बाबा की वर्चुअल विदाई

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कॉलोनी के पहले मकान से एक आवाज उठी और देखते-देखते आखिरी मकान तक पहुंच गई, ठीक उसी तरह जैसे 50 साल पहले पहुंचती होगी। सभी लोगो ने वही बात कही, जो बाप दादा किसी मौत को देखकर कहते आये होंगे, ‘भगवान मुक्ति दे तो ऐसी ही। बाबा सचमुच बड़े पुण्यात्मा थे’। लेकिन बाबा के दरवाजे पर वैसी भीड़ नहीं जुटी जैसी पहले के जमाने में जुटती थी। सोशल मीडिया जरूर बता रहा था कि पूरी कॉलोनी प्रचंड रूप से शोकाकुल है। व्हाट्स एप की ग्रुप आईडी पर बाबा की तस्वीर लगाई जा चुकी थी और लोग धड़ाधड़ ‘रेस्ट इन पीस’ छापे जा रहे थे।

सोशल मीडिया जरूर बता रहा था कि पूरी कॉलोनी प्रचंड रूप से शोकाकुल है। व्हाट्स एप की ग्रुप आईडी पर बाबा की तस्वीर लगाई जा चुकी थी और लोग धड़ाधड़ ‘रेस्ट इन पीस’ छापे जा रहे थे। फेसबुक पर भी यही चल रहा था। शोक संदेश थमने का नाम नहीं ले रहे थे। लेकिन नश्वर शरीर से मुक्त हो चुके बाबा इन भावुक संदेशों का क्या करते? जिंदा होते ‘थैक्यू सो मच’ या ‘फीलिंग स्पेशल’ लिख देते।

फेसबुक पर भी यही चल रहा था। शोक संदेश थमने का नाम नहीं ले रहे थे। लेकिन नश्वर शरीर से मुक्त हो चुके बाबा इन भावुक संदेशों का क्या करते? जिंदा होते ‘थैक्यू सो मच’ या ‘फीलिंग स्पेशल’ लिख देते। सुबह बीत चुकी थी, दोपहर हो चली थी। बाबा अपने बरामदे पर चुपचाप लेटे कंधे देने वाले चार लोगों का इंतजार कर रहे थे। जीते-जी बाबा को शायद इस बात का यकीन नहीं रहा होगा कि एक दिन ऐसा समय भी आएगा जब लोग अर्थी को कंधा देने तक के लिए मोबाइल छोड़ने को तैयार नहीं होंगे। .. तो वर्चुअल शमशान पर बाबा को बाय-बाय करके लोग काम पर निकल गये। दो-चार रिटायर्ड पड़ोसी अब भी रहरहकर अपने घरों से झांक रहे थे। यही लोग बाबा की आखिरी उम्मीद थे। पड़ोसी सुबह आकर दस मिनट के लिए दरवाजे पर खड़े हो चुके थे। बाबा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पर्याप्त चर्चा भी कर चुके थे। ठंड में बाहर खड़े-खड़े घुटने दर्द करने लगते हैं। पड़ोसी बेचारे इंतजार कर रहे थे कि शवयात्रा शुरू हो तो वे घर से बाहर निकलें। लेकिन बाबा के घर के भीतर गहन धार्मिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक मंथन चल रहा था।

विचारणीय विषय दो थे। पहला यह कि अग्नि संस्कार कौन करेगा और दूसरा रीति-रिवाज क्या होंगे? बाबा अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये थे। तीन बेटे, तीनों बेहद शिक्षित और सफल। बड़े बेटे सिंगापुर में एक मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ हैं। बीच वाले बेहद कामयाब वकील हैं और सबसे छोटे वाले एक टॉप मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में डीन हैं। बाबा अपने छोटे पुत्र के साथ ही रहते थे। बड़े बेटे पर दुनिया भर में फैले कंपनी के पांच हजार कर्मचारियों की जिम्मेदारी है। इतनी जल्दी सिंगापुर से यहां आना उनके लिए मुश्किल है। छोटे बेटे की सेहत ठीक नहीं रहती। पिता का अग्नि संस्कार करना बड़ी बात नहीं है लेकिन डायबिटीज और स्लिप डिस्क वाले आदमी के लिए उसके बाद के कर्मकांड निभाना बहुत कठिन है। अब गेंद बीच वाले पुत्र के पाले में आ गई। लेकिन वकील साहब ने बड़ी चतुराई से तकनीकी पेंच फंसा दिया- शास्त्र यही कहते हैं कि पिता का अंतिम संस्कार ज्येष्ठ पुत्र के हाथों होना चाहिए। अगर किसी और ने किया तो बाबूजी की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। जो इक्का-दुक्का पड़ोसी अंत्येष्टि में शामिल होने को तैयार बैठे थे, उनका धैर्य अब जवाब दे रहा था। वे इस तरह बेचैन थे, जिस तरह मुख्यमंत्री चुनने के लिए चल रही विधायक दल की बैठक के नतीजों को लेकर मीडिया होता है। शाम ढलने को आई। बाबा अब भी बरामदे पर पड़े थे।

सर्दियों के दिन थे, इसलिए किसी को बर्फ-वर्फ का बंदोबस्त नहीं करना पड़ा था। आखिरकार ब्रेकिंग न्यूज आ गई और उसके साथ-साथ एक शव वाहन भी आ गया। कंधे ढूंढने का झंझट भी खत्म हुआ। बाबा का पार्थिव शरीर गाड़ी में शमशान पहुंचा। उसके पीछे करीब पांच-छह गाडि़यां और पहुंची। बीच वाले बेटे ने फोर जी नेटवर्क वाला अपना मोबाइल फोन आॅन किया और वीडियो चैट पर सिंगापुर में बैठे ज्येष्ठ पुत्र आ गये। शोक वाले श्वेत वस्त्र के साथ आंखों पर काला चश्मा चढ़ाकर बैठे थे। शक्ल से बहुत गमगीन लग रहे थे। पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया और ज्येष्ठ पुत्र मंत्र दोहराने लगे। संकल्प पूरा हुआ तो दोनों पुत्र और बाकी परिजन ने मिलकर चिता को विद्युत शवदाह गृह की तरफ धकेल दिया। वर्चुअल विदाई के साथ बाबा विद्युतीय प्रभाव से तत्काल पंचतत्व में विलीन हो गये। लोग कंधे झुकाये अपनी-अपनी गाडि़यों के तरफ चुपचाप बढ़े। छोटे बेटे से पूछने पर पता चला कि कल हवन होगा और शांति पाठ के बाद कर्मकांड पूरे हो जाएंगे। आज कल 13 दिन तक बैठे रहने का समय किसी के पास नहीं है। एक पड़ोसी ने कहा-अच्छा हुआ बाबा बिना किसी कष्ट के मुक्त हो गये। दूसरे बुजुर्ग ने जवाब दिया-मुक्त मरने वाला नहीं होता है। मुक्त तो उसके परिवार वाले होते हैं।

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