महापुरुषों की मंडी

0
70

महापुरुष इतिहास की कोख से निकलते हैं, यह एक सुंदर वाक्य है। महापुरुष संघर्ष की भट्टी में तपकर बनते हैं, यह एक ठोस तथ्य है। जब कर्म बड़े हो जायें तो साधारण व्यक्ति भी महामानव हो जाता है। यह एक शाश्वत सत्य है। सारी बातें बहुत अच्छी हैं, लेकिन प्रैक्टिकल नहीं हैं जो चीजÞ प्रैक्टिकल नहीं है, वह नये जमाने को पसंद नहीं है, चाहे वह कोर्ट का फैसला ही क्यों न हो? फिर आनेवाले दिनों में महापुरुषों का कोटा कैसे भरेगा? हर जमाने के अपने महापुरुष होते हैं। इस जमाने के नहीं हुए तो काम कैसे चलेगा? डिमांड और सप्लाई के बीच ज्यादा गैप होना ठीक नहीं है। चिंता न करें, महापुरुषों की अबाध सप्लाई सुनिश्चित करने के बहुत से प्रैक्टिकल रास्ते निकाले जा चुके हैं। महापुरुष अब इंस्टेंट नूडल की तरह तैयार किये जा रहे हैं। महापुरुष किसी भी प्रोडक्ट की तरह कस्टमाइज्ड हो रहे हैं।

रीचार्ज आॅप्शन वाले महापुरुष भी उपलब्ध हैं। चाइनीज माल जैसे महापुरुष भी हैं जिनके मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की तो कोई गारंटी नहीं है, लेकिन वे इतने लुभावने और अफोर्डेबल हैं कि किसी का भी दिल आ जाये। पुराने जमाने में महापुरुषों के बारे में प्रेरक बातें उनकी किसी पुरानी डायरी से ढूंढकर निकाली जाती थीं। पत्राचार भी महापुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का दस्तावेज हुआ करते थे। महान लोगों की डायरी के पन्ने और पत्राचार के अंश स्कूल में पढ़ाये जाते थे। अपने बेटे के शिक्षक को लिखा गया अब्राहम लिंकन का पत्र आज भी दुनिया भर में मशहूर है। महात्मा गांधी के न जाने कितने पत्र हमने कोर्स की किताबों में पढ़े हैं।

महापुरुष अपने बारे में फेसबुक और ट्विटर पर सब कुछ बता देते हैं। वह सब भी बता देते हैं, जो आप जानना नहीं चाहते। बिना मेक इन इंडिया और बिना स्किल इंडिया के फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर धड़ाधड़ रोजाना सैकड़ों महापुरुष पैदा हो रहे हैं और चाइनीज बैंबू की रμतार से बढ़ रहे हैं।

नया जमाना अलग है। डायरी छानने और पुराने पत्र ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। महापुरुष अपने बारे में फेसबुक और ट्विटर पर सब कुछ बता देते हैं। वह सब भी बता देते हैं, जो आप जानना नहीं चाहते। बिना मेक इन इंडिया और बिना स्किल इंडिया के फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर धड़ाधड़ रोजाना सैकड़ों महापुरुष पैदा हो रहे हैं और चाइनीज बैंबू की रμतार से बढ़ रहे हैं। लाइक, शेयर और रीट्वीट इन महापुरुषों का खाद-पानी है। तिजारती भाषा में कहें तो महापुरुषों की आवक आजकल बहुत अच्छी है।

एक बात यह भी सामने आई है कि महापुरुष बैक डेट से भी बनाये जा सकते हैं। मान लीजिये, आपके पास खूब पैसा है तो गुड़ की दलाली करने वाले आपके दादाजी महान स्वतंत्रता सेनानी बन सकते हैं और अनपढ़ नानाजी को मरणोपरांत सरस्वतीनंदन की उपाधि मिल सकती है। पहले यह धारणा थी, असली महापुरुष वह होता है, जिसे जनता बनाती है। लेकिन यह नया भारत है। अब महापुरुष को जनता नहीं बनाती है बल्कि जो जनता को बनाता है, वही सच्चा महापुरुष होता है। हर क्षेत्र, हर मत और हर विचारधारा के अपने-अपने महापुरुष हैं जो बैक डेट में एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। कुछ मामलों में समान विचारधारा वाले महापुरुष भी लड़ रहे हैं। मरे हुए महापुरुषों की लड़ाई का न्यूज चैनलों पर लाइव टेलीकास्ट हो रहा है और डब्लूडब्लूई फाइट की तरह सट्टा भी लग रहा है। पुराने महापुरुषों के बारे में आप जो चाहे कह सकते हैं। लेकिन नये वालों के बारे में कुछ भी बोलना खतरे से खाली नहीं है।

मान लीजिये, आपने धर्म- कर्म वाले किसी महापुरुष के सम्मान में वाकई कुछ कहा और वह अगले दिन जेल पहुंच गये तो? जिन नेताओं ने कभी अपनी मासूमियत में आसाराम बापू और बाबा राम-रहीम का आशीर्वाद लिया था, उनके लिए पुराने वीडियो गले की हड्डी बन गये हैं। राजनीति के महापुरुषों के बारे में कोई बात करना और ज्यादा जोखिम का काम है। अगर बात पसंद न आई तो अनुयायी और कार्यकर्ता सिर फोड़ने आ जाएंगे। अगर बात पसंद आई तो विरोधी कैंप वाले आपको भक्त, बिकाऊ और चमचा जैसे विशेषणों से सम्मानित करेंगे। इसलिए महानता के इस दौर में बिना कुछ कहे चुपचाप तमाशा देखना ही सबसे अच्छा काम है। महानता की मंडी दिनों-दिन बड़ी हो जाती रही है। वह वक्त भी आएगा जब डेढ़ अरब की तरफ बढ़ रहे देश में महापुरुष ही महापुरुष होंगे, आम आदमी ढूंढे से भी नहीं मिलेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here