प्रियंका की किटी पार्टी

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गृहणियों के जीवन में एक उम्र के बाद खालीपन आ ही जाता है। इसे भरने के लिए वे क्या करें? जवाब इस बात पर निर्भर है कि गृहणी कौन है। गांव की काकी और मौसी कीर्तन मंडली बना लेती हैं। शहर की मध्यम वर्गीय औरतें किटी पार्टी शुरू कर देती हैं। गृहणी अगर नीता अंबानी सरीखी हो तो आधा दर्जन स्पोर्ट्स क्लब और पूरी लीग खरीद लेती है। लेकिन प्रियंका गांधी इन सबसे अलग हैं। इसलिए उनके मिड लाइफ क्राइसिस का सॉल्यूशन भी सबसे अलग है। पति को एक्सपोर्ट्स इंपोर्ट के धंधे, सीबीआई और ईडी के डंडे और मुकदमों से फुर्सत नहीं है। बच्चे अपनी दुनिया में मगन हैं।

मैं तो यह मान बैठा था कि समर्थक यह कहेंगे कि प्रियंका दीदी तब आएगी जब बेटा पुश्तैनी धंधे में अपने पिता के हाथ बंटाने लगेगा और बिटिया के हाथ पीले हो जाएंगे। लेकिन प्रियंका ने उतना इंतजार नहीं करवाया और आखिरकार राजनीति में आ ही गईं।

इसलिए खाली समय में प्रियंका दीदी ने अब कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने का फैसला किया है। प्रियंका ने कहा— चलो फिलहाल महासचिव बन जाती हूं। अगर भगवान ने चाहा तो अपनी दादी की तरह एक दिन प्रधानमंत्री भी बन जाउंगी। अपने-अपने शौक, अपना-अपना टाइम पास! लेकिन क्या सरला, कमला और विमला के लिए जो महत्व किटी का है, वही प्रियंका के लिए पॉलिटिक्स का है? कुछ लोगों को लगता है कि कोई ज्यादा अंतर नहीं है क्योंकि कांग्रेस पार्टी अपने आप में ही किटी पार्टी है। मम्मी सोनिया गांधी ने भी बच्चों के बड़े होने के बाद ही इसे ज्वाइन किया था। प्रियंका भी अब कुछ ऐसा ही करने जा रही हैं। लेकिन एक दूसरा ग्रुप भी है, जिसे यह बात पसंद नहीं। यह ग्रुप कह रहा है कि प्रियंका गहरी राजनीतिक समझ रखती हैं। पार्टी में लगातार सक्रिय रही हैं।

यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन बनवाने में भी उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी। इसलिए लोकसभा चुनाव से पहले उनका महसचिव बनना पूरी तरह से तर्कसंगत है और इससे कांग्रेस पार्टी को फायदा होगा। प्रियंका गांधी के पास अपनी भाषण शैली है। उनके नैन-नक्श दादी इंदिरा गांधी से मिलते हैं। वे जहां भी जाती हैं, झलक पाने के लिए हजारों लोग उमड़ पड़ते हैं। उनके सक्रिय होने से कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं का जोश हिलोरे मार रहा है। वे कह रहे हैं कि बिना किसी गठबंधन के यूपी में झंडे गाड़ देंगे। जब पदार्पण इतना चमत्कारी है, तो फिर 24 अकबर रोड पर उनके शुभ चरण इतनी देर से क्यों पड़े? दादी जैसी नाक तो बचपन से रही होगी लेकिन चुनावी राजनीति में उतरने के लिए दादी जितनी उम्र का इंतजार प्रियंका ने क्यों किया? प्रियंका के राजनीति में आने की चर्चा लंबे समय से थी। हर चुनाव से पहले खबर उड़ती कि दीदी कांग्रेस के अच्छे दिन लाने वाली हैं। लेकिन दीदी आते-आते रह जाती थीं। समर्थक कहते थे—गृहस्थी अभी नई है। एक बार घर-परिवार जम जाये तो पॉलिटिक्स में भी आ जाएंगी। अगला चुनाव आता, प्रियंका फिर आते-आते रह जाती थीं।

समर्थकों कि फिर वही दलील— दीदी फुल टाइम पॉलिटिक्स में कैसे आयें, अभी बच्चे छोटे हैं। अमेठी और रायबरेली में कैंपेन कर दिया है, यही बहुत है। देश की सबसे पुरानी पॉलिटिकल पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताआें का यह धैर्य देखकर हैरानी होती थी। मैं तो यह मान बैठा था कि समर्थक यह कहेंगे कि प्रियंका दीदी तब आएगी जब बेटा पुश्तैनी धंधे में अपने पिता के हाथ बंटाने लगेगा और बिटिया के हाथ पीले हो जाएंगे। लेकिन प्रियंका ने उतना इंतजार नहीं करवाया और आखिरकार राजनीति में आ ही गईं। प्रियंका को भारतीय संस्कृति से गहरा लगाव है लेकिन एक आधुनिक नारी भी हैं। इसलिए उन्होने राखी की परंपरा को बदल दिया है। रक्षाबंधन पर बहन की रक्षा का वचन भाई देता है। लेकिन प्रियंका अब अपने भाई की रक्षा के लिए मैदान में कूद पड़ी हैं। बीजेपी यही मानकर चल रही है कि प्रियंका का आना वैसा ही जैसा कमला, विमला या सरला का किटी ज्वाइन करना। यानी बनना बिगड़ना कुछ भी नहीं है। अब प्रियंका को यह साबित करना है कि वे किटी पार्टी नहीं बल्कि देश की सबसे पुरानी पॉलिटिकल पार्टी में आई हैं।

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