शताब्दी वर्ष में बिदेसिया को यहां से देखें

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स वर्ष ‘बिदेसिया’ के सौ साल पूरे हो रहे हैं। भिखारी ठाकुर ने 1917 में इसकी रचना की थी। फिर भी उनकी यह कृति आज भी नवीन जान पड़ती है।

अक्सर कृतियों के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि उसके कितने संस्करण प्रकाशित हुए। इस पैमाने पर देखेंगे तो एकदम से अलग दृश्य सामने होगा। बिदेसिया का प्रकाशन ही तब हुआ, जब यह कृति लीजेंड का दर्जा प्राप्त कर चुकी थी।

बिदेसिया नाटक है। नाट्य कृतियों के महत्व का पता उसकी प्रस्तुतियों की संख्या से होता है। बिदेसिया की कितनी प्रस्तुतियां हुई होंगी? यह जानने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है। यह संख्या हजार में है, दस हजार में है या लाख में?

सच पूछिए तो बिदेसिया के महत्व का आकलन इन तरीकों से नहीं हो सकता। ऐसी कृति जो लोक मन में बैठी हुई है, लोक चित्त में समाई हुई है, उसके महत्व का अंदाज लगाने के दूसरे पैमाने होंगे।

बिदेसिया केवल एक कृति नहीं है- एक रचना नहीं है- लोकनाट्य शैली है, लोकधुन है। बिदेसिया की पहुंच का, प्रसार का अंदाज लगाने का कोई उपाय हो और उसकी कथा लिखी जा सके तो हम पाएंगे कि-छोटे से हनुमाज जी हैं और मीलों लंबी पूंछ है। भिखारी ठाकुर पर लिखी केदारनाथ सिंह की कविता हमें बताती है कि ‘भिखारी ठाकुर की आवाज (से) ताल के जल की तरह हिलने लगती थी, बोली की सारी सोई हुई क्रियाएं।’

सोई हुई क्रियाओं को जगा देने वाले बिदेसिया की लय स्वाधीनता संघर्ष के लिए उठने वाली पुकार की लय से टकराती है। बिदेसिया की लय किस तरह स्वाधीनता संघर्ष की लय से मिल जाती है, इसे इतिहासकार भले न देख पाए हों, एक रचनाकार इसे देख लेता है।

यह साल गांधी के चंपारण पंहुचने का भी 100 वां साल है। चंपारण जाकर गांधी ने भोजपुरी अंचल की जनता को सोते से जगा दिया और उसे नए तरह से क्रियाशील बनाया। इधर भिखारी ठाकुर भोजपुरी बोली की सोयी हुई क्रियाओं को जगा रहे थे। बोली की क्रियाएं और उसे बोलने वाले साथ-साथ जागते हैं, और साथ-साथ स्वाधीनता के लिए हो रहे संघर्ष में शामिल हो जाते हैं।

बिदेसिया केवल एक कृति नहीं है- एक रचना नहीं है- लोकनाट्य शैली है, लोकधुन है। आज जब बिदेसिया के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं, हमें देखना चाहिए की बिदेसिया की लय में कैसे आजादी और राष्ट्रगान की लय मिलती है।

आज जब बिदेसिया के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं तो हमें देखना चाहिए की बिदेसिया की लय में कैसे आजादी और राष्ट्रगान की लय मिलती है। बोली की क्रियाओं की सक्रिय करने के लिए भिखारी ठाकुर अपने गांव कुतबपुर से बोलते हैं। आखिरी दिनों में भिखारी ठाकुर सारी प्रसिद्धि को किनारे रखकर अपने गांव चले आए थे। वे गांव में साधारण किसान की तरह रहने लगे थे।

गांवों को बेहाल करके देश का विकास नहीं हो सकता, यह गांधी भी कह रहे थे और भिखारी ठाकुर भी। ‘कहत भिखारी भिखारी होई गइली दौलत बहुत कमा के’ दौलत मात्र को विकास का प्रतीक मानने वाली सोच की धारणा को बिदेसिया में भिखारी ठाकुर खारिज करते हैं- बिल्कुल गांधी की तरह। जिन दिनों गांधी सेवाग्राम में थे, उन्हें सुनने तत्कालीन वायसराय लार्ड लिनथिनगो सेवा ग्राम चले आए थे। गांधी के अपने ही चेले भले ही उन्हें नहीं सुन पा रहे हों वायसराय ने सुना था।

हमने न गांधी को सुना, न भिखारी ठाकुर को। दौलत कमाते रहे और भिखारी हो गए। भिखारी ठाकुर की रचनाओं में और जीवन में कुतुबपुर को लेकर, गांव को लेकर जो बातें की गई हैं, वह विकास की चालू अवधारणा पर पुनर्विचार की मांग करती हैं और सभ्यता के बड़े प्रश्नों को सामने लाने वाली हैं।

बिदेसिया की छोटी-सी कथा है। बिदेसी गवना कराकर प्यारी सुन्दरी को घर लाता है और आनन-फानन में कलकत्ता जाने की ठान लेता है। प्यारी सुन्दरी के मना करने पर वह चुपके से कलकत्ता चला जाता है-कमाने। वहां जाकर बिदेसी दूसरी औरत के प्रेम में पड़ जाता है। नाटक में भिखारी ठाकुर ने उसे रण्डी कहा है। वह अब रखेलिन बन जाती है।

रखेलिन से बिदेसी के दो बच्चे हैं। इन्हीं सबके मोह पाश में बंधा बिदेसी भूल जाता है कि उसका घर भी है, जहां वह प्यारी सुन्दरी को छोड़ आया है। उधर प्यारी सुन्दरी विरह से कातर हो रही है। उसे बटोही मिलता है जो कलकत्ता जा रहा है। बटोही को रोक कर प्यारी सुन्दरी अपना दुखड़ा सुनाती है और कहती है कि मेरे पति को खोजकर उससे मेरी दशा का बयान करिए और समझा-बुझाकर घर भेजिए।

बटोही कलकत्ते में बिदेसी को खोज निकालता है और उसे समझा-बुझाकर वापस घर भेजता है। पीछे-पीछे रखेलिन भी आ जाती है। रास्ते में दोनों को डाकू लूट लेते हैं। जिस पैसे के लिए बिदेसी कलकत्ते आया था, वह पैसा कलकत्ते में ही रह जाता है। प्यारी सुन्दरी को पैसा नहीं चाहिए। वह बिदेसी को पाकर खुश है। इस खुशी में रखेलिन और बच्चों को भी स्वीकार कर लेती है। सब साथ रहने लगते हैं। कुल मिलाकर ‘बिदेसिया’ एक सुखान्त लघु कथा है। बिल्कुल प्यारी सुन्दरी की तरह।

इस तरह लोक परंपरा से प्राप्त विरह संदेश कथाओं की लंबी परंपरा हमारे देश में मिलती है। भिखारी ठाकुर को भी यह कथा लोक परंपरा से मिलती है। मजे की बात यह है कि भिखारी ठाकुर लोक परंपरा से प्राप्त विरह संदेश कथा को अपनी विशिष्ट छाप से पुन: संस्कारित करके जीवंत बनाते हैं।

इसमें कोई बड़ी घटना नहीं घटती। न राम बनवास है, न सीता का हरण होता है, न लंका का पता लगाया जाता है। न ही रावण का वध होता है और न ही सीता की अग्निपरीक्षा होती है। यानी कहानी में कुछ भी असाधारण नहीं घटता। बिदेसिया की कथा बताते-बताते मैं कहां राम कथा पर आ गया। पर ऐसा यों ही नहीं हुआ है। बिदेसिया राम कथा से होड़ लेती हुई कृति है। खास तौर से तुलसीदास के रामचरितमानस से। मंगलाचरण में ही नहीं, बीच में भी तुलसीदास की पंक्तियां आती हैं। भिखारी ठाकुर कदम-कदम पर तुलसीदास को याद करते हैं।

मंगलाचरण के ठीक बाद तुलसी बाबा की चौपाई- ‘मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी’ से नाटक शुरू होता है-और थोड़ी ही देर में भिखारी ठाकुर तुलसीदास को प्रणाम करते हुए अपनी चौपाई पर उतर आते हैं- ‘नाच तमासा कीर्तन जेते। होखत बा सब जग मंह तेते। नावत बानी सब कर माथा। चित देइ सुनहु बिदेसिया काथा।।’ यह तुलसी की ही शैली है। तुलसीदास भी अपने पूर्व पुरुषों को याद करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं और धीरे से अपना रास्ता अलग कर लेते हैं।

बिदेसिया में भिखारी ठाकुर भी ऐसा ही करते हैं। विविध प्रकार के नाच, तमासा, कीर्तन सब हो रहे हैं। भिखारी सबके आगे नतमस्तक हैं- ‘नावत बानी सबकर माथा’। इस माथा नवाने में आदर के साथ विदाई भी है। इस विदाई के बाद भिखारी बिना समय गंवाये अपनी कथा पर आ जाते हैं- ‘चित देइ सुनहु बिदेसिया काथा।’

‘बिदेसिया काथा’ शुरू करने के पहले भिखारी पहले से हो रहे नाच, तमासा और कीर्तन को विदा करते हैं। बिदेसिया की लोकव्याप्ति जिस भोजपुरी प्रदेश में है, वहां जो नाच-तमासे प्रचलित थे, उसमें रामलीला भी है। रामकथा की लोक व्याप्ति बेजोड़ है। राम कथा के असंख्य लिखित पाठ मौजूद हैं।

कहते हैं रामकथा पर आधारित रामलीला की शुरुआत तुलसीदास ने बनारस में ही की थी। देखते-देखते रामलीला की परंपरा गांव-गांव फैल गई। नाटक की ओर भिखारी का भी ध्यान खड़गपुर में रामलीला देखकर ही गया। खड़गपुर से लौटे तो पहले रामलीला करनी शुरू की। कुछ आगे चलकर भिखारी रामलीला को प्रणाम कर रहे हैं और ‘बिदेसिया कथा’ प्रस्तावित कर रहे हैं। रामलीला के बरक्स लोक लीला।

नाटक के आरम्भ में ही इसे एक रूपक के रूप में देखने का प्रस्ताव किया गया है- ”एह तमासा में चार आदमी के पाट बा-बिदेसी एक, प्यारी सुन्दरी दू, बटोही तीन, रखेलिन चार। अथवा बिदेसी ब्रह्म, बटोही धरम, रखेलिन माया, प्यारी सुन्दरी जीवन।”

इसके तत्काल बाद भिखारी कहते हैं- ‘बिदेसी रामचन्द्र जी। भरत जी महाराज बटोही बनि के रामचन्द्र जी के बन से फेरे गइले हा। उ बिदेसी त दोसर जनाना राखि लेलन तेहसे ना लवटलन, बाकी रामचन्द्र जी काहें ना लवटलन? ‘यहीं पर भिखारी ठाकुर राम कथा पर अपने ढंग से प्रश्नवाचक लगाते हैं।

यह लोक कलाकार हमें मुश्किल में डाल देता है। हम नाटक को किस तरह देखें- शुद्ध लौकिक रूप में- बिदेसी, प्यारी सुन्दरी बटोही और रखेलिन की कथा के रूप में या जैसा भिखारी ठाकुर सुझाते हैं- ब्रह्म, माया, धरम और जीव के दार्शनिक आध्यात्मिक फ्रेम वर्क में। क्या इसे आत्मा, परमात्मा, माया और धर्म के रूपक कथा के रूप में देखें।

लेकिन भिखारी ठाकुर के तीसरे प्रस्ताव का क्या करें, जहां वे बिदेसी को रामचन्द्र कह रहे हैं। शुरू में ही यह गड़बड़ झाला रच देते हैं। दर्शक या पाठक को कथा के इतने आयाम सुझा कर भिखारी ठाकुर क्या करना चाहते हैं? क्या यह नाटक के प्रति उत्सुक बनाने का कौशल भर है, या उससे कुछ अधिक?

यहीं पर थोड़ा यह विचार करें कि तुलसी और राम के भक्त भिखारी ने रामलीला को क्यों नमस्कार किया और क्यों बिदेसिया की ओर मुड़े। रामलीला का जो फ्रेमवर्क है उसमें बहुत परिवर्तन की गुंजाइश नहीं है। भिखारी के समय समाज में जो परिवर्तन घटित हो रहा है, जो मूल्यगत टकराव उपस्थित हो रहे हैं, उन्हें व्यक्त करने की गुंजाइश रामलीला के बंधे-बंधाये कथानक में संभव नहीं रह गया है।

रामलीला का फार्म भिखारी को नाकाफी लगा। वे बिदेसिया कथा की ओर मुड़े। अब इस बिदेसिया कथा को व्यापक अर्थ देने के लिए वे रूपक प्रस्तावित कर रहे हैं। वह भी एक नहीं दो-दो। एक सच्चाई रोजमर्रा के जीवन में प्रकट होती है तो एक सच्चाई दार्शनिक स्तर पर होती है। एक तीसरी सच्चाई जो मूल्यगत स्तर पर प्रकट होती है। इस रूपक संकेत से भिखारी कथा को तीनों स्तरों पर ले आते हैं।

गांधी की ही तरह भिखारी ठाकुर ने सफलता की जगह सार्थकता को मूल्य के रूप में स्थापित किया। बिदेसिया के सौ वर्ष की यात्रा इसी का दस्तावेज है।

एह नाटक के बिचऊ बाना- बहुत महत्वपूर्ण कथन है। यानी प्रकट यथार्थ, दार्शनिक और मूल्यगत संसार- तीनों के बीच एक संतुलन स्थापित करने की कोशिश। इसलिए मुझे लगता है कि बिदेसिया की कथा रामकथा से होड़ लेती है। राम कथा की नैतिक व्यवस्था के सामने बिदेसी एक प्रति प्रश्न रख देता है। यानी रामकथा जिन सामाजिक नैतिक मूल्यों को स्थापित करती है- आदर्श रचती है- जीवन की धारा उससे अलग और भिन्न है। बिदेसिया जीवन को उसकी तथता में स्वीकार करता है।

नाटक के अंत में बिदेसी, प्यारी सुन्दरी और रखेलिन एक साथ रहने लगते हैं। साथ रहने के लिए कहीं किसी को समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। बिदेसी कहता है- ‘ड्यौढ़ी में सौत खड़ी है।’ रखेलिन अपने बेटे से कहती है- ‘मां है प्रणाम करो।’ और एक संगति बैठ जाती है।

राम कथा में जहां सीता जैसी आदर्श स्त्री को निर्वासन मिलता है, बिदेसिया में रंडी भी घर में स्थापित हो जाती है। माया का ‘माया तत्व’ खत्म हो जाता है, और जीव, ब्रह्म और माया एक हो जाते हैं। बिदेसिया की बहुस्तरीयता का यह भी एक आयाम है। लेकिन बिदेसिया का एक और आयाम है। भिखारी ठाकुर ही गांव नहीं लौटते ,बिदेसिया भी लौट आता है। धन कमाने की जिस लालसा से वह गया था, धन तो नहीं मिलता लेकिन धन की लालसा मिट जाती है।

हमारी बेहतर भौतिक स्थिति के लिए दौलत बहुत जरूरी है। लेकिन दौलत की बहुलता हमें भिखारी बनाये दे रही है। हमारे मानवीय सदगुण-दया, ममता, करुणा, परोपकार, भाई-चारा आदि धन लोभ में बिला जा रहे हैं। हम दौलत कमाने की मशीन बनाते जा रहे हैं। उन्हीं दिनों प्रेमचंद भी महाजनी सभ्यता और निर्मम बना देने वाली सफलता की आलोचना कर रहे थे। ऐसी सफलता जिसने आगे चल कर सभ्यता विमर्श में भारतीय गांवों को बहुत पीछे छोड़ दिया है।

गांधी की ही तरह भिखारी ठाकुर ने सफलता की जगह सार्थकता को मूल्य के रूप में स्थापित किया। बिदेसिया के सौ वर्ष की यात्रा इसी का दस्तावेज है। रामकथा जिन सामाजिक नैतिक मूल्यों को स्थापित करती है- आदर्श रचती है-जीवन की धारा उससे अलग और भिन्न है। बिदेसिया जीवन को उसकी तथता में स्वीकार करता है।

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