विदेशी फिल्मों में भारतीय कहां?

0
13
TODAY -- Pictured: Priyanka Chopra on Jan. 18, 2018 -- (Photo by: Mike Smith/NBC/NBCU Photo Bank)

सलमान खान की फिल्म ‘भारत’ की बजाए हॉलीवुड की फिल्म ‘कॉउब्वाय निंजा’ को प्राथमिकता देकर प्रियंका चोपड़ा ने फिर इस चर्चा को जिंदा कर दिया है कि हॉलीवुड में क्या देसी चेहरों की कोई मजबूत पहचान बन सकती है? सालों पहले जेम्स बांड की फिल्म ‘आॅन हर मैजेस्टीज सीक्रेट सर्विस’ में जाहिरा की मौजूदगी कोई सुर्खी नहीं बन पाई थी। तब से यह धारणा बनी हुई है भारतीय नायिकाओं के लिए हॉलीवुड की फिल्मों में कोई गुंजाइश नहीं बन सकती। अरसे बाद मल्लिका सहरावत ने कोशिश की लेकिन उस चक्कर में अपना देसी करिअर गंवा बैठीं। पिछले दिनों प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण ने बदलाव की संभावना जगाई। अमेरिका टीवी सीरिज ‘क्वांटिको’ में ख्याति पाने के बाद वे जोर शोर से बनी फिल्म ‘बेवाच’ बुरी तरह पिट गई। यही हाल दीपिका पादुकोण की ‘ट्रिपल एक्स सीरिज’ की ताजा फिल्म का हुआ।
प्रियंका चोपड़ा को हॉलीवुड की एक और फिल्म मिल गई है,दीपिका को भी मिल सकती है। लेकिन भारत में उनका जैसा रुतबा है, क्या वह हॉलीवुड में भी बन पाएगा? कुछेक का खूंटा गड़ा भी है। फिर भी शशि कपूर, नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, ऐश्वर्य राय और इरफान खान आदि में से इरफान ही अकेले हैं जिनकी पारी ज्यादा लंबी खिंची है।
एक दर्जन से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट का हिस्सा बन चुके इरफान पिछले साल हॉलीवुड के सितारे टाम हैंक्स की फिल्म ‘इन्फर्नो’ में दिखे। हिंदी फिल्मों से जुड़े होने के बावजूद देसी फिल्मों के खिलाफ इरफान लगातार टिप्पणी करते रहे हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में उन्हें हॉलीवुड की फिल्मों में अपेक्षाकृत ज्यादा मौके मिले हैं। इससे भारतीय सितारों के लिए हॉलीवुड की फिल्मों में प्रवेश का सम्मानजनक रास्ता खुला है।

करीब सात दशक तक आधी अधूरी कवायद के इतिहास में हॉरर फिल्म ‘डेफिनेशन आॅफ फीयर’ में जैकलीन फर्नांडिज की मुख्य भूमिका के साथ हिंदी फिल्मों की किसी हीरोइन को हॉलीवुड में लीड रोल मिला। जेम्स सिमसन के निर्देशन में बनी इस फिल्म की शूटिंग कनाडा और पोलैंड में हुई। फिल्म का क्लाइसमैक्स मलेशिया के एक अभिशप्त मकान में शूट करना प्रस्तावित था लेकिन हिंदी फिल्मों में व्यस्तता बढ़ जाने की वजह से जैकलीन के आग्रह पर मुंबई में क्लाइमैक्स फिल्माया गया। मूल रूप से श्रीलंका की जैकलीन 2009 में ‘अलादीन’ से फिल्मों में आई थी लेकिन फीकी शुरुआत के बाद ‘मर्डर’, ‘रेस’ व ‘हाउसफुल’ जैसी हिट फिल्मों के सीक्वल और फिर सलमान खान की वजह से मिली ‘किक’ ने उन्हें स्टार बना दिया। अभी तक जैकलीन की इमेज ग्लैमरस हीरोइन की रही है।

छोटे-बड़े पड़ाव

सही है कि इरफान खान ने हॉलीवुड की फिल्मों में पहचान बना ली है और जैकलीन फर्नांडीज ने एक अहम पड़ाव तय किया है। प्रियंका चोपड़ा व दीपिका पादुकोण ने भी दस्तक दे दी है। लेकिन कोशिश पहले भी कईयों ने हॉलीवुड की फिल्मों में अपनी पहचान बनाने की की। कुछ की सफलता से अलग ज्यादातर कुछ मिनट के लिए अंग्रेजी फिल्म में चेहरा दिखा कर ही अभिभूत रहे। हाल-फिलहाल की बात की जाए तो हॉलीवुड की फिल्म ‘द ग्रेट गेट्स बी’ में पांच मिनट की भूमिका कर अमिताभ बच्चन इतने अभिभूत हो गए, मानों करिअर का आखिरी पड़ाव उन्होंने पा लिया। ‘मिशन इंपासिबल: घोस्ट प्रोटोकॉल’ में अनिल कपूर की भूमिका तो इससे भी कम समय की थी। लेकिन हॉलीवुड की फिल्म में चेहरा दिख जाने का उल्लास कई महीने तक उनके चेहरे से नहीं हटा। मल्लिका सहरावत पहली फिल्म ‘ख्वाहिश’ से सुखिर्यों में आईं तो सिर्फ इसलिए कि फिल्म में उन्होंने 18 चुंबन दृश्य दिए। ‘मर्डर’ में उन्होंने इस रिकार्ड को तोड़ने की कोशिश की। अचानक उन्हें हॉलीवुड की फिल्मों का चस्का लग गया। जैकी चैन के साथ ‘द मिथ’ में उनकी भूमिका थोड़ी ठीक ठाक रही पर ‘हिस्स’ में वे बेहद हास्यास्पद लगीं। इस तरह की दोयम दर्जे की फिल्में तो अब भारत में भी नहीं बनतीं। ‘द स्लम डॉग मिलियनेयर’ में देव की भूमिका फिर भी महत्वपूर्ण थी लेकिन फ्रीडा पिंटो की भूमिका न तो दमदार थी और न ही उसमें उन्होंने अभिनय कौशल का कोई विशेष कमाल दिखाया था। पिछले दिनों टीवी शो ‘कॉफी विथ करन’ में उन्होंने कहा कि हॉलीवुड ही उनका आंगन है। ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ से फिल्मों में लौट आई हैं। फ्रीडा पिंटों भी सुना है कि हिंदी फिल्मों में अपने लिए संभावनाएं तलाश रही हैं। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है।


कुछ अपवादों को छोड़ कर भारतीय सितारों को हॉलीवुड की उन्हीं फिल्मों में ज्यादा मौका मिला जो या तो संयुक्त उपक्रम में बनी थी या उनका निर्माता कोई अनिवासी भारतीय रहा। वैसे यह शर्म अथवा अफसोस की बात नहीं है कि हॉलीवुड की मुहर नहीं लग पाने से ही किसी कलाकार की श्रेष्ठता कम हो जाती है। बस उनसे एक अंतरराष्ट्रीय मंच मिल जाता है। इसकी तलाश पिछले सात दशक से समय-समय पर भारतीय कलाकारों को होती रही है। हॉलीवुड में सबसे पहले और अब तक का सबसे बड़ा ब्रेक साबु को 1937 में ‘एलीफेंट ब्वाय’ में मिला। ‘किंग सोलोमंस माइंस’ में इंद्रसेन जौहर ने काम किया। बाद में डेविड लीन की ‘लारेंस आफ अरेबिया’ में वे गुलाम की दो मिनट की भूमिका में नजर आए। जेम्स बांड सीरिज की ‘आॅक्टोपसी’ में कबीर बेदी के साथ टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज दिखे। स्टीवन स्पीलबर्ग की इंडियाना जोंस की सीरिज की एक कड़ी में अमरीश पुरी ने तांत्रिक की भूमिका की। ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह, गुलशन ग्रोवर आदि भी कुछ फिल्मों में काम करके अंतरराष्ट्रीय कलाकार होने का ठप्पा लगवा आए।

सस्ती फिल्मों में ज्यादा चमके
कुछ भारतीय कलाकारों ने उन विदेशी फिल्मों में अपनी दमदार प्रस्तुति से धाक जमाई जो कम बजट में बनी थीं। जेम्स आइवरी और इस्माइल मर्चेंट की फिल्म ‘द हाउस होल्डर’ में शशि कपूर और लीला नायडू मुख्य भूमिका में थे। न्यूयार्क में फिल्म का प्रीमियर हुआ जिसमें उपस्थित कनाडाई फिल्मकार हार्वे हार्ट ने लीला नायडू को अपनी फिल्म ‘फेम इन द सन’ में लिया। शशि कपूर ने तो आइवरी-मर्चेंट की ‘द गुरू’, ‘हीट एंड डस्ट’ जैसी कुछ फिल्मों में काम किया। आस्ट्रेलिया के कोनराड रुक्स की फिल्म ‘सिद्धार्थ’ में शशि सिमी ग्रेवाल के साथ मुख्य भूमिका में आए। यह अपने आप में विचित्र बात है कि महात्मा गांधी पर फिल्म बनाने का विचार ब्रिटिश फिल्मकार रिचर्ड एटनबरो को आया और उससे ज्यादा विचित्र यह कि आधी भारतीय और आधी ब्रिटिश पूंजी से 1983 में करीब बीस करोड़ रुपये की लागत से बनी ‘गांधी’ में केंद्रीय भूमिका विदेशी कलाकार बेन किंग्सले ने की। खैर, फिल्म में सईद जाफरी, अमरीश पुरी, रोशन सेठ सरीखे कई भारतीय कलाकारों ने भी काम किया। ज्यादा सराही गईं कस्तूरबा की भूमिका में रोहिणी हटंगड़ी, जिन्हें ब्रिटिश अकादमी अवार्ड भी मिला। फिल्म की वस्त्र सज्जा के लिए भानु अथैया को आॅस्कर से नवाजा गया, लेकिन किसी भारतीय फिल्म के लिए उन्हें या किसी और को यह पुरस्कार आज तक नहीं मिला है।

शबाना आजमी जॉन श्लेसिंगर की फिल्म ‘मादाम सुजात्स्का’ में शर्ले मक्लीन के साथ आईं। फ्रेंच फिल्मकार निकोलास क्लात्ज़ की फिल्म ‘ला नुइत बेंगली’ में भी वे थीं। 1984 में फ्रेंच फिल्मकारों ने स्मिता पाटील को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान दिया। यह सम्मान पाने वाली वे पहली भारतीय अभिनेत्री थीं। तभी फ्रांस के रॉल रोइज ने उन्हें एक फिल्म का प्रस्ताव दिया जिसे उन्होंने सधन्यवाद ठुकरा दिया। वजह, फिल्म में उन्हें ताहिती लड़की की भूमिका करनी थी और अर्धनग्न दृश्य देने थे। ऐशवर्या राय की विदेशी फिल्मों में उपस्थिति ज्यादा व्यापक रही। भारतीय मूल के जगमोहन मुंधडा की फिल्म ‘प्रवोक्ड’ के अलावा भारतीय मूल की गुरिंदर चड्ढा की फिल्म ‘ब्राइड एंड प्रेज्युडिस’ ही नहीं, फ्रेंच फिल्म ‘पिंक पैंथर’ सीरिज की एक फिल्म से भी वे दिखीं। कायदे से उन्हें कोई बड़ी भूमिका फिर भी नहीं मिली। भारतीय कलाकारों को भारतीय मूल की महिला फिल्मकारों गुरिंदर चड्ढ़ा, मीरा नायर व दीपा मेहता की फिल्मों में ही ज्यादा सम्मानजनक भूमिकाएं मिलीं। एक वजह व्यावसायिक नजरिए की भी रही। विदेशी कलाकारों की तुलना में भारतीय कलाकार काफी सस्ते बैठते हैं और कुछ मौकों पर तो भारतीय कलाकार लगभग मुμत में काम करने की सदाशयता भी दिखा देते हैं। भविष्य में अन्य भारतीय कलाकारों के लिए भी ऐसे ही अवसर बन सकते हैं। बस उन पर लपकने की बजाए अपनी शर्तों पर वे काम करें, तभी उनका सम्मान बढ़ेगा और सही मायनों में विश्व सिनेमा में मजबूत भारतीय पहचान स्थापित हो पाएगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here