तीर्थयात्रा ‘दौलतपुर’

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मभूमि दौलतपुर को निश्चित रूप से राष्ट्रीय तीर्थ की प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए। समाज इस कर्तव्य-बोध के प्रति सजग-सचेष्ट और कृतसंकल्प हो। उत्तर प्रदेश और केन्द्र की सरकारों को आगे बढ़कर ठोस कदम उठाना चाहिए। किसी विश्वविद्यालय का नामकरण भी उनके नाम पर किया जाए।

भारतीय संस्कृति में तीर्थ-यात्रा की विशेष मान्यता है। सयाने कहते हैं कि जब पुण्य फलते हैं तब तीर्थ यात्रा का बुलावा आता है। कुछ ऐसा ही संयोग बना 24 नवंबर 2018 को, जब हमें हिन्दी के उन्नायक, संपादन-कला के आचार्य और साहित्य मर्मज्ञ पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मभूमि दौलतपुर की पावन माटी को प्रणाम करने का सुअवसर मिला। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति रायबरेली, बीते 21 वर्षों से हिन्दी के पुरोधा आचार्य के महान अवदान के प्रति कृतज्ञताज्ञा पन एवं पुण्य-स्मरण का अनुष्ठान करती आ रही है। इसी शृंखला में इस वर्ष हमें बुलाया गया था – माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल के प्रतिनिधि के रूप में। यहां उल्लेख करना प्रासंगिक है कि जनवरी 1900 में इंडियन प्रेस प्रयाग से बाबू चिंतामणि घोष ने मासिक ‘सरस्वती’ का प्रकाशन आरंभ किया।

आचार्य द्विवेदी ने तीसरे वर्ष इसका संपादन दायित्व ग्रहण किया। पंडित माधवराव सप्रे ने जनवरी 1900 में पेंड्रा रोड से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन आरंभ किया। तमाम गुणवत्ता और भरपूर संभावना जगाने के बावजूद मित्र को बंद कर देना पड़ा, क्योंकि कोई चिंतामणि घोष और ‘इंडियन प्रेस’ सप्रे जी की सहायता के लिए उपस्थित नहीं था। उधर द्विवेदी जी के पारस संस्पर्श से ‘सरस्वती’ सार्थक उपक्रम के सोपान चढ़ती रही। आचार्य जी के 18 वर्षीय संपादन काल में ‘सरस्वती’ हिन्दी की कालजयी पत्रिका के रूप में सुप्रतिष्ठित हुई। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और पं. माधवराव सप्रे के बीच लेखक-संपादक का परस्पर आदर-भाव का नाता था। सप्रे जी के निबंध ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होते रहे।

द्विवेदी जी, सप्रे जी की विद्वता से प्रभावित थे। उनका सम्मान करते थे। नागरी प्रचारिणी सभा की विज्ञान कोश परियोजना में अर्थशास्त्र वाला खण्ड सप्रे जी ने ही तैयार किया था। जब द्विवेदी जी संपत्ति शास्त्र लिखने की तैयारी कर रहे थे, तब उन्होंने सप्रे जी को इस बाबत पत्र लिखा। संपत्ति शास्त्र की भूमिका में द्विवेदी जी ने इस प्रसंग का उल्लेख किया है – ‘‘संपत्ति शास्त्र विषयक पुस्तकों की जरूरत को पूरा करने – इस अभाव को दूर करने – की, जहां तक हम जानते हैं, सबसे पहले पंडित माधवराव सप्रे, बीए ने चेष्टा की। हिन्दी में अर्थशास्त्र संबंधी एक पुस्तक लिखे आपको बहुत दिन हुए। परंतु पुस्तक आपके मन की न होने के कारण उसे प्रकाशित करना आपने उचित नहीं समझा। आपकी राय है कि अर्थशास्त्र संबंधी पुस्तक ऐसी होनी चाहिए जिसमें इस देश की सांपत्तिक अवस्था का विचार विशेष प्रकार से किया गया हो। यहां की स्थिति के अनुसार संपत्ति शास्त्र के सिद्धांतों का प्रयोग करके उनके फलाफल का विचार जिस पुस्तक में न किया जाएगा वह, आपकी सम्मति में, यथेष्ठ उपयोगी न होगी। आपका कहना बहुत ठीक है। आपको जब हमने लिखा कि संपत्ति शास्त्र पर हम एक पुस्तक लिखने का इरादा रखते हैं तब आपने प्रसन्नता प्रकट की और अपनी हस्तलिखित पुस्तक हमें भेज दी।

उससे हमने बहुत लाभ उठाया है। एतदर्थ हम आपके बहुत कृतज्ञ हैं।’’ (संपत्ति शास्त्र पुस्तक की भूमिका, 15 दिसंबर 1907)। उपर्युक्तउल्लेख से पता चलता है कि उस युग की दोनों विभूतियों के संबंध कितने आत्मीय थे। उनके विचार और प्राथमिकताएं कितने समान और सम्पूरक थे। उनमें बड़प्पन की गहराई थी। यही पृष्ठभूमि है, जब सप्रे संग्रहालय ने राष्ट्रीय स्मारक समिति के पुस्तकालय के लिए द्विवेदी युगीन ‘सरस्वती’ की प्रतियां भेंट कीं, तब मानो दो समान कुलशील संस्थाओं का नाता भी उन्हीं पुण्यात्माओं की तरह अटूट हो गया। रायबरेली के फिरोज गांधी कॉलेज के सभागार में समवेत सैकड़ों सुधीजनों ने करतल ध्वनि से इस सुसंयोग का स्वागत किया। तीर्थ यात्रा का आरंभ रायबरेली के प्रशासनिक परिसर में स्थापित आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और चरण वंदना के साथ हुआ। फिर डेढ़ घंटे की दूरी तय कर दौलतपुर पहुंचे। छोटा-सा गांव दौलतपुर परंतु बहुत बड़ा तीर्थ, हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान का ‘लाइट हाउस’। ‘सरस्वती’ ने भाषा का संस्कार और साहित्य का परिष्कार किया। द्विवेदी जी ने उसे सकल ज्ञान-विज्ञान की पत्रिका का मानक स्वरूप प्रदान किया था। वे उस उच्चतम कोटि के संपादक थे जो पत्रिका के लिए सामग्री का चयन पाठक समाज के ज्ञान और विवेक को समुन्नत करने के उद्देश्य से करते थे। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक कालखण्ड ‘द्विवेदी युग’ के नाम से जाना जाता है। दौलतपुर में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर चरण-रज ली। आचार्य जी ने यहां एक छोटा-सा सुंदर मंदिर बनवाया था।

उसमें तीन प्रतिमाएं विराजित हैं। देवी सरस्वती और देवी लक्ष्मी की प्रतिमाओं के मध्य आचार्य जी ने अपनी गृह लक्ष्मी की प्रतिमा भी स्थापित की। तत्कालीन पुरातन पंथी समाज ने इसके लिए उनकी खिल्ली उड़ाई थी। परंतु मंदिर की छांव में हमें एहसास होता है कि तब आचार्य जी ने कितनी क्रांतिकारी पहल की थी। समाज को प्रेरक संदेश दिया था। दौलतपुर से रायबरेली लौटे। वहां समाज के सभी वर्गों की श्रेयस्कर उपस्थिति में आचार्य द्विवेदी स्मृति समारोह संपन्न हुआ। इसमें विशेष उल्लेखनीय रहा ट्रांसजेंडर मां गौरी सावंत का अभिनंदन, जो अनाथ बच्ची की मां बनी हैं। ममतामयी संवेदना और दायित्व से सराबोर मां। अनाथ बच्चों की परवरिश के लिए ‘नानी का घर’ बनाने का संकल्प साकार करने में जुटी हैं। कोई पत्रकार सकारात्मक सोच और सर्वसमावेशी व्यवहार से कैसी रचनात्मकता जाग्रत कर सकता है, इसका जीवंत साक्ष्य हैं रायबरेली के पत्रकार गौरव अवस्थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति के संयोजक के रूप में उन्होंने एक ध्येय-निष्ठ परिवार संजोया है। एक विशाल कुटुम्ब जिसका दायरा बढ़ता ही जाता है। ईश्वर गौरव अवस्थी और उनके अनन्य सहयोगियों का द्विवेदी-मनोरथ पूरा करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here