राष्ट्रभाषा की वैश्विक यात्रा को लगे पंख

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अभी तक चर्चा का विषय रहता था- सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी। परन्तु दसवें हिन्दी सम्मेलन के फलस्वरूप दिशा परिवर्तन हो गया है। अब विमर्श का विषय बनेगा- ‘हिन्दी में सूचना प्रौद्योगिकी।’ यह प्रतिक्रिया थी दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अंतिम दिन एक अमेरिकी मूल की भारतीय नागरिक की।

वे दो दशक पूर्व भरत मुनि के अध्ययन के लिए भारत आई थीं और फिर यहीं की होकर रह गईं। पिछले चार दशकों में हिन्दी के उतार-चढ़ाव की विकास यात्रा को समझने-समझाने के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलनों के प्राप्त विवरण लाभकारी संदर्भ सिद्ध होते हैं।

विश्व हिन्दी सम्मेलनों की यात्रा ने भारत से प्रारंभ होकर मारीशस (तीन बार), त्रिनिदाद, इंग्लैण्ड, अमेरिका, सूरीनाम एवं दक्षिण अफ्रीका से होती हुई फिर से भारत के भोपाल में दसवां पड़ाव लिया। हर सम्मेलन में नए विषय, विमर्श के नवीन आयाम एवं संकल्पों की सुंदर उपयोगिता बरबस ही मन को उल्लासित करती है।

हिन्दी का संसार विस्तृत हुआ है, इसके और अधिक विस्तार की प्रबल संभावनाएं विद्यमान हैं। इसीलिए दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का मूल विषय रखा गया ‘हिन्दी जगत विस्तार एवं संभावनाएं।’ हिन्दी के वर्तमान वैश्विक रूप का विचार करें तो उसमें साहित्य के साथ-साथ अनेक आयाम जुड़े हैं, जिनसे न केवल हिन्दी का विस्तार हुआ है, परन्तु वे हिन्दी के साम्राज्य को विस्तृत करने के कारण भी बने हैं।

विश्व की शीर्षस्थ सूचना प्रौद्योगिकी की प्रयोगशालाओं ने संस्कृत, हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को अन्य भाषाओं विशेषकर यूरोप की भाषाओं से अधिक सशक्त, समृद्ध और वैज्ञानिक माना है। इससे संकेत मिलते हैं कि आज से दस साल बाद संगणक की भाषा कोई कृत्रिम भाषा न होकर संस्कृत होने वाली है।

 

पांच हजार से अधिक प्रतिनिधि आए

दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन पांच हजार से अधिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति में अत्यंत भव्य रामधारी सिंह दिनकर सभागार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया। मोदी ने यह कहकर कि ”यदि मुझे हिन्दी न आती तो मेरा क्या होता” हिन्दी की प्रतिष्ठा बढ़ाई। इसके साथ ही यह संदेश भी दिया कि हिन्दी ही देश की मुख्य भाषा हो सकती है।

इसी प्रकार समापन समारोह में भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आने वाले समय को सूचना प्रौद्योगिकी का युग बताया और आंकड़े देते हुए घोषणा की कि सूचना प्रौद्योगिकी में भी हिन्दी का ही बोलबाला रहने वाला है। समापन में सभी को अमिताभ बच्चन की प्रतीक्षा थी, परन्तु अस्वस्थ होने के कारण उनका भेजा हुआ पत्र आयोजन के उपाध्यक्ष अनिल दवे ने पढ़कर सुनाया।

सार रूप में कहा जाय तो एक अत्यंत भव्य और विशाल आयोजन अस्थाई रूप से निर्मित माखनलाल चतुर्वेदी नगर में सम्पन्न हुआ। 39 देशों से 100 से अधिक विदेशी विद्वानों ने सहभागिता की। लगभग 1300 ऐसे प्रतिभागी थे, जिन्होंने शुल्क देकर पंजीयन करवाया था। 300 के लगभग आमंत्रित अतिथि थे और लगभग 500 हिन्दी प्रेमी युवा विद्यार्थियों ने इसमें भाग लिया। विदेश मंत्रालय एवं मध्य प्रदेश सरकार मुख्य आयोजक थे। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय सहयोगी संस्था के रूप में इसमें कार्यरत था। अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल का योगदान भी सराहनीय रहा।

हिन्दी संस्कृत के निकटस्थ होने के कारण स्वयं महत्वपूर्ण बन जाने वाली है। इसी वजह से सम्मेलन में ‘विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी’ तथा ‘संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी’ दोनों मुख्य उप विषय के रूप में विमर्श के लिए आए।

जब हम हिन्दी के विस्तार की चर्चा करते हैं तो हिन्दी के सीखने-सिखाने का विषय उभरता है। इस विश्व हिन्दी सम्मेलन में ”विदेशियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधाएं”, ”विदेशों में हिन्दी के अध्ययन की सुविधाएं” एवं ”अन्य भाषा-भाषी प्रान्तों से आए प्रशासनिक अधिकारियों के लिए हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था” के विमर्शों में केवल वर्तमान की स्थितियों पर ही चर्चा नहीं हुई, परन्तु व्यावहारिक रूप में अनेकों कार्य-बिन्दु एवं योजनाएं प्रस्तावित हुईं।

उल्लेखनीय यह रहा कि सम्मेलन में उपस्थित राजनेताओं ने इन अनुशंसाओं को अमली जामा पहनाने के संकल्प स्वयं लिए। सरकारी क्षेत्रों में हिन्दी को किस प्रकार से निर्देशों एवं पत्राचार की भाषा बनाया जा सकता है, इस पर विशेष रूप से तीन उप विषय निर्धारित हुए थे- ”प्रशासन में हिन्दी”, ”विदेश-नीति में हिन्दी” तथा ”विधि तथा न्याय क्षेत्र में हिन्दी एवं भारतीय भाषायें”।

केवल हिन्दी के अध्येताओं के लिए ही नहीं, परन्तु उन सभी के लिए जो भाषा की यात्रा के अध्येता हैं, दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन अपने आपमें सिद्ध प्रमाण है कि किस प्रकार सामूहिक प्रयासों से भाषा को विकास के मार्ग पर तीव्र गति दी जा सकती है।

वैश्विक स्तर पर जब हिन्दी की बात चलती है तो गिरमिटिया देशों का योगदान सहज ही मानस पटल पर आता है। तीन सत्रों में चर्चित गिरमिटिया देशों में हिन्दी एक सार्थक विमर्श का मानो उत्सव बना हो। सुंदर निष्कर्ष उभरकर यह आया कि नौंवे विश्व हिन्दी सम्मेलन के पश्चात गिरमिटिया देशों में हिन्दी की यात्रा को उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं।

सम्मेलन के अवसर पर प्रवासी साहित्य ”जोहानसबर्ग से आगे” पुस्तक भी प्रकाशित हुई, जिसके प्रधान संपादक डॉ. कमल किशोर गोयनका हैं। इस पुस्तक के माध्यम से गिरमिटिया देशों एवं अन्य विदेशी साहित्यकारों ने जो पिछले तीन वर्ष में हिन्दी साहित्य में योगदान किया, उसका सम्पूर्ण विवरण उपलब्ध है।

समाज का बचपन जिस साहित्य को पढ़ता है, उसी से उस समाज के कल की बौद्धिक मानसिकता की रचना होती है। बालकों के वर्तमान साहित्य का सर्वेक्षण और भविष्य की योजना की रचना करने के लिए सम्मेलन का एक विषय ”बाल साहित्य में हिन्दी” रहा, जिसकी अध्यक्षता डॉ. बालशौरी रेड्डी ने की।

परन्तु दुखद समाचार यह रहा कि सम्मेलन से घर लौटकर उन्होंने इस संसार से अंतिम विदाई ले ली। परन्तु डॉ. रेड्डी का अमूल्य मार्ग-दर्शन आने वाले समय में बाल साहित्य की दिशा और दशा अवश्य बदलेगा और यही उनके प्रति हम सबकी श्रद्धांजलि भी होनी चाहिए।

मीडिया का महत्व मात्र समाज को संवादित रखना एवं समाज का मनोरंजन करना ही नहीं है। इसके अतिरिक्त समाज की भाषा का निर्माण भी मीडिया करता है। चिन्ता का विषय, सभी भाषाओं के लिए यह बन गया है कि मीडिया भाषा के संस्कार देने के कार्य में शिक्षक की भूमिका न लेकर पलायन कर रहा  है। दलील यह दी जा रही है कि मीडिया उसी भाषा का प्रयोग कर रहा है जो भाषा आज का युवा प्रयोग करता है। इस कारण से विशेषकर हिन्दी में गंभीर संक्रमण की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

“नौंवे विश्व हिन्दी सम्मेलन के पश्चात गिरमिटिया देशों में हिन्दी की यात्रा को उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं।”

बेहतर हिन्दी का शब्द होने पर भी कठिन अंग्रेजी के शब्दों का हिन्दी मीडिया प्रयोग कर रहा है। इसी विषय का विश्लेषण एवं सुधार का मार्ग निकालने के लिए तीन सत्रों वाला एक विषय था-”हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता”। अध्यक्षता (श्रीमती) मृणाल पाण्डे की थी, संयोजक राजेन्द्र शर्मा थे और मुख्य वक्ताओं में ओम थानवी, आलोक मेहता, डॉ. नरेन्द्र कोहली और राहुल देव थे। हर्ष का विषय है कि इस सत्र में प्रारंभिक छीटाकंशी और असहमति तो हुई, परन्तु अंत में सर्वसम्मति से अनुशंसाओं का अनुमोदन हुआ।

हिन्दी के विस्तार की संभावनाओं की बात करने पर प्रकाशन एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में समक्ष में आता है। इ-प्रकाशन और कागज पर मुद्रित पुस्तकों आदि की व्यावहारिक कठिनाइयों को सामने लाना और समाधान खोजना चर्चा का विषय रहा, एक सत्र में जिसका विषय था- ”देश और विदेश में प्रकाशन, समस्याएं एवं समाधान”।

हांलाकि सम्मेलन में उप-विषय कुल 12 थे, परन्तु विमर्शों का सिलसिला 28 सत्रों में चला। एक समय में चार समानांतर सत्र उद्घाटन और समापन के बीच में लगातार चले। पूर्व में हुए सम्मेलनों में समानांतर सत्रों में उपस्थिति कम और कभी-कभी तो नगण्य, केवल वक्ताओं की ही रहती थी। इस अनुभव के कारण सत्र-संचालन समिति में काफी चिन्ता रही। परन्तु आश्चर्य यह रहा कि कोई भी समानांतर सत्र ऐसा नहीं था, जिसमें बड़ी संख्या में प्रतिभागियों को खड़ा न रहना पड़ा हो।

इसके बावजूद कि हर समानांतर सत्र के कक्ष में 300 विद्वानों के बैठने की व्यवस्था थी। यदि बहुत संकुचित अनुमान भी लगाया जाय तो चारों समानांतर सत्रों में कुल मिलाकर हर समय कम से कम 2000 विद्वान प्रतिभागी उपस्थित रहते थे।

विशेष उल्लेखनीय व्यवस्था यह की गई थी कि हर विषय पर पूरा एक सत्र अनुशंसाओं पर चर्चा का रहा और हर विषय पर सर्वसम्मति से अनुशंसाएं पारित की गईं। इसी में एक विशेष कार्य इस सम्मेलन में यह भी हुआ कि सभी 12 विषयों की अनुशंसाएं समापन सत्र में पूरी सभा के सम्मुख संयोजकों ने प्रस्तुत की। यह सब उसी योजना के अंतर्गत हुआ जब प्रारंभ में ही संचालन समिति में निर्णय लिया गया था कि दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन व्यावहारिक सूत्रों को खोजने पर केन्द्रित हो, परिणाममूलक हो।

देश-विदेश से विद्वानों एवं शोधार्थियों द्वारा लिखे गए लगभग 200 लेख विदेश मंत्रालय में प्राप्त हुए थे। अंतरराष्ट्रीय परम्पराओं के अनुसार एक उच्च स्तरीय समिति ने इनमें से 27 लेखों को प्रस्तुति के लिए चयनित किया। एक अलग सभागार में दो दिन में चार सत्रों में इन आलेखों का वाचन हुआ एवं हर आलेख पर प्रश्नोत्तर एवं चर्चा हुई।

पूर्व में आयोजित सम्मेलनों की परम्परा के अनुसार दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी प्रदर्शनी की व्यवस्था हुई। ‘अभिज्ञानम मध्य प्रदेश’ नाम के अंतर्गत प्रदर्शनी में मध्य प्रदेश से संबंधित अनेकों साहित्यकारों का जीवन परिचय और साहित्य में योगदान सुरूचिपूर्ण तरीके से किया गया। अप्रैल 2016 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ की जानकारी भी इस प्रदर्शनी में दी गई।

प्रदर्शनी के दूसरे अंग में हिन्दी जगत के भविष्य की संकल्पनाएं देखने को मिली। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा संकल्पित इस प्रदर्शनी का शीर्षक था ‘हिन्दी कल आज और कल।’ इसमें अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की सूचना प्रौद्योगिकी की शीर्ष संस्थाओं ने कम्प्यूटर और मोबाइल के क्षेत्र में हिन्दी का उपयोग आज कितना सुलभ है और कल और कितना सरल होने वाला है, न केवल दिखाया परन्तु सिखाने की व्यवस्थाएं भी की।

संभवत: एप्पल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट एक छत के नीचे पहली बार भारतीय भाषाओं की सूचना प्रौद्योगिकी में उपस्थिति करवाने के लिए एक साथ एकत्र हुए। इसी प्रदर्शनी में हिन्दी के शीर्ष समाचारपत्रों में कौन-कौन से अंग्रेजी के शब्द अनावश्यक रूप से प्रयोग होते हैं, उनकी सूची भी प्रर्दिशत हुई।

इसी तरह हिन्दी भाषा किस प्रकार से अधिक सशक्त और समृद्ध है, यह दर्शाया गया, एक लम्बी सूची के माध्यम से, जिसमें वे हिन्दी के शब्द जो अंग्रेजी में रूपांतरित या अनुवादित हो ही नहीं सकते, सम्मिलित थे।

ऐसे शब्दों को धीरे-धीरे अंग्रेजी भाषा अपने आप में समाहित कर रही है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा प्रात: ”दैनिक सार” नामक समाचार पत्र प्रतिदिन प्रात: प्रतिभागियों में बंटता रहा।

व्यक्तिगत एवं मीडिया में आलोचना का विषय यह बना कि साहित्यकारों की संख्या पिछले सम्मेलन में अपेक्षाकृत कम रही। बेशक अधिक साहित्यकारों की सहभागिता से विमर्श अधिक सम्पन्न हो सकता था, परन्तु पंजीयन के लिए किसी को भी रोक नहीं थी। हर हिन्दी प्रेमी पंजीयन के लिए आमंत्रित था। दूसरा सम्मेलन का मूल विषय साहित्य नहीं था। वह था- हिन्दी संसार, और यह संसार साहित्योत्तर बहुत विशाल है। हर सम्मेलन में आने वाला प्रतिभागी जहां कुछ महत्वपूर्ण विचार देता है, वहीं कुछ लेकर भी जाता है। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रत्येक रचनाकार के मन में यह तो एक बार स्थापित हो ही गया होगा कि अद्यतन सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके रचनाओं में सहजता और सुलभता आती है, परन्तु रचनाओं की पहुंच को अत्यंत बड़े संसार तक पहुंचाने में भी इन्टरनेट और मोबाइल बड़े सशक्त साधन हैं।

इसके अतिरिक्त एक बड़ा संदेश यह भी प्रसारित हुआ कि सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी का प्रयोग करना अत्यंत सहज और सरल है। अंग्रेजी के प्रयोग से अधिक नहीं तो उतना ही आसान और उपयोगी तो है ही।

यही कारण है कि सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों ने प्रयास प्रारंभ कर दिए हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी की रचना की भाषा भी हिन्दी को बनाया जाय। यह जब हो जाएगा, तब संयुक्त राष्ट्र संघ स्व-प्रेरणा से और निवेदन करके हिन्दी को अपनी भाषा बनायेगा।

 

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