मन का चोर

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सू रज का तेज, उसका उज्ज्वल रूप सांझ ढलते ही, हल्का भगवा रंग में रंगने को आतुर था। शीला और उसकी जेठानी नीलिमा बिस्तर के आलस्य से अभी एक घंटे पहले ही उबरी थीं। दोनों ही अपनी जिम्मेदारी शीघ्रता से निपटा रही थीं। असल में, इधर कमरे में जैसे ही पांच बजने का संगीत बजता तो उधर उसी समय दरवाजे की घंटी ‘साजन उस पार है’ गाना कानों में सुनाकर शहद घोल देती थी। आज तो शीला का बेटा बंटी अभी बिस्तर का मोह छोड़ नहीं पाया था कि दरवाजे की घंटी बजी। नीलिमा चौंकी, ‘अभी तो पांच नहीं बजे! तेरे जेठ को तो आने में अभी आधे घंटे है!’ ‘देखती हूं दीदी।’ ‘अरे रुक! मैं देखती हूं। कोई गांव का लग रहा है। तू बंटी का हाथ मुंह धुला दे जल्दी से।’ ‘काहे का भ भैया, सब ठीक त बा!!’ दरवाज़ा खोलते बोली। ‘नाही भौजी! कच्छु ठीक नाही बा।

उ तोहरे घरे के बगले जौन रामलखन हयेन न! ओनकर बेटवा खतम होई गवा। अच्छा चलत हई भौजी, भईया हरे आय जही ता भेजी देही रसूलाबाद घाट पर।’ उनके जाते ही फिर डोरबेल के साथ मधुर संगीत बजा। मन बेचैन था, अत: मधुरता कानों में न घुल पाई। दिमाग भी जवान बच्चे की मौत को सुनकर सुन्न हो चुका था। दरवाज़ा खोलते ही ताऊ! ताऊ ! करते हुए बंटी पहुंच गया। ‘बंटी ! जा मम्मा से कह दे, ताऊ के लिए चाय बना दे!’और ताऊ के लिए एक गिलास पानी तो लाकर दे। ताई ने बंटी से उदास स्वर में कहा। ‘क्या हुआ? कुछ बात हुई क्या?’ वह कुछ बोलती कि तभी सुरेश भी आ गया। लीजिए पानी-चाय पीजिए दोनों। ‘भाभी जोरों की भूख लगी है कुछ नाश्ता- वास्ता..! आज आॅफिस का कैंटीन बंद था, दिनभर से कुछ नहीं खाया हूं।’ दहलीज लांघते ही भाभी को देखकर सुरेश बोला। उसकी बात को भाभी अनसुना करके बोल पड़ी, ‘पुनीत शांत हो गया।’ ‘अरे!! कैसे, कब ?‘‘अभी! अभी ! रामखेलावन आकर यही खबर देके गए हैं।’ यह सुनते ही देवर की भूख तो जैसे हवा हो गयी। उससे चार-पांच साल ही तो छोटा था।

चाचा-भतीजा की खूब छनती थी। वह बबलू के साथ खेलता, लड़ाई होने पर उससे शिकायत करने आ जाता था। वह भी अक्सर ही बबलू का फेवर न करके उसका ही पक्ष लेता था। ‘कौन थे दीदी वो, किनकी मृत्यु हो गयी?’ अपने तीन साल के बच्चे को बिस्कुट पकड़ाती हुई शीला पूछ बैठी। ‘अपने घर के सामने जो घर है न उसी घर के। ससुर के चाचा के परिवार में से हैं। तू गांव में तो रही न कभी! देवर से पूछना उसके बारे में, वह सारी बात बतायेंगे तुम्हें। अरे मेरे बेटे बबलू का ही तो हमउम्र था वह। दोनों लड़ते-झगड़ते लेकिन साथ-साथ रहते थे। यूं समझ! दोनों की दांत काटे की रोटी थी।’ ‘दीदी, फिर बबलू को भी फोन करके खबर करवा दीजिये न।’ ‘अरे नहीं!! दूर की रिश्तेदारी है ! फालतू उसे काहे डिस्टर्ब किया जाय।’लापरवाही से बोली नीलिमा। बात चल ही रही थी कि दोनों भाई घाट से लौट आए। बाहर ही एक बाल्टी पानी रखकर नीलिमा बोली, ‘हाथ पैर धुल लीजिये दोनों।’ फिर तौलिया पकड़ाते हुए बोली, ‘मैं गंगाजल लाती हूं।’ अंदर आते ही उसकी नजर पानी चढ़े भगोने पर गयी। भौंवें तिरक्षी करती हुई बोली – ‘क्या कर रही है तू ?’ ‘कुछ न दीदी ! बस भूख लगी बंटी को, उसके लिए मैगी बनाने जा ही रही हूं। फिर बाद में खाना बनाती हूं।’ जेठानी ने टोका, ‘अरे जानती नहीं हो ! जवान भतीजे की मौत हुई है। ऐसी खबर सुनकर, उस दिन घर में आग नहीं जलाई जाती है। उसे दूध दे दो।’ ‘अच्छा दीदी, मुझे नहीं पता था।’ ‘अच्छा सुनो शीला! मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूं कुछ शांति मिलेगी, मन बेचैन हो उठा है।’ शाम ढल चुकी थी।

रात होने को अब उतावली थी। लेकिन गम घर से जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। शीला का पति मृत भतीजे की शैतानियां सुना-सुनाकर दुखी हुआ जा रहा था। तभी जेठ और जेठानी के हंसने-खिलखिलाने की आवाज सुनाई पड़ी। दरवाज़ा खोलते ही चेहरे पे उदासी लटकाए जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, ‘लो शीला! बड़ी मुश्किल से मिला, इसको काटकर सबको दे दो।’ शीला कभी सो गए अपने भूखे बच्चे को देखती तो कभी घड़ी की ओर। उसके हाव-भाव से नीलिमा समझ गयी कि उन्होंने आने में बड़ी देरी कर दी थी। माहौल को हल्का करने के उद्देश्य से वह बोली, ‘अरे जानती हो शीला, यमुना के किनारे बैठे-बैठे समय का पता ही नहीं चला।’ ‘हां दी! क्यों पता चलेगा! दुखों का पहाड़ जो टूट पड़ा है!’ शीला दुखी होकर व्यंग्यात्मक लहजे में बोली। ‘दीदी, साड़ी पर चटनी का दाग लग गया है। पानी ले आऊं! धुल लीजिये नहीं तो बिस्तर में चींटियां आयेंगी।’ सुनते ही नीलिमा का चेहरा फक्क पड़ गया। बोलीं , ‘इस बंटी ने गिरा दिया होगा। फ्रीज से चटनी निकालकर चाट रहा था बदमाश।’ ‘परन्तु दीदी, चटनी तो कल ही .. ’ ‘तू कुछ खाई कि नहीं! आ, ले आ! आम काट दूं, तुम सब लोग खा लो। मुझे तो ऐसे में भूख ही न लग रही है। मैं तो बस सोऊंगी वरना चिंता से मेरा ब्लडप्रेशर भी बढ़ जायेगा।‘ ‘जी दीदी! यह गाउन पहन लीजिये, साड़ी मैं धुलने में डाल देती हूं।’ गाउन पहनते-पहनते नीलिमा फिर याद दिलाते हुए बोली, ‘शीला! आम देवर को खिलाकर तुम भी खा लेना समझी।‘ ‘जी, जरूर!’ कहकर वह गुस्से से भरी रसोई में आ गयी। रसोई में स्टोव पर मैगी बनाते हुए उसे उसके पति ने देखा तो बोला- ‘एक दिन भूखी रह जाओगी तो मर नहीं जाओगी ! सुना नहीं क्या ! भाभी ने क्या कहा?’ ‘सुना ! लेकिन अपने बेटे और पति को भूख से व्याकुल होते हुए नहीं देख सकती हूं। तुम्हें बच्चे का रोना भले न दिखाई दे लेकिन मेरा सीना छलनी हुआ जा रहा है। यह कैसी परम्परा है जो सिर्फ घर के भावुक लोग निभाएं। चालाक लोग चाट-पकौड़ा खाकर भी दुखी होने की दुंदुभी बजायें।’ ‘तू चाहती क्या है..!’ ‘जो कर रही हूं।’ शीला ने अपने पति को गुस्से से प्रति उत्तर दिया। जेठ-जेठानी के कान में आवाजें जा रहीं, लेकिन दोनों ही सोने का नाटक बखूबी निभा रहे थे।

इसका अंदाजा शीला को भी था अत: वह मन की सुनाए जा रही थी। जैसे उसके विरोधी स्वर उन तक पहुंचकर, उन्हें आगे के लिए आगाह कर दें। कुछ ही सेकेण्ड में मैगी की प्लेट पति के सामने रखती हुई बोली- ‘चुपचाप खाइए, शाम को ही आप कह रहे थे कि पेट में चूहे कूद रहे हैं। चाट-टिकिया न सही, सादी मैगी ही सही। इसको खाने के बाद भी आपके भैया-भाभी से ज्यादा हम सब भावनात्मक रूप से उस दिवंगत के परिवार के साथ हैं।’ अपने बेटे को जेठानी के पास से उठा लाई। उसका पेट पसलियों से सटा देख आंखें डबडबा आयीं उसकी। बंटी को उठाते समय उसकी जेठानी ने अपनी निद्रा के स्वांग को बरकरार रखा। शीला मन ही मन बुदबुदाई- ‘इनके नाटक के आगे तो फिल्मी नायिकाएं भी फेल हैं।’ बंटी को खिलाते हुए बड़बड़ाई- ‘ढोल पीटने से श्रद्धांजलि नहीं होती है, बल्कि मन से देने से होती है। हम मन से दुखी हैं उस दिवंगत की आत्मा के लिए। भगवान उसको इस मायावी दुनिया से पुर्णत: मुक्ति दें।’ हाथ जोड़ ‘ॐ शांति’ कह प्रार्थना करते हुए निद्रा की बांहों में समाने के लिए बिस्तर पर पड़ गयी। पति बोला – ‘सुनो ! तुम ठीक कहती हो! वह अभी मेरे सामने जैसे खड़ा था और कह रहा था ‘चाचा धन्यवाद! दो चम्मच मैगी के लिए।’ पति के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि का भाव देख शीला के नयन एक बार पुन: नीर से भर गये।

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