मौसाजी स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट

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नोएडा में एक बेहद भीड़-भाड़ वाला इंडस्ट्रियल सेक्टर है। सड़क पर गाडि़यों का रेला है। सड़क के उस पार एक बड़ा सा नाला है, जिससे लगती हुई एक गली है। गली के मुहाने पर जो छह मंजिला चमचमाती हुई इमारत है, उसमें देश की प्रतिष्ठित भुजिया कंपनी का कॉरपोरेट आॅफिस है। लिμट पांचवी मंजिल पर पहुंचती है। दरवाजा खुलता है। सामने दर्जनों वर्क स्टेशन हैं। वर्क स्टेशनों की कतार के आगे सीईओ, सीएफओ, जीएम और लीगल हेड वगैरह के केबिन आते हैं। जहां सारे केबिन खत्म हो जाते हैं, असली सत्ता उसके बाद शुरू होती है। μलोर के आखिरी हिस्से में एक बहुत बड़ा कमरा है, जिसकी दीवार पर लक्ष्मी जी की तस्वीर लगी है। सामने टेबल पर पाचक की तरह-तरह की गोलियों की कई शीशियां रखी हैं। शीशियों के उस पार शीश उठाये और तिलक लगाये जो विराजमान हैं, वही मौसाजी हैं। मौसाजी आखिर किसके मौसा हैं? चेयरमैन के, चेयरमैन के पिताजी के, कंपनी के या फिर संपूर्ण भुजिया इंडस्ट्री के? यह एक ऐसा सवाल है, जो अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति में पूछा जा सकता है। लेकिन पूछा जाता है, बिल्डिंग के ठीक नीचे मौजूद चाय के खोखे पर। जवाब सबको पता होता है।

फिर भी कंपनी के कर्मचारियों के लिए यह सवाल एक तरह का टाइम पास है। सब जानते हैं कि मौसाजी तमाम सवालों के उत्तर हैं और खुद हर तरह के सवाल से परे हैं। पारिवारिक स्वामित्व वाले कारोबार में ज्यादा से ज्यादा मामाजी या चाचाजी जैसे दबंग किरदार होते हैं। मौसाजी ने अगर इस ट्रेंड को तोड़ते हुए संपूर्ण मौसा बिरादरी का नाम रौशन किया है तो जरूर उनमें कोई खास बात होगी। मौसाजी को आज से पैंतीस साल पहले उनकी साली साहिबा के साहबजादे अर्थात कंपनी के संस्थापक राजस्थान के झुंझनू जिले से इंपोर्ट करके लाये थे। उनके आते ही किस्मत ने पलटा खाया और उनका रीटेलर भांजा देखते-देखते भुजिया किंग बन गया। देशभर में माल की सप्लाई होने लगी। मौसाजी कंपनी के लकी चैम बन गये। कंपनी के आगे बढ़ने में किस्मत ही नहीं बल्कि मौसाजी की प्रतिभा का भी भरपूर योगदान था। हिसाब बनाने, हिसाब मिटाने और हिसाब करने में माहिर हैं मौसाजी। मालिक को पता है कि मौसाजी के होते हुए कोई भी कंपनी से एक पाई फालतू नहीं ले सकता है और ना कामचोरी कर सकता है। मौसाजी हिसाब इतना पक्का बनाते हैं कि बड़े-बड़े चार्टड एकाउंटेंट के भी पसीने छूट जायें। कंपनी में अब किस्म-किस्म के एकाउंटिंग सॉμटवेयर आ गये हैं। लेकिन मौसाजी के शुभ-लाभ वाले बही खाते में जो समानांतर हिसाब चलता है, वही कंपनी का असली हिसाब है। बहुत वक्त बीत चुका है। संस्थापक जी अब अपने बड़े बेटे को उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं।

बेटे के दो सपने हैं, इंटरनेशनल ब्राँड बनना और पब्लिक इश्यू लाना। इसके लिए वह वर्क कल्चर बदलना चाहता है। लेकिन मौसाजी बीच में दीवार बनकर खड़े हैं। अपने पिता और शेषनाग की तरह कंपनी को सिर पर उठाये मौसाजी की आशंकाओं को दर-किनार करता हुआ उत्तराधिकारी अपनी कंपनी के लिए एक अदद सीईओ ढूंढ लाया है। सीईओ अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध वॉटर्न बिजनेस स्कूल से दीक्षित है और सिंगापुर की एक कंपनी में उच्च पद पर रह चुका है। लेकिन उसकी कुंडली के भाग्य स्थान पर शायद भुजिया रखा था। सीईओ ने आते ही छोटे मालिक की मर्जी के मुताबिक काम शुरू किया। आॅफिस में कार्ड स्वाइपिंग मशीन लगवाई। एक शानदार सा कैफेटेरिया बनवाया। साथ ही टीटी और बिलियर्ड टेबल वगैरह रखवा दिये, ताकि कंपनी आधुनिक दिखे और पॉजेटिव एनवायरमेंट क्रियेट हो। नया सीईओ टॉप μलोर पर जिम भी बनवाने जा रहा था। बात मौसाजी के कानों तक पहुँची तो उन्होंने फौरन उसे तलब किया और प्यार से समझाया कि देखो लल्ला तुम जितना वेतन लेते हो, उतने में तो महीने भर का कच्चा माल आ जाये। उपर से इतनी फिजूलखर्ची करोगे तो कैसे चलेगा। अगर कुछ करना ही चाहते हो ऐसा करो जिससे कंपनी का मुनाफा बढ़े। गर्म खून वाला सीईओ बिलबिलाता हुआ अपने नियोक्ता के पास पहुंचा।

छोटे मालिक हंसकर बोले— इतना इमोशनल होने की क्या जरूरत है। उनकी बात सुनो लेकिन करो वही जो तुम्हे करना है। लेकिन सीईओ की समझ में आ गया है कि जो करना है, वह असल में मौसाजी को करना है। उसके किये कुछ होता नहीं है। फिर वह लगा रहा। नया सीईओ महीनों तक बैठकर एचआर पॉलिसी, प्रोक्यरमेंट पॉलिसी और सेक्सुअल हैरसमेंट पॉलिसी बनाता रहा है और मौसाजी माथा ठोकते रहे। एक दिन उसने बड़े अधिकारियों की मीटिंग की और काम के तौर- तरीकों के बदलाव का प्रेजेंटेशन पेश किया। सारे अधिकारियों ने ताली बजाई। हμते भर बाद उसने मेल लिखकर पूछा— अब किसी पॉलिसी पर अमल क्यों नहीं हो रहा है। अधिकारी एक-एक करके कमरे में आये। सबने कहा कि सारे प्लान तो अच्छे हैं लेकिन जरा एक बार मौसाजी से भी तो पूछ लें। सीईओ इस्तीफा लेकर सीधे चेयरमैन के पास पहुंचा। चेयरमैन ने उसकी काबिलियत की बहुत तारीफ की और फिर धीरे से बोले— तुम्हे कंपनी को आधुनिक बनाने के लिए लाया गया है। अपना काम करो। रोकेगा कोई नहीं, बस मौसाजी से एक बार पूछ लो। इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है। सीईओ रूँआसा होकर उठने लगा, तभी उसके कंधे पर किसी ने प्यार से हाथ रखा। उसने मुड़कर देख, पीछे खड़े मौसाजी कह रहे हैं— सीख जाओगे लल्ला धीरे-धीरे।

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