वेदना को मिली जुबान

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अंग्रेजी के साहित्यकार विलियम शेक्सपियर ने कहा था, ‘यदि घावों को जुबान होती तो अपनी वेदना खुद बयान करते।’ इंसान की जिंदगी में भी ऐसी हजारों वेदनाएं होती हैं जो वह कह नहीं पाता। इससे उलट विदर्भ के किसानों की विधवाओं ने अपनी वेदना नाटक के जरिये मुखर होकर बयान करने का साहस किया। वरिष्ठ पत्रकार श्याम पेठकर द्वारा लिखित ‘तेरवा’ नाटक का 15 नवम्बर को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में मंचन हुआ। इसमें किसानों की विधवाओं की वेदना मुखर हुई। नाटक के निर्देशक हरिष इथापे तथा लेखक श्याम पेठकर बीते 15 साल से विदर्भ के किसानों और उनके परिवारों के लिए काम करते आ रहे हैं। ये दोनों दिवाली का त्योहार किसानों की विधवाओ और बच्चों के साथ मनाते हैं।

‘तेरवा’ में विदर्भ के किसानों की विधवाओं ने अपनी वेदना नाटक के जरिये मुखर होकर बयान करने का साहस किया। इसमें विधवाओं ने खुद अभिनय किया है। ये विधवाएं अपनी जिंदगी से लड़ते हुए औरों के लिए एक मिसाल बन गयी हैं। बिना डरे जिंदगी का सामना करती हैं। अपनी किसी सहेली के पति के निधन पर ये सारी महिलाएं मिल- जुलकर तेरहवीं की क्रिया संपन्न करती हैं।

वर्धा के अपने रोठा गांव में भाई दूज के दिन ये दोनों किसानों की विधवाओं से मिलकर दिवाली मनाते हैं। इथापे और पेठकर के नाम कई सफल मराठी फिल्में तथा नाटक दर्ज हैं। इनके इस काम से प्रभावित होकर नाना पाटेकर ने इन दोनों को अपने ‘नाम-फाऊंडेशन’ से जोड़ लिया। ‘नाम फाऊंडेशन’ वह संस्था है जो किसान तथा उनके परिवारों के लिए काम करती है। ‘तेरवा’ नाटक के बारे में जानकारी साझा करते हुए श्याम पेठकर ने बताया कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद तेरहवें दिन होने वाली क्रिया को ग्रामीण मराठी भाषा में ‘तेरवा’ कहते हैं। बीते कई साल से हम इन विधवा बहनों के साथ दिवाली मनाते रहे हैं। इस दौरान एक बात हमारी समझ में आयी कि पति की मृत्यु के बाद ये बहनें बिना डरे जिंदगी का सामना करती हैं। परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए वे आने वाली हर मुसीबत का निर्भय होकर सामना करती हैं। अपनी किसी सहेली के पति के निधन होने पर ये सारी महिलाएं मिल-जुलकर तेरहवीं की क्रिया संपन्न करती हैं। इस नाटक के जरिये हमने महिलाओं की वेदना के साथ-साथ उनकी हिम्मत और जिंदगी पर रोशनी डालने का प्रयास किया है।

पेठकर ने बताया कि नाटक के मंचन में सबसे अहम बात यह है कि इसमें किसानों की विधवाओं ने खुद अभिनय किया है। नाटक के निदेशक हरिष इथापे ने इन्हें अभिनय का विशेष प्रशिक्षण दिया है। इसके बाद इन महिलाओ ने 15 नवंबर को चंद्रपुर के प्रियदर्शिनी थिएटर में हजारो लोगों के सामने इस नाटक का मंचन किया। इंसान की जिंदगी में सुख-दु:ख आते-जाते रहते हैं। हर व्यक्ति अपने सामने आने वाली जिंदगी को अपने तरीके से जीता है। ठीक उसी तरह किसानों की ये विधवाएं अपनी जिंदगी से लड़ते हुए औरों के लिए एक मिसाल बन गयी हैं। पूरे देश में इस प्रकार का यह पहला नाटक है, जिसमें विधवाओं ने खुद अपना चरित्र साकार किया है। हरिष इथापे बताते हैं कि निर्देशक के तौर पर जब उन्होंने ‘तेरवा’ नाटक का मंचन देखा तो आंखें भर आयीं। इन महिलाओ को अन्य पेशेवर कलाकारों की तरह अभिनय करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। अपने जीवन को खुद मंच पर साकार किया। उनके अभिनय में एक प्रकार की सहजता थी। सहजता को दर्शकों की काफी सराहना मिली। सबसे अहम बात यह रही कि, ‘तेरवा’ के मंचन के समय इन विधवाओं के बच्चे और परिजन भी मौजूद थे। इससे उन्हें यह अहसास हुआ कि विधवा हुई उनकी मां, बहन, बेटी या बहू किस हिम्मत और शिद्दत से जिंदगी का सामना कर रही हैं।

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