पंचायत प्रणाली की अलख जगाने बढ़े कदम

जनता की जरूरतों पर पिछले कुछ समय से बड़ी गंभीर पहल हुई है और इसके बेहतर नतीजे भी निकले हैं। फिर भी आश्चर्य है कि महात्मा गांधी को शिद्दत से याद करने के बावजूद उनकी परिकल्पना की पंचायती प्रणाली को भुला दिया गया। इस प्रणाली को पुनर्जीवन देने के विचार के साथ हाल ही में एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी हुई।

राष्ट्रीय राजनीति के जरिए समाज में तमाम सकारात्मक पहल के बावजूद पंचायत प्रणाली बहस और प्राथमिकता में नहीं है। दुखद है कि करीब-करीब यह मान कर चला जा रहा है कि 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन के साथ देश में पंचायत प्रणाली लागू हो चुकी है। इसके विपरीत यह साबित हो चुका है कि ये संशोधन भी दोषपूर्ण हैं। सही मायनों में पंचायत की कल्पना के आधार पर राज्य-व्यवस्था बने, इस पर कोई बोल भी नहीं रहा है। ऐसा मानने वाले लोग नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में मिले। विचार विमर्श में शामिल लोगों ने महसूस किया कि इस विषय की उपेक्षा ठीक नहीं है।
प्रमुख राजनयिक और पूर्व सांसद डॉ. महेश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता में विचार विमर्श के लिए एकत्रित लोगों ने संविधान संशोधन के उन बिंदुओं पर बातचीत की, जिनके अंतर्गत पंचायतों को सेल्फ गवर्नमेंट के रूप में विकसित करने का प्रावधान है। विषय प्रवर्तन तीसरी सरकार अभियान के संस्थापक तथा सीडीएस के महासचिव चंद्रशेखर प्राण ने किया। चंद्रशेखर प्राण ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के 71 साल और संविधान संशोधन के 25 वर्ष बीत जाने के बाद भी बापू की वसीयत के अनुरूप ग्राम स्वराज्य की स्थापना नहीं हो सकी। इसके लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिनमें इच्छा शक्ति का अभाव है। वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने पंचायती राज आंदोलन को पुनर्जागृत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने इस मसले पर अधिक से अधिक जागरूकता की जरूरत बतायी और कहा कि इसे आंदोलन खड़ा करने के स्तर तक ले जाना होगा। राय ने कहा कि आंदोलन से नेतृत्व खड़ा होगा और नेतृत्व ही आंदोलन के प्रति आकर्षण पैदा करता है। उन्होंने कहा कि यह साफ तौर पर समझा जा सकता है कि आज कई तरह की समस्याओं का समाधान पंचायती व्यवस्था के जरिए मुमकिन है। इनमें बेरोजगारी के चलते गांवों से शहरों की ओर पलायन और कृषिगत समस्याएं शामिल हैं। कुल मिलाकर पंचायत प्रणाली के लिए चेतना जरूरी है, केवल संविधान संशोधनों से काम नहीं चलेगा। रामबहादुर राय के मुताबिक, गांधी के 150 वें साल में हम ऐसा कर सके तो उससे उनकी परिकल्पना पूरी होगी।
विमर्श में शामिल प्रतिनिधियों ने गांव- समाज, पंचायत , देश की राज- व्यवस्था तथा 73 वें संविधान संशोधन के विविध पक्षों पर समीक्षा तथा सुझाव प्रस्तुत किए। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव शरद चन्द्र बेहार ने संविधान में एक नये संशोधन की आवश्यकता बताते हुए सुझाव दिया कि सभी राज्यों के पंचायत अधिनियम को ग्राम स्वराज्य अधिनियम के रूप में संशोधित किया जाना चाहिए। उनके अनुसार सिर्फ ग्राम या पंचायत के मुद्दे पर ही नहीं, बल्कि सत्ता के सारे श्रोतों का विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिए। उन्होने प्रस्ताव रखा कि ग्राम स्वराज्य के लिए आने वाले लोक सभा चुनाव के समय एक लोक घोषणा पत्र तैयार करके सभी राजनीतिक दलों को देना चाहिए और उसे अपने पार्टी घोषणा पत्र में शामिल किए जाने का दबाव बनाना चाहिए। ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट तथा गांधी ग्राम विश्वविद्यालय मदुरई के पूर्व कुलपति प्रो॰ करुनाकरन ने पंचायत चुनावों में राजनीतिक दलों की सीधी भागीदारी का विरोध करते हुए भारतीय समाज के समुदाय आधारित स्वरूप पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि ग्राम सभा, जो आज की तारीख में मिथक बन कर रह गई है, उसको प्रभावी बनाने के लिए समूह की अवधारणा को व्यवहारिक रूप में स्वीकार करना होगा।
भारत सरकार के पूर्व कृषि सचिव रंजन दत्ता ने पंचायत व्यवस्था में राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप के दुष्परिणामों की चर्चा की। दत्ता ने कहा कि बापू के ग्राम स्वराज्य के अभीष्ट की प्राप्ति में यह हस्तक्षेप सबसे बड़ा अवरोध है। उन्होंने पंचायतों की स्वायत्तता की वकालत करते हुए उसे स्थानीय सरकार के रूप में विकसित करने पर जोर दिया। उत्तर प्रदेश के पूर्व पंचायतीराज मंत्री बालेश्वर त्यागी ने अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए बताया कि सामान्यत? विधायक नहीं चाहते कि पंचायतों को उनका अधिकार मिले। उन्होने अपने कार्यकाल में प्राथमिक शिक्षकों पर नियंत्रण का अधिकार पंचायत को दिये जाने के विरोध में शिक्षकों द्वारा किए गए आंदोलन की चर्चा करते हुए राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी का हवाला दिया। खादी आयोग के पूर्व अध्यक्ष महेश शर्मा ने गांव समाज के पुनर्जागरण पर ज़ोर देते हुए ग्राम स्वराज्य की अवधारणा को जमीन पर उतारने के लिए 73वें संविधान संशोधन को नये से से मूल्यांकित करने और फिर उसके अनुसार उसमें बदलाव की आवश्यकता को अत्यंत जरूरी बताया। जीवन विद्या संस्थान के प्रमुख रणसिंह आर्य के अनुसार 73वां संशोधन अपने आप में एक भूल भुलैया जैसा होकर रह गया है। लोगों को गांव का महत्व ही समझ में नहीं आ रहा है। इसके चलते पंचायत व्यवस्था को लागू करने में राजनीतिक इच्छा शक्ति का गहरा आभाव दिखाई पड़ता है। किसान मोर्चे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश चन्द्र सिरोही ने पंचायत व्यवस्था के सही रूप से विकास के लिए आज के राजनीतिक चरित्र के बदलाव की बात की। प्रमुख समाजशास्त्री बनवारी ने पंचायत के पारंपरिक स्वरूप की चर्चा करते हुए उसे वर्तमान लोकतन्त्र की बहुमत आधारित प्रणाली से अलग सहमति पर आधारित एक विशिष्ट जीवन शैली के रूप में चिह्नित किया। उन्होंने उसको उसी विशिष्टता के साथ विकसित करने पर जोर दिया।
भारत सरकार की संस्था राष्ट्रीय ग्रामीण विकास तथा पंचायतीराज संस्थान हैदराबाद के प्रतिनिधि प्रो. ए. के. भांजा ने 73वें संविधान संशोधन की कमियों तथा वर्तमान पंचायतीराज व्यवस्था की विसंगतियों का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार तथा भारत सरकार के स्तर पर किए जाने वाले सुधारों एवं बदलावों पर अपना सुझाव दिया। उनके अनुसार ग्राम पंचायतों के आकारों में विविधता, राज्य चुनाव आयोग में राज्य सरकार का हस्तक्षेप, तीनों स्तरों की पंचायतों में समन्वयन का अभाव तथा परंपरागत पंचायत तथा संवैधानिक पंचायत के मध्य तालमेल का अभाव जैसे तथ्यों को शामिल करते हुए उसमें सुधार अथवा बदलाव पर जोर दिया।
पूर्व पुलिस महानिदेशक तथा सामाजिक सद्भाव के लिए कार्य कर रहे आर. एन. सिंह ने ग्राम पंचायतन की विशेषताओं की चर्चा की। उन्होने सुझाव दिया कि गांव के स्तर पर ही पंचायत की संरचना नहीं हो, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी सर्व सहमति वाली प्रणाली की पंचायत लागू हो। इसके लिए सभी राजनैतिक पार्टी आपस में मिल कर ग्राम के पंचायतन को पुनर्स्थापित करें। केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार के पूर्व कुलपति प्रो. जनक पाण्डेय ने गांव के सामाजिक मनोविज्ञान के विविध पक्षों का उल्लेख करते हुए लोक भागीदारी और लोक स्वीकृति के लिए पंचायत प्रणाली को नये सिरे से विकसित करने पर ज़ोर दिया। उनके अनुसार गाँव के सामाजिक धरातल को ऊर्जावान बनाने के लिए गांव से बाहर जा कर प्रवास कर रहे समर्थनवान लोगों का संगठन अप्रवासी ग्रामीण (ठफश्) के गठन को सभी गाँवों में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
प्रमुख शिक्षाविद डॉ. बी आर पाटिल, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राम सूरत सिंह, शोभित विश्वविद्यालय के चांसलर कुंवर शेखर, आर्ट आॅफ लिविंग के ट्रस्टी विक्रम देश, सिटीजनशिप डेवलपमेंट सोसाइटी के सचिव बालकृष्ण , इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, कौशल किशोर, राजीव थपियाल, नेहरू युवा केंद्र संगठन के पूर्व राज्य निदेशक आर पी एस ठाकुर , ऋषिपाल सिंह तथा संवाद मीडिया के प्रमुख विमल कुमार ने भी अपने सुझाव रखे।

डॉ. महेश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता में विचार विमर्श के लिए एकत्रित लोगों ने संविधान संशोधन के उन बिंदुओं पर बातचीत की, जिनके अंतर्गत पंचायतों को सेल्फ गवर्नमेंट के रूप में विकसित करने का प्रावधान है।

डॉ. महेश चन्द्र शर्मा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में सभी वक्ताओं के सुझावों को संकलित करते हुए पंचायत व स्थानीय स्वशासन की अवधारणा के विभेद को स्पष्ट किया। साथ ही उन्होने दल विहीन लोकतन्त्र संघात्मक सरकार के व्यवहार, समाज के विभाजन का वर्तमान स्वरूप, सत्ता का केन्द्रीकरण, पंचायत का बीजभूत अर्थ, बहुमत आधारित चुनाव पद्धति तथा दुनिया के अन्य देशों की स्थानीय सरकार जैसे विषयों पर नये सिरे से सोचने और समझने की आवश्यकता पर जोर दिया।इसी के साथ विमर्श की इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर देश के प्रबुध्द व सामान्य जनों को जोड़ने तथा एडोकेशी व जन दबाव हेतु राष्ट्रीय स्तर पर एक फोरम तैयार करने का प्रस्ताव पद्मश्री राम बहादुर राय द्वारा रखा गया। इसपर सभी प्रतिनिधियों ने अपनी सहमति व्यक्त की। तय किया गया कि ग्राम स्वराज और पंचायती प्रणाली पर जेसी कुमारप्पा जैसे विद्वानों की प्रस्तुतियों को समझा जाय और ग्राम पंचायतों के लिए प्रस्तावित सभी 29 विषय पंचायतों को ही सौंपा जाना चाहिए।

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