फिल्म की राजनीति

तथ्य तो यही है कि यह फिल्म कांग्रेस और खास कर सोनिया गांधी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश है। सवाल उठता है कि क्या यह कोशिश भारतीय जनता पार्टी को कोई खास चुनावी फायदा दिला पाएगी?

ह महज संयोग नहीं है कि राजनीति के गलियारों में कसमसाहट पैदा करने वाली फिल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ की रिलीज के दो हμते बाद 25 जनवरी को बाल ठाकरे पर बनी फिल्म ‘ठाकरे’ आ रही है। वैसे आम चुनाव से पहले एक और फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ भी आ सकती है, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के निधन की परिस्थितियों पर केंद्रित होगी।
ऐसा नहीं कि इनके पहले राजनीतिक व्यक्तित्व पर फिल्में नहीं आईं, पर भारत में किसी जीवित राजनेता पर बनी ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पहली फिल्म है। हां, विरोध कुछ फिल्मों का पहले भी हुआ है। सच यह है कि व्यक्तित्व आधारित फिल्में, यानी बायोपिक वाद-विवाद की कुछ चिंगारी भले ही छोड़ दें, उसका कोई सकारात्मक फायदा नहीं हो पाता। होता तो करोड़ों रुपये में तीन फिल्मों के जरिए महानायक के रूप में विरूपित कर दिए गए डेरा सच्चा सौदा वाले बाबा आज जेल में नहीं होते। ऐसे में यह मान लेना ही अपरिपक्वता होगी कि ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ की कोई राजनीतिक प्रासंगिकता बन पाएगी। इतना जरूर है कि फिल्म के बहाने कांग्रेस और भाजपा को एक दूसरे पर जूतम पैजार करने का हथियार मिल गया है।
पुरानी परंपरा को देखते हुए ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर कांग्रेसी नेताओं का आग बबूला होना स्वाभाविक ही कहा जाएगा। भला वे इस बात को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि देश को फिरौती के लिए दस साल बंधक बनाने का आरोप एक परिवार पर लगा दिया जाए। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस का विरोध मनमोहन सिंह से सहानुभूति जताने पर केंद्रित नहीं है। एतराज कुछ कथित आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों को लेकर है जो सोनिया गांधी और राहुल गांधी को निशाने पर लेकर है। पीड़ा कांग्रेस में इसी बात को लेकर है कि फिल्म भाजपा के हाथों में सोनिया गांधी के परिवार पर तीखा चुनावी हमला करने का हथियार थमा सकती है।
इस बहस के बीच सवाल उठता है कि मनमोहन सिंह पर फिल्म बनाने का राजनीति के अलावा क्या कोई अन्य औचित्य है? किताब का विरोध होने पर संजय बारू ने स्पष्टीकरण दिया था कि उन्होंने सिर्फ एक काल विशेष के तथ्यों को सामने रख कर एक ऐसे व्यक्ति का सकारात्मक व्यक्तित्व सामने रखा जो राजनीति की शतरंज पर मोहरा बन कर उपहास और अवहेलना का शिकार होता रहा। फिल्म से जुड़े लोगों का दावा है कि नाटकीयता का सहारा लिए बिना फिल्म ने तथ्यों को पूरी विश्वसनीयता से सामने रखा है। फिल्म में जिन तथ्यों पर जोर दिया गया है, वे अनजाने या अनछुए नहीं है। मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री बनना एक दुर्घटना भले ही न हो, मजबूरी का एक राजनीतिक समझौता तो था ही। सब जानते हैं कि राहुल गांधी के लिए नई और साफ-सुथरी जमीन बनाने के लिए एक मुखौटे के रूप में मनमोहन सिंह का इस्तेमाल किया गया। वे दूसरों की लिखी पटकथा पर कठपुतली की तरह चलने के लिए बाध्य थे। इस स्थिति के फिल्मांकन के विरोध का कोई मतलब नहीं है। विरोध हो रहा है तो कुछ संवादों व घटनाओं की वजह से। फिल्म बताती है कि मनमोहन सिंह को खुफिया एजंसियों से रोजमर्रा बैठक करने से रोक दिया गया था। पीएमओ और मंत्रिमंडल पर उनका नियंत्रण नहीं रहने दिया गया था।
मंत्री चुनने का विशेषाधिकार उनसे छीन लिया गया था। फिल्म में मनमोहन सिंह के हवाले से एक टिप्पणी दिखाई गई है जो बताती है कि प्रधानमंत्री होते हुए भी उनकी स्थिति क्या थी? उस दृश्य में मनमोहन सिंह कहते हैं- ‘सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते। इससे संशय होगा। मैंने स्वीकार कर लिया है सत्ता का असली केंद्र सोनिया गांधी हैं। और सरकार पार्टी के लिए जवाबदेह है।’ फिल्म बताती है कि टू जी स्कैम के अभियुक्त ए राजा को सोनिया गांधी के कहने पर मंत्रिमंडल में जगह मिली थी। यूपीए सरकार के दस साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के जितने भी मामले उजागर हुए उनके बारे में फिल्म के मुताबिक मनमोहन सिंह को पता था और उन्होंने ऊपरी दबाव में अपने सहयोगियों की कारगुजारी को अनदेखा किया। फिलहाल कांग्रेसशासित राज्यों में फिल्म पर प्रतिबंध लगाने का कोई फैसला नहीं हुआ है। शायद होगा भी नहीं। क्योंकि इससे गलत संकेत जाएगा। सेंसर बोर्ड से पास फिल्म को रोकने का लांछन कांग्रेस नहीं उठाना चाहती। दो तरफा मजबूरी। इसीलिए फिल्म का यथासंभव विरोध जरूर हुआ। महाराष्ट्र युवा कांग्रेस ने फिल्म से जुड़े लोगों को नोटिस भेज कर शीर्ष नेताओं की गलत छवि पेश करने के लिए माफी की मांग की। बिहार की एक अदालत ने सभी को नोटिस भी भेज दिया।
कांग्रेसी नेता इस बात पर अड़ गए कि रिलीज से पहले फिल्म उन्हें दिखाई जाए ताकि आपत्तिजनक दृश्यों व संवादों की छंटाई की जा सके। यानी सेंसर के बाद एक और राजनीतिक सेंसर, बहरहाल फिल्म रिलीज हो गई है और अब यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है कि फिल्म राजनीतिक रूप से कितना असर छोड़ पाएगी? फैसला दर्शकों के हाथ में है। अनुपम खेर मनमोहन सिंह के रूप में खासे जमे हैं। उन जैसे सक्षम अभिनेता के लिए यह मुश्किल नहीं था। सोनिया गांधी बनी सूजेन बर्नेट और राहुल गांधी ठीक ठाक रहे हैं। निर्देशक विनय रत्नाकर गुट्टे ने किताब के तथ्यों को फिल्म में जस का तस जरूर रखा है लेकिन फिल्म में मनोरंजक तत्वों का अभाव शायद फिल्म के प्रति दर्शकों का आकर्षण न बढ़ा पाए। वैसे भी राजनीतिक उठापटक पर बनने वाली फिल्में खास नहीं हो पातीं।
विवादास्पद होना भी किसी फिल्म के चलने की गारंटी नहीं होता। ऐसा होता तो 2017 में आई मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ नाकाम नहीं हो जाती। बारह करोड़ रुपये की लागत से बनी यह फिल्म बाक्स आफिस पर छह करोड़ रुपये के आसपास ही जुटा सकी। बावजूद इसके कि फिल्म का व्यापक विरोध हुआ। फिल्म को रुकवाने का कोशिश हुई। उसके शो के दौरान कुछ शहरों में हंगामा व तोड़फोड़ हुई। विरोध का शाश्वत आधार यही था कि फिल्म ने इंदिरा गांधी व संजय गांधी की छवि धूमिल की है। संजय गांधी की कथित बेटी प्रिया सिंह पाल ने पहले बंबई हाईकोर्ट में और फिर सुप्रीम कोर्ट में फिल्म रुकवाने की गुहार लगाई लेकिन बात नहीं बनी। ‘इंदु सरकार’ इमरजेंसी के काले दिनों में व्यवस्था को लेकर पति-पत्नी के बीच वैचारिक टकराव पर केंद्रित थी। इमरजेंसी की ज्यादतियों को फिल्म में उभारा गया था जो निश्चित रूप से कल्पनात्मक नहीं था।
इमरजेंसी में क्या हुआ था यह सबके सामने है। लेकिन उस कड़वे सच को विरोध के जरिए दबाने की कोशिश हुई। इस फेर में न फिल्म को कोई फायदा हुआ और न कांग्रेस को कोई खास नुकसान। राजनीति पर बनी फिल्मों के साथ यही होता आया है। ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ इस सिलसिले को तोड़ पाएगी, इसकी उम्मीद कम ही है। दरअसल राजनीति को केंद्र में रख कर बनाई गई फिल्में नाटकीय ज्यादा होती रही है। जीवनीपरक फिल्मों के साथ दुविधा अलग तरह की है। तथ्यों को निरपेक्ष तरीके से पेश करने की निर्देशकीय कौशल की कमी कहें या सच को आइना दिखाने की हिम्मत का अभाव, सही तालमेल इस बार भी नहीं बन पाया है। इसीलिए फिल्म का मंतव्य संशय के घेरे में आ गया है।

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