साहित्य से जुड़ता फिल्मों का नाता

नौसेना अधिकारी हरिंदर सिक्का की किताब ‘कालिंग सहमत’ पर बनी मेघना गुलजार की फिल्म ‘राजी’ की सफलता ने यह भ्रम कुछ हद तक जरूर तोड़ दिया है कि फिक्शन या नान फिक्शन पर हिट फिल्म नहीं बनाई जा सकती। हालांकि पिछले साल सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म ‘नूर’ पाकिस्तान की लेखिका सबा इम्तियाज के उपन्यास ‘कराची: यू आर किलिंग’ पर बनी थी और खास चल नहीं पाई थी। बाक्स आफिस पर फिल्मों का उतार-चढ़ाव कुछ भी हो, फिलहाल सराही जा चुकी किताबों पर फिल्में बनाने का सिलसिला कुछ ज्यादा बढ़ गया है। इसमें काल्पनिक कथाओं पर भी जोर है, तो यात्रा वृतांत या लेखक के अपने अनुभव पर लिखे को भी महत्व दिया जा रहा है। मसलन अंग्रेजी उपन्यास ‘कन्फेशन आॅफ द ठग’ पर आदित्य चोपड़ा ने अमिताभ बच्चन व आमिर खान को लेकर ‘ठग्स आॅफ हिंदोस्तान’ बनाई तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर केंद्रित संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ भी फिल्म का आधार बनी है। अनुजा चौहान की किताब ‘द जोया फैक्टर’ हो या पौला हाकिंस की ‘द गर्ल आॅन ट्रेन’ अथवा एड्रियन लैवी व कैथीस्कॉट क्लार्क की ‘द एक्जाइल’ या जॉन ग्रीन की कृति ‘द फॉल्ट इन आॅर स्टार्स’ सभी निमार्ताओं को लुभा चुकी हैं।

ाासाहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाना बहुत आसान नहीं रहा। इसके बावजूद निमार्ताओं ने इस क्षेत्र में खूब प्रयोग किए। समय-समय पर रचनाकार की ओर से अपनी कृति की मूल भावना से छेड़छाड़ के आरोप भी लगे। फिर भी काल्पनिकता और दूसरी कई वजहों से हाल में आईं कुछ फिल्में उम्मीद जगाती हैं।

हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में लिखी किताबों पर कुछ फिल्में पहले भी बनी हैं। ऐसी फिल्में फिर से बननी शुरू हो गई हैं तो यह एक स्वस्थ संकेत है। राम कुमार सिंह की ‘जेड प्लस’ और रवींद्र नाथ टैगोर की रचना पर आधारित ‘बायस्कोप वाला’ जैसी फिल्में उम्मीद जगाती हैं कि अंग्रेजी से इतर साहित्य से भी फिल्मों का नाता जुड़ता रहेगा। ज्ञान चतुवेर्दी की किताब ‘बारहमासी’ पर फिल्म बन ही रही है।
कुछ समय पहले तक चेतन भगत के कथित रूप से आत्मकथा पर आधारित उपन्यासों को फिल्मी रूप देने का प्रयोग थोड़ा बहुत सफल रहा, फिर भी यह रिवाज खत्म मान लिया गया था। बहुत पहले साठ-सत्तर के दशक में उस समय के मशहूर लेखक गुलशन नंदा के उपन्यासों पर जरूर आधा दर्जन से ज्यादा फिल्में बनीं। वजह यह नहीं थी कि उन्होंने अनूठे विषय उठाए। औसत फिल्मी पटकथा में जिन तत्वों का समावेश किया जाता है, उन्हीं तत्वों को गुलशन नंदा ने अपने उपन्यासों में भूरपूर ठूंसा। निमार्ताओं को उनका मनचाहा पका पकाया माल मिल गया तो उन्होंने हाथोंहाथ उन उपन्यासों को लिया। हालांकि जल्दी ही यह प्रयोग नाकाम भी हो गया।

फिल्म से अधिक नाटकों को मिली सफलता
कई साहित्यिक कृतियां रंगमंच पर जितनी सराही गईं, उतनी सफलता उन्हें फिल्मी रूप में नही मिली। ‘आषाढ़ का एक दिन’ मोहन राकेश का एक बेहद चर्चित नाटक था। मणि कौल ने इस पर फिल्म बनाई लेकिन वह उतनी लोकप्रियता नहीं पा सकी। अभिनेता से निमार्ता बने ओम शिवपुरी और निर्देशक बासु भट्टाचार्य के बीच मतभेद हो जाने की वजह से मोहन राकेश के एक और प्रसिद्ध नाटक ‘आधे अधूरे’ पर फिल्म बनते-बनते रह गई। धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ पर नाटक भी सफल रहे और श्याम बेनेगल की बनाई हुई फिल्म भी। मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा पर श्याम बेनेगल ने ही बेहद कुशलता से ‘भूमिका’ बनाई। विभाजन की त्रासदी पर लिखा गया भीष्म साहनी का उपन्यास ‘तमस’ मूल रूप से टीवी सीरियल के रूप में सामने आया। बाद में इसे पांच घंटे की फिल्म की शक्ल दे दी गई।

साहित्य के प्रति मुंबइया फिल्मकारों का अजीब किस्म का पारंपरिक दुराव रहा है। पिछले कुछ समय से कुछ अलग तरह के विषय उठा कर फिल्म बनाने का जोखिम जरूर उठाया जा रहा है। इसी का नतीजा है कि साहित्य से फिल्मों का नाता फिर से जुड़ रहा है। असल में कुछ पूर्वग्रहों से फिल्मकार ग्रस्त रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी धारणा तो यही है कि साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में सफल नहीं होतीं। उनमें मनोरंजन के तत्व नहीं होते। एक सुनहरा स्वप्नलोक नहीं होता। जिंदगी का रूखा सूखा तल्ख सच उसमें होता है। इसकी वजह से आम दर्शक साहित्य पर बनी फिल्म से जुड़ नहीं पाते। दूसरी समस्या किसी उपन्यास को फिल्मी रूप देने की है। दोनों विधाएं अलग हैं। साहित्यकार जो लिखता है, उसे उसकी मूल भावना के साथ फिल्माना आसान नहीं होता। कई बार ऐसा हुआ है कि किसी उपन्यास पर फिल्म बनी और उसके लेखक को शिकायत हुई कि उसके कथ्य की आत्मा को फिल्म ने ध्वस्त कर दिया। इस स्थिति से बचने के लिए ही गुरुदत्त ने विमल मित्र के बांग्ला उपन्यास पर ‘साहिब बीबी और गुलाम’ बनाते समय उसकी पटकथा तैयार करने का जिम्मा विमल मित्र को ही सौंप दिया था। क्षेत्रीय भाषाओं की, खास कर बांग्ला, मराठी व मलयालम भाषाओँ की फिल्मों में साहित्य को जरूर प्रधानता दी गई। हिंदी फिल्मों में इस तरह की फिल्में कम बनीं। चालीस के दशक में मुंशी प्रेमचंद, उपेंद्र नाथ अश्क, भगवती चरण वर्मा, अमृत लाल नागर, डाक्टर धर्मवीर भारती जैसे कई साहित्यकारों ने फिल्मों के लिए भी लेखन किया। सत्तर के दशक में कमलेश्वर, शरद जोशी व मनोहर श्याम जोशी भी मैदान में कूदे।

फिर भी फिल्मी दुनिया के रंग-ढंग में उनकी रचनाधर्मिता विस्तार नहीं ले सकी। फिल्मी माहौल में वे सहज नहीं हो पाए। इसीलिए कोई साहित्यकार फिल्मों में ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया।
यह सही है कि साहित्यिक कृतियों पर बनी ज्यादातर फिल्में व्यावसायिक सफलता नहीं पा सकीं। इसकी एक और वजह भी है। साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों में अपवाद के रूप में कुछ को छोड़ कर किसी बड़े स्टार ने काम करने में रुचि नहीं ली। बहरहाल, हिंदी साहित्य पर बनी कुछ फिल्में चर्चित भी हुईं। मुंशी प्रेमचंद फिल्मों के लिए मौलिक लेखन में तो सफल नहीं हो पाए लेकिन उनके उपन्यासों और कहानियों पर ‘गबन’, ‘गोदान’, ‘हीरा मोती’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी कई फिल्में बनीं। 1979 में सत्येन बोस के निर्देशन में बनीं ‘सांच को आंच नहीं’ का मूल आधार प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ से लिया गया था। 1941 में केदार शर्मा ने भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ को फिल्मी रूप दिया। फिल्म के हिट होने की अलग-अलग वजह मानी जाती है। कुछ इसका श्रेय महताब के अर्धनग्न स्नान को देते हैं तो कुछ सांसारिकता व आध्यात्मिकता के पक्ष-विपक्ष में दिए गए चुटीले संवादों को। 23 साल बाद केदार शर्मा ने फिर ‘चित्रलेखा’ बनाई। ‘संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे’ जैसे साहिर लुधियानवी के गीत के बावजूद फिल्म सफल नहीं हो पाई। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मारे गए गुलफाम’ पर गीतकार शैलेंद्र ने जब ‘तीसरी कसम’ बनाई तो मित्रता के नाते राज कपूर व वहीदा रहमान जैसे सितारों ने फिल्म में काम कर लिया। लेकिन जैनेंद्र जैन के उपन्यास पर ‘त्याग पत्र’ बनाते समय निमार्ता को नए कलाकारों से गुजारा करना पड़ा। बड़े सितारों के आसानी से उपलब्ध न हो पाने की वजह से साहित्य पर बनी ज्यादातर फिल्मों की यही नियति रही। सद्भावना के नाते राखी ने रमेश बक्षी के उपन्यास पर बनी ‘27 डाउन’ में काम कर लिया। मोहन राकेश के उपन्यास पर ‘उसकी रोटी’ बनाते समय मणिकौल को ऐसा कोई सहारा नहीं मिला। ऐसे ही हालात में कुमार शाहनी ने निर्मल वर्मा के उपन्यास पर फिल्म ‘माया दर्पण’ बनाई। यही स्थिति राजेंद्र यादव के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘सारा आकाश’ के साथ रही। मन्नू भंडारी की कहानी पर बनी ‘रजनीगंधा’ की सफलता चौंकाने वाली रही। हालांकि उस दौर में कम बजट की, नए चेहरों और मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि की फिल्में पसंद की जाने लगी थीं।
गीता बाली ने राजिंदर सिंह बेदी के उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ पर फिल्म बनानी शुरू की लेकिन चेचक की वजह से असमय उनकी मौत हो जाने की वजह से फिल्म अटक गई। 1986 में सुखविंदर चड्ढा ने फिर कोशिश की। फिल्म सफल भी हुई और खास बात यह है कि इसमें हेमा मालिनी, ऋषि कपूर व पूनम ढिल्लो जैसे सितारों ने काम किया। राजिंदर सिंह बेदी की कहानी पर ‘गर्म कोट’ बनी। अपनी कहानियों पर खुद बेदी ने ‘दस्तक’ व ‘फागुन’ बनाईं। इसके बावजूद किसी साहित्यिक कृति पर बड़े सितारों को लेकर फिल्म बनाने की कोई पहल नहीं हुई।
वैसे यह हमेशा अनिश्चित ही रहा कि क्या सितारों की मौजूदगी साहित्यिक फिल्मों को सफल करा सकती है। विजयदान देथा के उपन्यास पर शाहरुख खान ने कुछ साल पहले ‘पहेली’ बनाई थी। वे खुद भी फिल्म में थे और रानी मुखर्जी व जूही चावला भी। लेकिन फिल्म नहीं चली। उससे ज्यादा तो 1973 में इसी कथानक पर बनी ‘दुविधा’ पसंद की गई। मणि कौल की इस फिल्म में अनजाने कलाकार थे।
जहां बड़े-बड़े साहित्यकार नाकाम हो गए, वहां गुलशन नंदा और फिर चेतन भगत की सफलता ने बता दिया कि मौलिक लेखन में नाटकीयता और रोमांचकता के फिल्मी तत्व जुड़ जाएं तो उसके लिए फिल्मों में पुख्ता जमीन बन सकती है। गुलशन नंदा के उपन्यासों में कल्पना की एक ऐसी रंग बिरंगी दुनिया होती थी जिसमें स्वाभाविकता का रत्ती भर भी अंश नहीं होता था। इसीलिए उनके आधा दर्जन से ज्यादा उपन्यासों पर फिल्में बनीं। सफल भी हुईं। निर्मताओं को उनकी कहानी भाई, क्योंकि वह उनकी शर्तों को पूरा करती थी और बड़े सितारों को भी वह अपने लिए फायदेमंद लगती थी। उसी राह पर चेतन भगत रहे। ह्यटू स्टेट्सह्ण की कामयाबी ने उनकी उपयोगिता बढ़ा दी है।

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