व्याघ्र पथिक कथा

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संस्कृत साहित्य की एक मशहूर नीतिपरक कथा है। किसी वन में एक बूढ़ा बाघ रहता था। शरीर इतना शिथिल हो चुका था कि अब वह शिकार का पीछा करके उसे पकड़ने में पूरी तरह असमर्थ था।

काफी सोच-विचार के बाद उसने एक युक्ति निकाली। बूढ़ा बाघ तपस्वी के वेश में एक ऐसे चबूतरे पर जा बैठा जिसके चारों तरफ दलदल था। उसके पास एक सोने का कंगन था, जिसे संभवत: उसने किसी औरत का आखेट करने के बाद प्राप्त किया था।

बाघ को तपस्वी रूप में देखकर आसपास से गुजर रहे यात्री अचरज करते थे। बाघ उन्हे बताता था- मैं एक संन्यासी हूं। पहले मैंने बहुत पाप किये हैं, इसलिए मेरे सारे नाखून और दांत गिर गए हैं। अब मैं अपने कर्मों का प्रायश्चित कर रहा हूं।

प्रभु के भजन गाता हूं, चंद्रायण और एकादशी  के व्रत करता हूं। पूरी तरह शाकाहारी हूं। मेरे पास एक बेशकीमती कंगन है, इसे मैं दान करूंगा तभी मुझे इस नश्वर शरीर से मुक्ति मिलेगी।

कंगन देखकर यात्रियों का जी ललचाता था, फिर उन्हें ख्याल आता था कि भले तपस्वी वेश में हो लेकिन आखिर यह है तो एक बाघ। इसलिए वे चुपचाप अपनी राह निकल जाते थे।

“सरकार जिन बाघों को बचाना चाहती है, वे बेचारे तो वन में रहने वाले निरीह प्राणी हैं, जिन्हें खाल और हड्डियों के लिए इंसान मार डालते हैं।”

लेकिन एक यात्री बाघ की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गया। वह कंगन लेने के लिए आगे बढ़ा, दलदल में जा फंसा और बाघ उसे मारकर खा गया।

महान कथाएं कभी नहीं बदलतीं। केवल समय बदलता है और कथाओं के पात्र बदलते हैं। बूढ़ा बाघ अब भी जीवित है। कंगन लिये ना जाने कितने आश्रम और मठों में बैठा है। उसके मुखमंडल पर तेज है और चारो तरफ दिव्य प्रकाश है।

वह लोक ही नहीं बल्कि परलोक सुधारने का दावा करता है। कन्याओं के कल्याण में उसे विशेषज्ञता प्राप्त है। वह चिकनी-चुपड़ी बातों में फंसाकर उन्हें अपने निकट बुलाता है और फिर वही करता है, जो उस ‘तपस्वी बाघ’ ने पथिक के साथ किया था।

नए जमाने के तपस्वी बाघ के कई नाम हैं। कभी वह आसाराम है, तो कभी राम रहीम है। कुछ लोग उसे दाती महाराज के नाम से भी बुलाते हैं। बाघ कंदराओं में नहीं बल्कि फाइव स्टार आश्रम में रहता है।

उसकी पाश्विक प्रवृतियां उसे कई बार कृत्रिम गुफा बनाने को प्रेरित करती हैं, जैसा राम-रहीम ने बनाया था। गुफा में वह आराम से बैठा रहता है और बाहर मंडरा रही सेवक-सेविकाओं की फौज उसके लिए शिकार फंसाकर लाती हैं।

बूढ़ा बाघ शिकार करता है और फिर टीवी पर आकर अहिंसा परमो धर्म का प्रवचन देता है। अखिल विश्व के कल्याण के लिए यज्ञ करवाता है। युवा पीढ़ी को वह  नैतिकता का पाठ पढ़ाता है।

“आश्रमों में रहने वाले बूढ़े बाघ तो लगातार फल-फूल रहे हैं। एक को अगर जेल हो भी गई तो उसकी जगह कोई नया आ जाता है। वैसे बूढ़े बाघ सिर्फ आश्रमों में नहीं बल्कि हर जगह हैं।”

दुनिया जयजयकार करती है। धन्ना सेठ उसके लिए अपनी तिजोरी खोल देते हैं और नेता चरणों में शीश नवाकर फोटो खिंचवाते हैं। सरकार कहती है- बाघों की तादाद घट रही है। उनके संरक्षण के लिए योजनाएं चलाये जाने की जरूरत है।

लेकिन सरकार जिन बाघों को बचाना चाहती है, वे बेचारे तो वन में रहने वाले निरीह प्राणी हैं, जिन्हें खाल और हड्डियों के लिए इंसान मार डालते हैं।

आश्रमों में रहने वाले बूढ़े बाघ तो लगातार फल-फूल रहे हैं। एक को अगर जेल हो भी गई तो उसकी जगह कोई नया आ जाता है। वैसे बूढ़े बाघ सिर्फ आश्रमों में नहीं बल्कि हर जगह हैं।

वे कॉरपोरेट ऑफिस के अपने केबिन में विराजमान हैं। राजनीतिक दलों में वे ऊंचे ओहदों पर हैं। बॉलीवुड में प्रोड्यूसर और डायरेक्टर हैं। इतना ही नहीं कुछ जगहों पर तो वे तेजपाल की तरह संपादक की कुर्सी पर भी आसीन हैं।

सबके हाथ में चमकते कंगन हैं। वे कंगन दिखा रहे हैं, खुद को नख-दंत विहीन बता रहे हैं। फुसला रहे हैं, भरमा रहे हैं और फिर दलदल में फंसाकर दबोच रहे हैं।

परिवार चिंतित है, समाज चिंतित है। लेकिन नरभक्षी बूढ़े बाघों की कारगुजारियां थम नहीं रही हैं। क्या सिर्फ बाघों को दोष देने से सब ठीक हो जाएगा। कड़वा यथार्थ यह भी है कि जब तक कंगन का लोभ बना रहेगा, तब तक यह आखेट जारी रहेगा।

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