रामजी राष्ट्रवादी शिवजी सेक्यूलर

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भूलोक का सबसे बड़ा चुनाव 2019 में आ रहा है। इसकी हलचल देवलोक तक है। तुच्छ मानवीय इच्छा, कामना, तृष्णा लोभ-लाभ इनसे देवी-देवताओं का क्या काम! लेकिन मानव जाति के लिए इस चुनावी रण में देवी-देवता बहुत काम के हैं। ईश्वर चाहे ना चाहे उन्हे मृत्युलोक के चुनावी समर में कूदना ही पड़ता है। देवताओं को पता भी नहीं चलता और पार्टियां उनके साथ अपने चुनाव पूर्व गठबंधन का एलान कर देती हैं। भगवान राम के साथ बीजेपी का चुनाव पूर्व गठबंधन शिवसेना के साथ हुए गठबंधन से भी ज्यादा पुराना है। इस गठबंधन का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम भव्य राम मंदिर है। 2014 में सरकार बन गई लेकिन मंदिर नहीं बना। पार्टी के कुछ लोग कह रहे हैं— भगवान तो हमारे मन मंदिर में है, मंदिर का क्या है, आज नहीं तो कल बन ही जाएगा। शुक्र है भगवान राम उद्धव ठाकरे नहीं हैं। इसलिए गठबंधन 2019 में भी कायम रहेगा। वैसे गठबंधन की शर्तों में थोड़ा बदलाव आया है।

बीजेपी के कई नेताओं ने कह दिया है— प्रभु इस बार आप स्टार कैंपेनर होंगे। एक और परिवर्तन यह आया कि मर्यादा पुरुषोत्तम क्रोधित हो गये हैं। उनके अनन्य भक्त हनुमान जी भी आजकल मूर्तियों और कार पर लगी स्टिकरों में क्रोधित दिखाई दे रहे हैं। वाल्मीकि भी राम-हनुमान को इस रूप में देखकर चकित होते। लेकिन नारद जी समझ जाते—भूलोक के चुनाव में सबकुछ संभव है। नारायण-नारायण! शिवजी को भी इस बार भूलोक के चुनावी गठबंधन में शामिल होना पड़ा है। वे जनेऊधारी पंडित राहुल गांधी के सेक्यूलर एलायंस में हैं। गठबंधन की घोषणा करते वक्त कांग्रेस ने भी उनसे पूछने तक की जÞरूरत नहीं समझी । राहुल गांधी ने जगह-जगह नारियल फोड़े और गठबंधन का एलान कर दिया। उसके बाद सीधे पहुंच गये कैलाश पर्वत। शिवजी ने अप्वाइंटमेंट दिया या नहीं, यह पता नहीं लेकिन कांग्रेस ने दावा कर दिया। प्रोग्रेसिव और सेक्यूलर एलायंस में आकर भोलेनाथ प्रसन्न हैं।

यह सच है कि शिवजी शाश्वत सेक्यूलर हैं। वरदान देने के मामले में देव-दानवों में कभी भेद नहीं किया। सांप तक को अपने गले का हार बनाया। लुटी-पिटी कांग्रेस यही सोचकर शिवजी के द्वार पर गई होगी। जब भस्मासुर को वरदान दिया तो हमारे राहुल भइया में क्या खराबी है! खराबी किसी में नहीं है, बस राजनीति में है। देवी-देवता भी मृत्युलोक में मची कुर्सी की माया देखकर अपना सिर पीटते होंगे। किसी ने ढोल-ताशे और नगाड़े बजाकर भारत माता का जीना दूभर कर रखा है। कोई मर्यादा पुरुषोत्तम को मर्यादा विहीन राजनीति में घसीट रहा है तो कोई कैलाश पर धूमी रमाये बैठे शिव को जÞबरदस्ती अपने कैंपेन में उतारने पर आमादा है। गीता का ज्ञान देने वाले कृष्ण शांत भाव से सबकुछ देखकर मुस्कुरा रहे होंगे। कौरव-पांडवों ने अपने महाभारत के दौरान उन्हें इतना पकाया कि उन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीति में पड़ने से तौबा कर ली होगी। सबकुछ तो गीता में लिख दिया है, जिसे पढ़ना आये, वह पढ़ ले और समझ सके तो समझ ले। पार्टियों के पोस्टर और नेताओं की सार्वजनिक पूजा में दिखाई देनेवाले देवता ही चुनावी समर का हिस्सा नहीं बनते। कुछ देवी देवता ऐसे होते हैं, नेतागण जिनका गुपचुप आशीर्वाद चाहते हैं।

माता बगलामुखी का नाम इनमें सर्वोपरि है। शत्रुओं का नाश करने वाली सिद्धिदात्री देवी हैं, माता बगलामुखी। चुनावी माहौल में बगलामुखी अनुष्ठान करने वाले पंडित आसानी से नहीं मिलते हैं और ना जाने कितने ‘बगुला भगत’ इस अनुष्ठान के नाम पर नेताओं को ठग लेते हैं। टिकट पक्का करवाने का अनुष्ठान, टिकट पक्का हो गया तो चुनाव जिताने का अनुष्ठान। अगर फल गया तो पंडितजी की चांदी, नहीं फला तो हरि इच्छा। आशीर्वाद देऊ बाबाओं की भी खूब डिमांड रहती है। हालांकि आसाराम, राम-रहीम और रामपाल जैसे सिद्ध पुरुषों के अंदर होने के बाद से नेता इनसे डरने लगे हैं। आज मंच शेयर किया और कल कोई हत्या या बलात्कार में अंदर हो गया तो क्या होगा? लेकिन चुनावी मौसम में नेता ऐसे रिस्क लेने को तैयार होते हैं। भगवान राम और शिव अपनी तरफ से वोट दिलाने की गारंटी नहीं देते लेकिन बाबा लोग देते हैं। बिहार चुनाव के दौरान नीतीश कुमार का एक वीडियो आया था, जिसमें अघोरी किस्म के एक बाबा उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं और लालू यादव के नाश की कामना कर रहे हैं। बाबाजी का आशीर्वाद सुशासन बाबू को फल गया। देवराहा बाबा आशीर्वाद स्वरूप नेताओं को लात मारते थे। अब वे ब्रहलीन हैं। लेकिन वोट की खातिर लात खाने के लिए ना जाने कितने तैयार बैठे हैं। कोई ना कोई बाबा आ ही जाएगा। जहां डिमांड है, वहां सप्लाई भला क्यों नहीं होगी।

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