी ने स्वावलंबन के जो सपने देखे...
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