डेंगू डिग्रीधारी

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मेरे परिवार वाले कहते हैं, पिछले महीने मुझे डेंगू हुआ था। जिन डॉक्टर की तीमारदारी में मैं अस्पताल में रहा, उनका कहना है कि डेंगू हुआ था। लेकिन अस्पताल से निकलने के बाद दोबारा परीक्षण करने और नई-पुरानी रिपोर्ट देखने वाले डॉक्टर का कहना है कि डेंगू नहीं हुआ था। मैं अत्यंत चकित और भ्रमित हूं। मच्छरों ने मुझ पर सर्जिकल स्ट्राइक किया जिसके प्रमाण उपलब्ध हैं।

फिर भी कुछ लोग इसके होने और न होने पर सवाल खड़े कर रहे हैं। कहानी उस वक्त शुरू हुई जब मैने एक नॉर्मल चेकअप के लिए रक्त के नमूने दिये। ये नॉर्मल चेकअप भी अजीब चीज है। मैं इसे अमीरों का शगल मानता आया था। लेकिन नये जमाने की बहुत सी कंपनियों ने साल में एक बार मेडिकल चेकअप अपने अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए अनिवार्य कर दिया है। बीमार मजदूर भला किसे पसंद हैं? तो नॉर्मल चेकअप के जो नतीजे आये, उससे पता चला कि प्लेटलेट तय सीमा के मुकाबले कम हैं।

डॉक्टर ने पूछा- पिछले 10-15 दिन में कभी बुखार आया था? मैंने कहा- बिल्कुल नहीं। अगला सवाल- सिरदर्द या बदन दर्द? मंैने कहा- दांत में दर्द था, वह भी रूट कैनाल होने के बाद पूरी तरह ठीक हो गया है। डॉक्टर ने जवाब दिया- वैसे तो सब ठीक है। लेकिन डेंगू और मलेरिया के टेस्ट करवा लीजिये। यह जानना जरूरी है कि प्लेटलेट कम क्यों हुए? खून देकर वापस आया तो लगा कि फिल्मफेयर अवार्ड की दो कैटेगरी में नॉमिनेट हो गया हूं। डेंगू मिलेगा या मलेरिया मिलेगा? हो सकता है कि कुछ भी न मिले क्योंकि शरीर में बीमारी के दूर-दूर तक कोई चिह्ण नहीं हैं। अगले दिन पैथोलॉजिक लैब से फोन आ गया। लैब मुंबई के एक भव्य अस्पताल के भीतर था।

मुझे बताया गया कि रिपोर्ट में डेंगू कनफर्म हुआ है, इसलिए मुझे जल्द से जल्द आकर डॉक्टर से मिलना चाहिए। अस्पताल पहुंचते ही दो डॉक्टरों ने मुझे लिटाया। फेफड़े और जिगर की जांच के बाद बोले- कम से कम तीन-चार दिन सभी आॅर्गन पर नजÞर रखनी होगी क्योंकि डेंगू रिपोर्ट पॉजेटिव है। हमारे हिसाब से आपका अस्पताल में भर्ती होना जÞरूरी है। .. और इस तरह शहर के मशहूर अस्पाल की आठवीं मंजिल पर एक कमरे में लिटा दिया गया। शहर को खबर हो गई कि डेंगू की चपेट में होने की वजह से मैं अस्पताल में भर्ती हूं।

हाल पूछने वालों का तांता लग गया। मुझे देखने जो भी आता, वह कमरे का दरवाजÞा खुलते ही मुझे छोड़कर मेरे बिस्तर से आगे बॉलकोनी की तरफ मुखातिब होता- वाह! क्या नजÞारा है। मुंबई में ऐसा व्यू हर जगह नहीं मिलता। लेकिन कुछ भले लोग भी थे, जो अपने साथ फल-वल लेकर आये थे। कुछ की जिज्ञासा इस बात में थी कि मच्छर ने मुझे कब और कहां काटा होगा। क्या जब मच्छर ने काटा तो मैने नोटिस किया? मच्छर के काटने के कितने समय बाद डेंगू का वायरस शरीर में फैलता है? सबसे बड़ा सवाल- आप तो 15वें μलोर पर रहते हैं। क्या डेंगू के मच्छर उस ऊंचाई तक उड़ सकते हैं? इन वैज्ञानिक प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं थे। ठीक उसी तरह जिस तरह मेरे प्रश्नों के उत्तर डॉक्टरों के पास नहीं थे। जब बुखार नहीं आया, सिरदर्द, बदन दर्द कुछ भी नहीं हुआ तो फिर डेंगू हुआ कैसे? डॉक्टरों ने कहा- बात आपकी ठीक है, लेकिन रिपोर्ट में आया है, इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं कि आपको डेंगू नहीं है। मैंने मन ही मन खुद को समझाया- जब इमारत बने बिना कोई विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय हो सकता है तो फिर बिना बुखार के मुझे डेंगू क्यों नहीं हो सकता है? तो एहतियातन मुझे लगातार छह दिन ग्लूकोज चढ़ाया गया। इतनी बार रक्त के नमूने लिये गये कि हाथ में जगह-जगह छेद हो गये। लगातार महसूस हुआ कि प्राइवेट अस्पताल अतिथि देवो भव: दर्शन में कितना विश्वास रखते हैं। एक बार आ गया मेहमान बिना मेजबान की मर्जी से जा नहीं सकता है।

आखिरकार सातवें दिन सबसे बड़े वाले डॉक्टर साहब आये और बोले- आपकी हालत अब एकदम ठीक है। प्लेटलेट तय सीमा से कम हैं लेकिन खतरे के निशान से बहुत ऊपर हैं, अब आप घर जा सकते हैं। होटल जितने महंगे हॉस्पिटल का बिल इंश्योरेंस कंपनी ने चुकाया। छूटने के बाद घर पहुंचा तो लगातार सोचता रहा कि आखिर मुझे हुआ क्या था? मुहल्ले के डॉक्टर साहब ने सारी रिपोर्ट देखने के बाद डांट लगाई- कोई डेंगू-वेंगू नहीं था। आपके प्लेटलेट के आकार बड़े हैं। ये संख्या में कम हैं, लेकिन प्रभावी हैं। कुछ करने की जरूरत नहीं थी। मुझे पहली बार पता चला कि प्लेटलेट भी आलू की तरह होते हैं। छोटे होंगे तो गिनती में ज्यादा आएंगे और बड़े होंगे तो कम। मेरी असली चिंता यह थी कि अगर लोगों को बताऊंगा कि इतने पैसे खर्च हो गये और बीमारी थी ही नहीं तो लोग क्या कहेंगे? कुल मिलाकर मैने यह संतोष किया कि बिना बुखार के भी डेंगू हो सकता है। आखिर बड़े-बड़े विश्वविद्यालय बहुत सी ऐसी विभूतियों को डी लिट की मानद उपाधि प्रदान करते हैं, जो कभी स्कूल या कॉलेज नहीं गये। मेरा डेंगू भी डी.लिट की मानद उपाधि की तरह ही था।

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